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  • Jun 13 2019 7:28AM
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बच्चों के प्रति अपराध पर लगे अंकुश

अशोक कुमार पांडेय

लेखक

ashokk34@gmail.com

अलीगढ़ के टप्पल में ढाई वर्षीया बच्ची की जघन्य हत्या और कठुआ के गैंगरेप तथा हत्या कांड पर हाल में विशेष अदालत के फैसले के बाद से सोशल मीडिया में बच्चों के प्रति अपराधों पर चर्चा फिर शुरू हो गयी है. 

बीते हफ्तेभर से कम समय में लखनऊ, अहमदाबाद, भोपाल, मेरठ, बेगुसराय सहित कई शहरों से ऐसी घटनाओं की खबरें आयीं, लेकिन सच्चाई यह है कि इन चर्चाओं के पार बच्चों के साथ हिंसा और खासतौर पर नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं देश में लगातार बढ़ती जा रही हैं. इन खबरों से समाचार माध्यम इस कदर भरे हुए हैं कि धीरे-धीरे ये सामान्य सी होती जा रही हैं और हम एक बीमार और हिंसक समाज बनते जा रहे हैं. 

आंकड़ों की बात करें, तो साल 2001 से 2016 के बीच बच्चों के विरुद्ध अपराध के जो मामले दर्ज हुए, ध्यान दें- जो मामले दर्ज हुए, उनमें 889 प्रतिशत की वृद्धि हुई. साल 2001 में 10,814 मामले दर्ज हुए. इनकी संख्या 16 साल में बढ़कर 5,95,089 हो गयी. इसी दौर में बच्चों के विरुद्ध अपराध के लंबित मामलों की संख्या 21,233 थी, जो 2016 में 11 गुना बढ़कर 2,27,739 हो गयी. 

केवल उत्तर प्रदेश की बात करें, तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 से 2016 के बीच बच्चों के साथ बलात्कार की घटनाओं में 400 प्रतिशत का इजाफा हुआ. इसी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 में रोज 106 रेप के मामले दर्ज किये गये. बच्चों के अपहरण और हत्या के मामलों में भी इस दौर में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. क्रमशः मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में ऐसी घटनाएं सबसे अधिक दर्ज की गयीं. 

दुखद यह है कि इस परिघटना के खिलाफ कोई व्यापक जनमत बनने, सामाजिक आंदोलन उभरने या शासकीय स्तर पर किसी बड़ी पहलकदमी की जगह ऐसे अपराध अब रूटीन में शामिल होते जा रहे हैं और यह ‘न्यू नॉर्मल’ हमारी संवेदनाओं को एकदम नहीं झकझोरता. 

इसका उदाहरण अलीगढ़ की घटना पर उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री सूर्य प्रकाश शाही का वह बयान है, जिसमें उन्होंने इसे छोटी-मोटी घटना बताया. हालांकि, ऐसे बयान पहले भी आते ही रहे हैं. 

किसी भी दिन का अखबार उठाकर देख लीजिए, ऐसी घटनाएं एक-दो कॉलम में दबी हुई मिल जाती हैं. चर्चा तब होती है, जब उसमें धर्म या कोई और एंगल जुड़ जाये. अलीगढ़ या कठुआ की घटना की इतनी चर्चा के मूल में भी यही है. 

हालत यह है कि कठुआ पर आये निर्णय को भी प्रतिष्ठा के प्रश्न जैसा बना लिया गया है. यह संवेदनहीनता परिवारों और समाज के भीतर बढ़ती अजनबियत और हिंसक प्रवृत्तियों के साथ मिलकर हमारे समाज को बच्चों के लिए बेहद खतरनाक बनाते जा रहे हैं. अध्ययन बताते हैं कि बच्चों के साथ होनेवाले यौन अपराधों में नब्बे फीसद परिवारों के भीतर या अत्यंत परिचित लोगों द्वारा किये जाते हैं. अभी लखनऊ में हुई घटना में अपराधी ने अपने घर छुट्टियां मनाने आयी एक रिश्तेदार बच्ची के साथ बलात्कार किया!

चूंकि ऐसे लोगों पर बच्चों के माता-पिता भरोसा करते हैं, तो उनके लिए अपराध आसान हो जाता है और अक्सर ऐसी घटनाओं को इज्जत के नाम पर रिपोर्ट भी नहीं किया जाता. इसके अलावा परिवारों के आपसी विवादों का शिकार भी कई बार बच्चे ही बनते हैं, जैसा कि अलीगढ़ की घटना में हुआ.  

इन घटनाओं पर राजनीति करने की जगह समाज और कानून, दोनों स्तरों पर व्यापक पहल की जरूरत है. निर्भया कांड के बाद लगा था कि शायद सरकारें अब ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेंगी, लेकिन कुछ शुरुआती शोर-शराबे के बाद सब कुछ वैसे का वैसा ही रह गया है.

बच्चों और अभिभावकों दोनों के बीच व्यापक जागरूकता अभियान चलाकर ऐसी घटनाओं की संभावना कम की जा सकती है. दीर्घकालिक समाधान के लिए समाज में खासकर पुरुषों के बीच जेंडर मुद्दों पर गहन सेंसिटाइजेशन (संवेदीकरण) की जरूरत है. स्कूलों के स्तर से ही लड़कों की जेंडर ट्रेनिंग की जानी चाहिए और समाज के भीतर व्याप्त पितृसत्तात्मक मूल्यों को धीरे-धीरे खत्म किये जाने की कोशिश करनी चाहिए. मध्यवर्गीय रिहाइशों में तो ढेरों इंतजाम होते हैं, लेकिन निम्न मध्यवर्गीय इलाकों और झुग्गी-झोपड़ियों तथा ग्रामीण इलाके अभाव में रहते हैं. इसलिए इन जगहाें में रोशनी, खेल के मैदानों, क्रेच आदि की व्यवस्था के साथ वहां अभिभावकों तथा बच्चों की काउंसलिंग और ट्रेनिंग पर जोर देना चाहिए, जिससे बच्चे अपराधियों की मंशा भांप सकें और माता-पिता उनकी आरंभिक शिकायतों को समझ सकें. 

पॉक्सो जैसे मजबूत कानून के बावजूद अगर अपराधी बेखौफ हैं, तो केवल कड़े कानून से काम नहीं चलनेवाला, अब जरूरत है शीघ्र न्याय दिलाये जाने की. एक तरीका बच्चों के विरुद्ध होनेवाले सभी अपराधों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने का हो सकता है. ऐसे कोर्ट गठित किये जाने और इनसे जुड़े लोगों को जेंडर तथा बाल मनोविज्ञान के विशेष प्रशिक्षण दिये जाने की जरूरत है. इन सब सम्मिलित प्रयासों से ही ऐसी भयावह घटनाओं पर लगाम लग सकती है.  

बच्चों पर हो रहे अपराधों पर रस्मी भावुकता से बाहर आकर बड़ी पहलकदमी की जरूरत है. लेकिन, विकास के नये-नये सपने देख रहा देश अगर अपने चुनावों में औरतों और बच्चों को मुद्दा नहीं बना पाता, अगर ऐसे मामलों में राजनीति और आरोप-प्रत्यारोप में उलझ जाता है, तो विकास के वे सपने दागदार रह जाने के लिए अभिशप्त हैं.

 
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