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  • Dec 6 2018 6:42AM

समय रहते चेतना जरूरी है

मनींद्र नाथ ठाकुर
एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू
manindrat@gmail.com
 
बुलंदशहर की हिंसा ने पूरी हिंदी पट्टी को झकझोर दिया है. भीड़ द्वारा एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या ने तो हिंसा के दानव के असली रूप को सामने ला दिया है. यह एक तरह की आंधी है, जिसमें कोई भी बह सकता है. 
 
पुलिस हो, नेता हो या आम आदमी, सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा किसी को नहीं छोड़ेगी. यह एक तरह का उन्माद है, जिसमें हम सही-गलत, उचित अनुचित, न्याय-अन्याय, सब भूल जाते हैं. हम हिंसक पशु बन जाते हैं. भारतीय सामूहिक चेतना में विभाजन के बाद की हिंसा की यादें अभी होनी चाहिए. हमने मनुष्य को दानव बनते देखा है. क्या हमारा समाज फिर उसी तरह की हिंसा की ओर बढ़ने के प्रयास में है? 
 
हमें याद रखने की जरूरत है कि घृणा और हिंसा समाज को केवल गर्त में ही धकेलती है. हम बहु सांस्कृतिक समाज में रहते हैं. हमारे बीच जति, धर्म, रंग, भाषा और भी अनेक अंतर है. इन अंतरों का अपना इतिहास भी होगा. और रिश्तों का इतिहास हमेशा सुखद ही हो, जरूरी नहीं है. लेकिन, यदि हम आज के युग में उन रिश्तों को लेकर देश के भविष्य को बनाने चले, तो फिर संभव है कि हमारा जनतंत्र भीड़तंत्र में बदल जाये. 
 
राजनीतिक दल और उनके नेतृत्व को अस्मिताओं की राजनीति की सीमा को समझना चाहिए. हर अस्मिता यदि इतिहास के गर्त से निकालकर अपने साथ हुए अन्याय की कहानियों को दोहराने लगे और उसका बदला लेने लगे, तो जनतंत्र को कभी सुरक्षित नहीं रख पायेंगे. एक हवा चली हुई है कि जिसे भी अपनी राजनीति चमकानी हो किसी न किसी अस्मिता की दुख भरी कहानी लेकर बैठ जाते हैं. फिर दूसरे नेता से अपनी आवाज ज्यादा बुलंद करने के लिए जोर-जोर से बोलने लगते हैं और उससे काम नहीं चलता है तो गलियों की भरमार करते हैं. 
 
अस्मिताओं की कुंठाओं को ललकारते हैं. उनके लिए सत्ता का रास्ता तो खुल जाता है, लेकिन आम जनता दलदल में फंस जाती है. अविश्वास का जो बीज बोया जाता है, उसके फल के रूप में हमें इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या का तोहफा मिलता है. 
 
क्या कोई उपाय है इस राजनीति से बचने का? क्या राजनीतिक दलों की जगह गांधी और जेपी के दल-विहीन जनतंत्र की कल्पना पर फिर से विमर्श की शुरुआत करने का समय आ गया है? दलीय व्यवस्था ने व्यक्तिगत शुद्धता के सवाल को पीछे धकेल दिया है. राजनीति में ज्यादातर ऐसे लोग ही सफल हो रहे हैं जिनका चाल, चरित्र, और चेहरा संदिग्ध रहता है. ऐसा क्यों है? क्या व्यवस्था केवल जनतंत्र के मुखौटे में है? 
 
इसकी वास्तविकता अभी भी सामंतवादी है. जो लोग अस्मिताओं के नाम पर लोगों को ललकारते हैं, क्या वे जनतंत्र विरोधी नहीं हैं? ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि हाशिये पर रहनेवाली अस्मिताओं को गैरबराबरी की इस व्यवस्था पर सवाल उठाने का हक नहीं है. लेकिन, अस्मिता को ही विचारधारा बना लेने से न्याय-अन्याय के बीच की सीमा मिट जाती है. संघर्ष तो जरूरी है, लेकिन उसका न्यायसंगत होना भी उतना ही जरूरी है. 
 
