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  • Nov 15 2018 12:03PM

बिरसा मुंडा काे समझा, लेकिन देर से


-अनुज कुमार सिन्हा-

इतिहास गवाह है कि अंगरेजाें के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में आदिवासि याें की बड़ी भूमिक ा रही है. चाहे वे बाबा तिलका माझी, सिद ाे-कान्हू हाें या बि रसा मुंडा. इतिहासकार भले ही कहते रहे कि इनमें से अधिकांश संघर्ष जमीन काे लेकर था आैर आरंभ में इन्हें भारत के स्वत ंत्रता संग्राम से काेई लेना-देना नहीं था लेकिन सच यही है कि ये सारे आंदाेलन शाेषण, अंगरेजाें आैर उनके समर्थ न कर रहे लाेगाें के खिलाफ ही थे. आजादी के लि ए थे. अगर बि रसा मुंडा के उलगुलान काे ही लें, ताे उसी अवधि में देश में अलग-अलग जगहाें पर अंगरेजाें के खिलाफ आंदाेलन हाे रहे थे आैर उन्हें दर्ज भी किया जा रहा था.

बाद में इन अांदाेलनाें आैर इनके नेताआें काे मान्यता भी मिली लेकिन बिरसा मुंडा के आंदाेलन काे मान्यता मिलने में काफी विलंब हुआ. इसका बड़ा कारण था  जिन क्षेत्राें में ये आंदाेलन हाे रहे थे, वे मूलत: आदिवासी बहुल थे. इसलि ए संघर्ष का काेई दस्ता वेज तैयार करने की काेई परंपरा नहीं थी. ब रसा मुंडा के संघर्ष (1895-1900) के दाैरान अगर मि शनरी झारखंड क्षेत्र में नहीं आये हाेते ताे शायद इतना दस्तावेज भी नहीं बन पाता जित ना कुछ बन पाया. मि शनरी से जुड़े जाे लाेग जर्म नी या बेल्जियम से इस क्षेत्र में आये, जि न्हा ेंने यहां काम किया,बाद में उन्हा ेंने अपने अनुभव लिख े. अपनी डायरी लिख ी. ये सब अब दुर्ल भ दस्ता वेज हैं आैर बिरसा मुंडा के आंदाेलन काे समझने में काफी सहायक हाेते हैं. भगवान बि रसा मुंडा यानी धरती आबा के बारे में कई किताबें आ चुकी हैं, बहुत कुछ लिखा जा चुका है लेकिन विस्तृत इतिहास लिखा जाना अभी बाकी है.

कुमार सुरेश सिंह (पूर्व आइएएस अधिकारी) आैर एसपी सि न्हा (पूर्व निद ेशक टीआरआइ) ने बि रसा मुंडा पर काम किया, उसे ही आगे बढ़ाया जा रहा है. अगर इतिहास पर गाैर किया जाये तब पता चलता है कि बि रसा मुंडा के याेगदान काे 1940 तक लगभग भुला ही दिया गया था. बि रसा मुंडा के आंदाेलन का कार्यक ाल 1895-1900 के बीच का रहा है. जून 1900 में जब रांची जेल में बि रसा मुंडा का निधन हुआ, वे सिर्फ साढ़े 24 साल के थे.

साेचिए, इतनी कम उम्र में बिरसा ने वह कर दिखाया जाे वि रले ही काेई कर पाता है. कुछ अन्य युवकाें की बात करें ताे अंगरेजाें के खिलाफ लड़ने कारण सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु काे फांसी पर लटका दिया गया था.ये सभी 25 साल के आसपास के थे. भारतीय स्वत ंत्रता संग्राम के ये सभी वीर शहीद हैं. बि रसा की शहादत के लगभग 17 साल बाद यानी 1917 में पहली बार महात्मा गांधी झारखंड (रांची)आये. उनके आने के बाद इस पूरे इलाके में नये सिरे से आंदाेलन आगे बढ़ने लगा. लेकिन उस समय भी बि रसा मुंडा काे नायक के ताैर पर पेश नहीं किया गया था. बहुत हुआ ताे आदिवासी संघर्ष की चर्चा हाेती थी.

एक तरह से बिरसा मुंडा 1939 तक लगभग गाैण हाे गये थे. इसका बड़ा कारण यह था कि जाे भी प्रमुख नेता भारत की आजादी की लड़ाई में कांग्रेस की अगुवाई कर रहे थे, वे दक्षि ण बि हार (झारखंड क्षेत्र) के नहीं थे. आदिवासी संघर्ष काे उन्हा ेंने बहुत महत्व नहीं दिया था. हां, समय-समय पर छाेटानागपुर के नेता बि रसा मुंडा के संघर्ष की चर्चा जरूर करते थे. उसी दाैरान जयपाल सि ंह का पदार्पण हुआ. जनवरी 1935 में रांची में पहली बार जयपाल सि ंह ने लगभग एक लाख लाेगाें के साथ बड़ी सभी की थी आैर अगर झारखंड राज्य की मांग उठायी थी. इस दाैरान पहली  बार बड़े मंच से बड़े जाेरदार तरीके से बि रसा मुंडा के संघर्ष आैर उनके याेगदान, उनकी वीरता की कहानी सामने आयी थी. यही वह समय था जब बि रसा  मुंडा के याेगदान काे उचित सम्मा न मि ला था. इस सभा का प्रभाव इतना पड़ा कि अगले वर्ष यानी 1940 में जब रामगढ़ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, ताे अधिवेशन स्थल के मुख्य द्वार का नाम बि रसा मुंडा रखा गया. पहली बार कांग्रेस ने यह सम्मा न दिया.

