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  • Apr 25 2019 6:07AM
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अमेरिका का मोहरा नहीं है भारत

पुष्पेश पंत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
pushpeshpant@gmail.com
 
तुनकमिजाज अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अचानक यह फतवा जारी किया है कि ईरान पर लगाये प्रतिबंधों के मद्देनजर सभी देशों को उससे तेल आयात तत्काल बंद कर देना होगा, अन्यथा वह भी आर्थिक प्रतिबंधों की चपेट में आ जायेंगे. अब तक उन्होंने भारत और चीन समेत उन आठ देशों को, जो ईरान से अपनी मुद्रा में तेल खरीद रहे हैं और उसके सबसे बड़े तेल ग्राहकों में हैं, कुछ समय तक ईरानी तेल खरीदने की ‘रियायत’ दी थी. अंतरिम  राहत की यह अवधि अब समाप्त हो गयी है. 
 
इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने की आशंका पैदा हो गयी है, जिसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़े बिना नहीं रह सकता. हालांकि, अमेरिका ने सऊदी अरब के माध्यम से यह भरोसा दिलाया है कि वहां बढ़े तेल उत्पादन के जरिये तेल की कीमतों को नियंत्रित रखा जायेगा. 
 
यहां इस बात की तरफ ध्यान दिलाना जरूरी है कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानून तथा राजनयिक परंपरा का खुलेआम उल्लंघन है, जिसे अघोषित ‘युद्ध’ के दौरान घेराबंदी के समकक्ष समझा जाना चाहिए. 
 
यहां विस्तार से इस बात का पुनरीक्षण नहीं किया जा सकता कि क्यों अमेरिका यह नीति अपना रहा है, बस इतना भर रेखांकित किया जाना जरूरी है कि उसके अनुसार ईरान के सैनिक परमाण्विक कार्यक्रम को बाधित करने के लिए ही उस पर यह अंकुश लगाया गया है.
 
यह सवाल पूछना जायज है कि ईरान की संप्रभुता को संकुचित करने का यह अधिकार अमेरिका को किसने दिया है? ईरान को अपना परमाण्विक ऊर्जा कार्यक्रम इच्छानुसार चलाने की पूरी आजादी है. परमाण्विक अप्रसार संधि की किसी धारा में कोई ऐसा प्रावधान नहीं. जब से रजाशाह पहलवी का तख्ता पलट हुआ और ईरान का कायाकल्प इस्लामी गणराज्य में हुआ, तभी से अमेरिका की दुश्मनी ईरान के साथ चल रही है. 
 
जिमी कार्टर के राज में ईरान में अमेरिकी राजनयिकों को बंधक बनाकर सालभर तक कैद में रखा गया था और उन्हें सैनिक हस्तक्षेप से रिहा कराने में सर्वशक्तिमान अमेरिका असमर्थ रहा था. बाद के वर्षों में इस्राइल के जरिये ईरान की परमाणु परियोजनाओं को पटरी से उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी. 
 
चीन के बाद भारत ही ईरानी तेल का सबसे बड़ा आयातक है. चीन की तेल जरूरतों की छह प्रतिशत आपूर्ति ईरान करता है, जबकि भारत के संदर्भ में यह आंकड़ा 19 प्रतिशत के पास पहुंचता है. 
 
जहां चीन की ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान निर्णायक भूमिका नहीं निबाहता, वहीं भारत इस तेल के अभाव में सऊदी अरब तथा अमेरिका पर निर्भर हो क्रमशः अपनी स्वाधीनता गंवा देगा. चीन इस समय अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध लड़ रहा है, अतः कुछ विद्वानों का मानना है कि वह अपनी कठिनाई कम करने को ईरानी तेल के आयात में कटौती कर सकता है, परंतु हमारी समझ में वह ऐसा कतई नहीं करेगा, क्योंकि शी जिनपिंग चीन को अमेरिकी महाशक्ति का समकक्ष समझते हैं और भयादोहन के आगे घुटने टेक नहीं सकते. हां, पौने छह लाख पीपे प्रतिदिन से आयात कुछ कम किया जा सकता है, प्रतीकात्मक रूप से मुठभेड़ से बचने के लिए.
 
