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  • May 14 2019 6:31AM
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रूढ़िवादिता और संवैधानिक सुधार

आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक,
एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
delhi@prabhatkhabar.in
 
साल 1948 में हिंदू कोड बिल का प्रस्ताव पेश करते हुए भीमराव आंबेडकर ने इस विधेयक के मुख्य मुद्दे के रूप में उत्तराधिकार को रेखांकित किया था. हिंदू उत्तराधिकार कानून दो परंपराओं से आया था, जिन्हें मिताक्षरा और दायभाग के रूप में जाना जाता है. मिताक्षरा के अनुसार, एक हिंदू पुरुष की संपत्ति उसकी नहीं होती है. इसका साझा स्वामित्व पिता, पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र का होता है. इन सभी का संपत्ति पर जन्मसिद्ध अधिकार होता है. 
 
इनमें जब किसी की मृत्यु हो जाती है, तो वह अपना हिस्सा अपनी संतानों के लिए नहीं छोड़ता, बल्कि वह शेष तीन के पास चला जाता है. यह कानून संयुक्त परिवार की परंपरा से आया है और यह तब लागू हुआ था, जब जमीन मुख्य संपत्ति हुआ करती थी. एकल परिवार होने की स्थिति में ऐसी संपत्ति का बंटवारा मुश्किल है, पर संपत्ति के संयुक्त स्वामित्व के कारण चारों में से कोई भी बंटवारे की मांग कर सकता है.   
दायभाग में एक हिंदू पुरुष की संपत्ति उसकी व्यक्तिगत संपत्ति होती है और वह अपनी मर्जी से उसके बारे में फैसला लेने का अधिकार रखता है. 
 
इसका मतलब यह हुआ कि उसकी मौत के बाद उसके पिता, दादा या पुत्र को स्वतः उसकी संपत्ति का मालिकाना नहीं मिलता. आंबेडकर चाहते थे कि मौजूदा दायभाग प्रणाली पूरे देश में लागू हो. वे इसमें कुछ बदलाव भी करना चाहते थे. ये सारे बदलाव परिवार की संपत्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी से संबंधित थे. पाठकों को पता होगा कि यह विधेयक पारित नहीं हो सका था और आंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया था.
 
संविधान सभा के रूढ़िवादी होने के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका था. मिताक्षरा को समाप्त करने और दायभाग को देशभर में लागू करने के आंबेडकर के प्रस्ताव पर इस सभा के सदस्यों को कुछ ही आपत्ति थी, उन्हें मुख्य रूप से महिलाओं की संपत्ति में हिस्सेदारी के अधिक अधिकार होने से परेशानी थी. यह उन्हें स्वीकार्य नहीं था. 
 
सदस्यों का कहना था कि स्त्रियों के पास अपना दहेज है, वे शादी के बाद दूसरे घर चली जाती हैं, जहां की संपत्ति को वे भोगती हैं, तथा अगर उन्हें पारिवारिक संपत्ति में भी हिस्सा मिलेगा, तो जमीन टुकड़ों में बंट जायेगी. 
 
साल 1948 में भी भारतीयों को ऐसी बहस इसलिए करनी पड़ रही थी, क्योंकि उससे पहले कम-से-कम 90 सालों से धार्मिक परंपराओं में मामूली सुधार ही हुए थे. ईस्ट इंडिया कंपनी से 1857 में सत्ता लेने के बाद ब्रिटिश राजशाही का रवैया सुधारों का नहीं रहा था.   
 
सर सैयद अहमद खान की एक किताब के मुताबिक, उस विद्रोह का एक कारण यह था कि ब्रिटिश शासकों के परंपरा में हस्तक्षेप से भारतीय नाराज थे. साल 1829 में सती प्रथा का उन्मूलन हो गया था और 1850 में धर्म बदलनेवाले लोगों के संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित रखने के कानून बनाये गये थे. 
 
यह वही दौर था जब ब्रिटेन और अमेरिका में गुलाम प्रथा के खिलाफ ताकतवर आंदोलन चल रहा था. सत्ताधारियों को लगा कि पारंपरिक संस्कृतियों में आधुनिकता लाने के लिए उन्हें सत्ता का इस्तेमाल करना चाहिए. साल 1857 की बड़ी हिंसा, जिसमें लाखों लोग मारे गये थे, के बाद अंग्रेजों ने यह फैसला लिया कि वे हिंदुओं और मुस्लिमों को अपना सुधार करने का जिम्मा उनके ही ऊपर छोड़ देंगे. 
 
हमारे संविधान के अनुच्छेद 17 के द्वारा कांग्रेस ने छुआछूत को खत्म किया था. पूरे 1920 के दशक में हिंदू दलितों के मंदिर में प्रवेश को आक्रामक हिंसा से रोकने की कोशिश कर रहे थे. इसी तरह की रूढ़िवादिता ने आंबेडकर के उत्तराधिकार सुधारों को पारित नहीं होने दिया था.
उल्लेखनीय है कि वह संविधान सभा मुख्यतः कांग्रेस संविधान सभा थी. उस सभा में ऐसी पार्टी की कोई उपस्थिति नहीं थी, जिसे हम भाजपा के नाम से जानते हैं. नेहरू सरकार में भी श्यामा प्रसाद मुखर्जी के रूप में हिंदुत्व का सीमित प्रतिनिधित्व था. पद संभालने के लिए मुखर्जी कांग्रेसी हो गये थे. 
 
उन्होंने जनसंघ की स्थापना की थी, जो बाद में भाजपा बनी. यह स्वीकार करना होगा कि अपने सांसदों और विधायकों में रूढ़िवादिता के बावजूद कांग्रेस तमाम सुधारों को पारित करा सकी थी. ऐसा इसीलिए हो सका था, क्योंकि कांग्रेस की सोच उदारवादी थी और इसका नेतृत्व नेहरू जैसा महान व्यक्ति कर रहा था.   
 
दक्षिण एशिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसके पास धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी संविधान है. अफगानिस्तान और पाकिस्तान इस्लामिक देश हैं, जहां कोई गैर-मुस्लिम शीर्ष पद नहीं हासिल कर सकता है. 
 
मालदीव भी इस्लामिक देश है. श्रीलंका के संविधान में बौद्धों को प्रमुखता दी गयी है. बांग्लादेश के संविधान की शुरुआत इस्लामिक धार्मिक पद से होती है. भूटान में सरकार और धर्म का संचालन एक बौद्ध राजा के द्वारा होता है. साल 2008 तक नेपाल एक हिंदू राष्ट्र था, जहां मनुस्मृति के अनुसार सत्ता एक क्षत्रिय राजा के पास होती थी. 
 
संवैधानिक रूप से सिर्फ भारत ही धर्मनिरपेक्ष है. ऐसा इसलिए नहीं है कि भारत एक हिंदू बहुसंख्यक देश है. नेपाल में भी हिंदू बहुसंख्यक हैं. जब अंग्रेज जा रहे थे, तब भारतीयों से किसी ने नहीं पूछा था कि क्या हमें हिंदू राष्ट्र चाहिए या अपने संविधान में हमें धार्मिक पहलुओं को भी शामिल करना चाहिए. 
 
यह सिर्फ कांग्रेस की वजह से हो सका कि हम एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बने. यह देखना दिलचस्प होगा कि आज जब एक अन्य राजनीतिक शक्ति का वर्चस्व है, तो क्या नेहरू और कांग्रेस की यह विरासत बनी रहेगी या हमें एक नयी दिशा में ले जाया जायेगा.
 

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