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  • Dec 7 2018 4:25AM
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2019 का रास्ता, कई संभावनाएं

मोहन गुरुस्वामी
टिप्पणीकार
mohanguru@gmail.com
 
साल 2019 भी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर होगा, जैसा कि 2014 में देखा गया था. वर्ष 1971 के चुनाव के बाद भारत पहली बार व्यक्ति-केंद्रित चुनाव का साक्षी होगा. उस समय इंदिरा गांधी कांग्रेस का एकमात्र चेहरा और मुद्दा थीं. तब वह कहा करती थीं कि 'जब मैं गरीबी हटाओ की बात करती हूं, तो विपक्ष इंदिरा हटाओ की बात करता है.' 
 
प्रधानमंत्री मोदी भी ऐसा ही करते हैं. वे कहते हैं कि जब वे विकास की बात करते हैं, तो विपक्ष 'मोदी हटाओ' के नारे लगाता है. वे अपने विरोधियों को सत्ता-लोलुप, बेकाम और भ्रष्ट नेताओं के रूप में पेश करेंगे, जो सिर्फ नयी दिल्ली की गद्दी हथियाने के लिए एकजुट हुए हैं. वे सही भी हो सकते हैं. 
 
अभी तक मोदी ने विरोधियों को उन्हें सही में परिभाषित करने का मौका नहीं दिया है. बहरहाल, आम चुनाव सिर्फ 'विकास' के बारे में नहीं होगा.
 
यह भारत के भविष्य की रूपरेखा की बहस पर आधारित होगा. विविधताओं का यह देश एक साझी दृष्टि और समानता, स्वतंत्रता एवं न्याय के सिद्धांत पर आधारित संविधान द्वारा एकता के सूत्र में बांधा गया है. यहां अतीत के विवादों पर विभाजन की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए. 
 
राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव पारंपरिक तौर पर भाजपा और कांग्रेस के बीच में होते रहे हैं. लेकिन, हालिया चुनाव में मुख्य प्रतिद्वंद्विता नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच बना दी गयी. सिर्फ राजस्थान में ही पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ मोर्चे पर डटे हुए हैं. लेकिन, मध्य प्रदेश में आपस में लड़ते कांग्रेसी नेता मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुकाबले खुद को बेहतर साबित करने में असफल रहे हैं.
 
ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ अपने क्षेत्रों और अपनी सीमाओं में ही सिमटे रहे, जबकि एक समय कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता रहे दिग्विजय सिंह प्रचार अभियान से लगभग गायब ही रहे. यह कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पक्ष में एक ही कारक काम कर रहा है, वह है- शिवराज सरकार से नाराजगी की भावना. यह एक ऐसे शासनतंत्र में स्वाभाविक ही है, जहां हर किसी को संतुष्ट नहीं किया जा सकता है. 
 
छत्तीसगढ़ की स्थापना इस इरादे से हुई थी कि शासन में आदिवासियों की आवाज शामिल होगी और उन्हें राज्य की संपदा का लाभ मिलेगा. लेकिन, ऐसा हो न सका. कांग्रेस और भाजपा दोनों ने आदिवासी इलाकों से प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक दोहन किया. इनमें स्थानीय स्तर पर कोई खास अंतर नहीं है. 
 
इन तीन राज्यों में 65 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से सिर्फ सात कांग्रेस के पास हैं. इन राज्यों की 58 सीटें और उत्तर प्रदेश की 72 सीटें लोकसभा में भाजपा के बहुमत का मुख्य आधार हैं. इन चार राज्यों में कांग्रेस के सफाये से एक ऐसी पार्टी को राष्ट्रीय वर्चस्व मिला, जिसके खाते में कुल राष्ट्रीय वोट का मात्र 31 प्रतिशत है. 
 
यदि दो बड़े राज्यों में से एक में कांग्रेस जीत हासिल करती है, तो इसे 2019 में मोदी के पुन: चुने जाने की संभावनाओं पर बड़ी चोट मानी जायेगी. दूसरी तरफ भाजपा के राज्य-स्तरीय नेताओं के सिमटने से मोदी खुद को पूरी तरह से स्थापित कर सकेंगे और भाजपा की विचारधारा को लागू कर पायेंगे. 
 
तेलंगाना दक्षिण भारत का द्वार है. यहां भी दोपक्षीय- के चंद्रशेखर राव और उनकी निर्बाध लोकलुभावन नीति तथा तेलुगु देशम के नेता चंद्रबाबू नायडू के पीछे चलते दिखायी देते कांग्रेस के चेहराविहीन नेताओं- चुनावी संघर्ष है. यह दिलचस्प है कि तेलुगु देशम इस गठबंधन की कनिष्ठ भागीदार है. 
 
पहले ऐसा लग रहा था कि के चंद्रशेखर राव के शासन का खात्मा हो जायेगा, लेकिन उन्होंने अपनी राजनीतिक चतुराई से इस लड़ाई को खुद और तेलुगु देशम के बीच बना दिया है. इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वे फिर जीत जायें और चुनावी अनुमानों को गलत साबित कर दें. अगर ऐसा होता है, तो इसका नतीजा दिलचस्प होगा और उससे कई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं. 
 
तेलंगाना की जीत से तेलंगाना राष्ट्र समिति राहुल गांधी के विपक्ष के सबसे बड़े नेता होने के किसी दावे को झटका दे सकती है. के चंद्रशेखर राव यह भी कोशिश करेंगे कि नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में कोई बड़ा राजनीतिक विकल्प पैदा न हो, जिसके साथ कांग्रेस बड़े साझीदार के रूप में जुड़ी हो. 
 
किसी ने क्या खूब कहा है कि हर राजनीति स्थानीय होती है. आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम कांग्रेस को साथ ले सकती है, क्योंकि वहां उसका कोई खास वजूद नहीं है. के चंद्रशेखर राव भाजपा के खिलाफ गैर-कांग्रेस राष्ट्रीय विकल्प खड़ा करने की एक और कोशिश कर सकते हैं. यदि कांग्रेस तेलंगाना और उत्तर भारत में एक राज्य जीत जाती है, तो यह प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व के लिए बड़ा झटका होगा. इससे भारत के दोनों हिस्सों में कांग्रेस के लिए बड़ा आधार बनाने में मदद मिलेगी. 
 
खैर जो भी हो, 2014 के मुकाबले 2019 में कांग्रेस हिंदी भाषी राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करेगी. उत्तर प्रदेश में 2014 में भाजपा को 42.3 प्रतिशत वोट मिला था, जो 2017 में घटकर 39.6 प्रतिशत हो गया. यहां बसपा और सपा को संयुक्त रूप से भाजपा से अधिक वोट मिला है. अब वे एक साथ हैं. ऐसे में अगले चुनाव में स्थिति बहुत बदल सकती है और भाजपा में कोई नया नेतृत्व आ सकता है, जिसके तेवर पार्टी के पुराने नेताओं की तरह हो. 

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