भारत के ईरान के साथ रिश्ते सिर्फ आर्थिक-सामरिक नहीं. इनका सांस्कृतिक आयाम भी महत्वपूर्ण है. अमेरिकी दबाव में इनमें खटास आयी है. विडंबना है कि कट्टरपंथी इस्लामी राज्य होने के बावजूद ईरान ने चाबहार बंदरगाह परियोजना का जिम्मा सौंपा है, यह जानते हुए कि समान धर्मावलंबी पाकिस्तान इसे अपने विरुद्ध शत्रुतापूर्ण कार्यवाही मानता है. 
 
कराची के समीप चीन की सहायता से जो ग्वादर बंदरगाह बनाया जा रहा है- मुख्यतः भारत की घेराबंदी के लिए- उसका प्रतितोध चाबहार ही कर सकता है. विश्वव्यापी शिया-सुन्नी वैमनस्य में भी भारत को ईरान अपने साथियों में शुमार करता है. ईरान के बाद दुनिया में सबसे अधिक शिया भारत में ही बसते हैं. 
 
अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस घड़ी भारत को याद दिलाया है कि- 'चूंकि हम तुम्हारी मदद अजहर मसूद के प्रत्यर्पण में कर रहे हैं, इसकी एवज में तुम्हें हमारा आज्ञापालन ईरानी प्रतिबंधों के बारे में करना चाहिए.' इस कुतर्क को स्वीकार करना भारत के लिए आत्मघातक हो सकता है. 
 
क्या महज एक दहशतगर्द की फिरौती हमारे राष्ट्रहित में सर्वोपरि समझी जा सकती है? क्या अमेरिका के इस आश्वासन को वास्तव में असरदार विश्वसनीय समझा जा सकता है? यह ना भूलें कि इसी अजहर मसूद का चीन के राजनयिक संरक्षण के चलते भारत बाल भी बांका नहीं कर सका है. 
 
किसी भी अन्य संप्रभु राज्य की तरह भारत को अपने शत्रु तथा मित्र तय करने का अधिकार है. किसके साथ हम कैसे संबंधों का निर्वाह करते हैं, ये फैसले किसी और के हाथों गिरवी नहीं रखे जा सकते. एक बार ईरान को बधिया बनाने के बाद अमेरिका की कोई दिलचस्पी भारत के साथ सहकार में नहीं रहेगी. 
 
यह भी याद दिलाने की जरूरत है कि चीन की ही तरह भारत को भी अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत के लिए जिम्मेदार ठहराता है. जिन अमेरिकी कंपनियों ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए भारत या चीन में उत्पादक इकाइयां स्थापित की हैं, उन्हें लगातार ट्रंप की नाराजगी झेलनी पड़ी है.
 
चीन के नेताओं ने लंबी लड़ाई के लिए कमर कस ली है. वह जानते हैं कि व्यापार युद्ध तथा आर्थिक प्रतिबंधों की बड़ी कीमत अमेरिका को खुद भी अनिवार्यतः चुकानी ही पड़ेगी! देखना यह है कि पलक पहले कौन झपकाता है! दुर्भाग्य से चुनावों में व्यस्त हमारे नेतागण राजनयिक तथा सामरिक चुनौतियों का सार्थक विश्लेषण करने में असमर्थ नजर आ रहे हैं. सामरिक के नाम पर उनकी नजर पाकिस्तान से आगे पहुंचती ही नहीं है. 
 
हालांकि, भारतीय विदेश सचिव की हाल की चीन यात्रा में निश्चय ही यह मुद्दा भी उच्चस्तरीय द्विपक्षीय वार्ता में उठा होगा, लेकिन यह आशा निर्मूल है कि भारत की कठिनाई कम करने के लिए चीन कुछ करेगा. अंततः उस देश के हितों का सन्निपात पाकिस्तान के साथ अधिक है और रहेगा. चीन हर हाल में दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप में भारत को प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरने से रोकने का हर संभव प्रयास करेगा. अन्यथा नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार में उसके पैर पसारने की गुंजाइश कम हो जायेगी. 
 
यह भारत के दीर्घकालीन हित में है कि वह अमेरिकी दबाव का प्रतिरोध करे और ईरानी तेल के आयात में नाममात्र से अधिक कटौती न करे. ईरान को यह संदेश पहुंचाना जरूरी है कि भारत अमेरिका का मोहरा नहीं.
 

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