आवश्यकता है एक-दूसरे की संस्कृति को समझने और उसका सम्मान करने की. जरूरत है समुदायों के बीच संवाद करने की. इस संवाद से ही शायद विश्वास का वापस आना संभव है. यदि किसी समुदाय के लिए कुछ वर्जित है, तो हम उसका सम्मान करने के बदले उसे चिढ़ाते क्यों हैं? 
क्या हम इतने अनुदार हो गये हैं कि पड़ोसी के घर मातम हो रहा हो, फिर भी इस बात पर जोर दें कि हमारे घर नगाड़ा बजता रहेगा? यदि ऐसा है, तो हम समाज के रूप में समाप्त हो चुके हैं. और यदि समाज के रूप में समाप्त हो चके हैं. तो फिर निश्चित रूप से राष्ट्र के रूप में बने रहना मुश्किल है. जितना भी हम सिनेमाघरों में जन-गण-मन गा लें, सच्चाई यह होगी कि हम राष्ट्र की लाश को कंधों पर ढो रहे हैं. 
 
यदि हम इस राष्ट्र के प्रति सम्मान रखना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले अपने मतांतरों और उनको झगड़े में बदलने से रोकना होगा. इतिहास की घटनाओं से वर्तमान को बेहतर बनाने की सीख जरूर ली जाये, लेकिन उसे नर्क बनाने के सबकों से परहेज जरूरी है. हमें समझना जरूरी है कि कहीं आर्थिक संकट के दौर में पूंजीवाद हमें विभाजित कर फायदा तो नहीं चाह रहा है! 
 
आपसी लड़ाई के कारण भारत पहले भी हार चुका है. तब तो लड़ाई आमने-सामने की थी, लेकिन अब तो लड़ाई आकांक्षाओं, उम्मीदों और कल्पनाओं को अस्त्र-शस्त्र बनाकर लड़ी जा रही है. जब तक हम समझ सकें कि कृत्रिम तरीके से हमारी सोच पर कब्जा कर लिया गया है, तब तक कहीं हम हार ही न जायें. 
 
दक्षिणी अफ्रीका से सीखकर हमें भी एक ‘ट्रूथ एंड रिकोंसिलिएंस कमिशन’ बनाना चाहिए, ताकि समुदायों के बीच के विवादों पर विचार किया जा सके और सहमति से इसका हम निबटारा कर सकें.
 
गोरे और काले लोगों के बीच के खून-खराबे के बाद उस देश में यह कमिशन बनाया गया था, जिसमें अपराधी और पीड़ित दोनों को आमने-सामने अपनी बात कहने का मौका दिया जाता था. अक्सर यह होता था कि पीड़ित जब अपनी पीड़ा का वर्णन करता था, तो अपराधी खुद रोने लगता था, आत्मग्लानि से भर जाता था, उसका मनुष्यत्व उसे धिक्कारता था. और अपना अपराध स्वीकार कर दंड के लिए अनुरोध करता था. समाज के पुनर्निर्माण के लिए कुछ ऐसा करना जरूरी है. 
 
गांधी अपने अंतिम दिनों में बहुत बैचेन थे. कई बार सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ अपने अनशन को इस कारण तोड़ने से उन्होंने मना किया कि अभी लोगों के दिल में प्रेम नहीं उपजा है. यदि घृणा की जगह प्रेम उपजाने का कोई उपाय नहीं किया गया, तो हमारा राष्ट्र संकट में रहेगा. अब यहां कोई गांधी तो है नहीं. 
 
हमारे पास केवल राजनेता हैं, कोई राष्ट्रनेता तो है नहीं. सब केवल सत्ता-सुख के लिए बैचेन हैं, राष्ट्रवाद को भी केवल सत्ता के लिए एक औजार बना दिया गया है. सत्ता-सुख के लिए राजनेता अस्मिता और हिंसा से भी परहेज नहीं कर रहे हैं. हमारा जनतंत्र भी पूंजी के खेल पर चलता है, इसलिए राष्ट्र का प्रश्न पीछे रह जाता है. 
 
यदि हमने अस्मिता की राजनीति का यह घिनौना खेल बंद नहीं किया, तो हममें से कोई सुरक्षित नहीं है. विभाजन के दंगों में हम सबने बहुत कुछ खोया है. अब और खोने से हम सदा के लिए एक राष्ट्र के रूप में खत्म हो जायेंगे. इसलिए समय रहते चेतना जरूरी है.
 

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