इसके बाद आजादी की लड़ाई भी इस क्षेत्र में चलती रही आैर झारखंड राज्य की भी. बिरसा मुंडा का नाम आदर के साथ-साथ लिया जाने लगा. राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से (फायदा-घाटा का आंकलन करते हुए) बि रसा मुंडा के नाम का उपयाेग करते रहे. देश के आजाद हाेने के बाद भी जब काेई बड़ा नेता इस क्षेत्र में आता, अपने फायदे के लिए बि रसा मुंडा के नाम का उपयाेग करता. बाद में 15 नवंबर आैर 9 जून (बि रसा मुंडा का जन्म दिन आैर पुण्य तिथि ) काे समाराेह कर बि रसा मुंडा काे याद करने की परंपरा बन गयी. लेकिन झारखंड बनने तक किसी भी दल ने बिरसा मुंडा के नाम पर (कुछ मूर्ति की स्था पना काे छाेड़ दिया जाये ताे) कुछ ऐसा नहीं किया जि से इतिहास याद करे.

जब आदिवासी मतद ाताआें काे लुभाने की बात आती, राजनीतिक दल बिरसा मुंडा का नाम जपने लगते. धीरे-धीरे देश बि रसा मुंडा की ताकत काे समझ गया. उन्हें मान्यता मि लने लगी. संसद में उनकी तसवीर का लगना इसी का प्रमाण है. अच्छा तब लगा जब झारखंड अलग राज्य बना आैर अगस्त (जब बि ल पास हुआ था) से 15 नवंबर तक सिर ्फ इसलि ए इंतजार किया गया ताकि बि रसा मुंडा के जन्म दिन पर ही झारखंड राज्य की विध िवत स्था पना हाे सके. उसके बाद ताे पूरा सीन ही बदल गया. कई सरकारी याेजना बि रसा मुंडा के नाम पर आरंभ कर दी गयी. बड़े-बड़े संस्थानाें  का नामकरण बि रसा के नाम पर हाेने लगा.

राजनीतिक दलाें में हाेड़ मची रही कि काैन बि रसा मुंडा का सबसे ज्याद ा हित ैषी है. वैसे ताे बि रसा मुंडा सभी के लि ए पूज्य हैं लेकिन आदिवासि याें के लि ए ताे वे भगवान के तुल्य हैं. इसलि ए राजनीतिक दल अपना काेई बड़ा अभि यान बि रसा मुंडा से आरंभ करते हैं. चाहे वह उनका जन्म स्था न उलिहातू हाे, उनका समाधि स्थ ल (काेकर, रांची) हाे. अभी झारखंड सरकार ने 100 फीट ऊंची बि रसा मुंडा की मूर्ति बनाने की घाेषणा की थी जि से वि शेषज्ञाें के सुझाव पर 25 फीट कर दिया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी लाल किले से बि रसा मुंडा का नाम लेते हैं आैर ट्राइबल म्यूजि यम बनाने का वादा करते हैं.  गृहमंत्री राजनाथ सिंह बिरसा मुंडा के गांव जाते हैं, अमित शाह उलि हातू जाते हैं, हेमंत साेरेन अपनी यात्रा उलिहातू से आरंभ करते हैं, सुदेश महताे बुंडू में बिरसा मुंडा की बड़ी प्रतिमा बनाने की घाेषणा करते हैं. यह बि रसा मुंडा की ताकत काे बताता है. अब समय आ गया है कि इन वादाें से आगे जाया जाये.

बि रसा मुंडा पर आगे काम किया जाये. राजनीति से ऊपर उठ कर.बि रसा मुंडा ने शराब- दारू छाेड़ने काे कहा था. आज भी बिरसाइत उसका पालन करते हैं. बुराइयाें काे दूर करने का उन्होंने आह्रान किया था. अंगरेजाें के संघर्ष के साथ-साथ उनका धार्मिक आंदाेलन भी चल रहा था जि सका सीधा संबंध जीवन से था. उनके एक-एक उपदेश में संदेश छि पा है. बि रसा से साेच पर चर्चा हाेनी चाहिए. बि रसा से जुड़े सभी स्थ ल एेतिहासिक हैं. इन स्थ लाें काे पर्यटन से जाेड़ कर ऐसी याेजना बने जि ससे हजाराें लाेगाें काे राेजगार मिल सके. वक्त है बि रसा मुंडा काे आैर बेहतर तरीके समझने आैर उनके संदेश काे देश के काेने-काेने तक पहुंचाने का.

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