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patna

  • Jul 17 2019 7:44AM
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भले ही मेरी बोली में बिहारी टोन न हो, लेकिन फिल्म को मैंने दिल से किया है : ऋतिक रोशन

भले ही मेरी बोली में बिहारी टोन न हो, लेकिन फिल्म को मैंने दिल से किया है : ऋतिक रोशन
रविशंकर उपाध्याय/मनीष कुमार
 
पटना : सुपर 30 में बिहारी एक्सेंट और लुक पर लगातार उठ रहे सवाल पर बॉलीवुड के सुपर स्टार ऋतिक रोशन ने चुप्पी तोड़ दी है. प्रभात खबर के साथ विशेष बातचीत में ऋतिक ने कहा कि मैंने बचपन में जो बिहारी भाषा को पिकअप किया वही इस फिल्म में सामने आया है. मेरे मन में यह स्पष्ट था कि फिल्म करते समय मेरे दिमाग में न बिहारी होना चाहिए न मेरे कपड़े, न मेरा लुक. केवल मेरा विल होना चाहिए. इसके बाद जो निकला फिर वही सही है क्योंकि वह मेरे दिल से निकला है.
 
अब वो एक्सेेंट थोड़ा यहां-वहां है, मेकअप थोड़ा इधर-उधर है उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है. क्योंकि मुझे मालूम है कि  हर शॉट पर मैंने दिल से किया है, इससे बढ़ कर कुछ नहीं हो सकता. उन्होंने यह भी बताया कि तीन महीने तक उन्होंने भागलपुर के रहने वाले गणेश से बिहारी भाषा सीखी. उन्होंने फिल्म से लेकर नालंदा विश्वविद्यालय पर विस्तृत चर्चा की. पेश हैं प्रभात खबर से  हुई  बातचीत के प्रमुख अंश. 

-  ‘सुपर 30’ की स्क्रिप्ट पढ़कर सबसे पहले 

क्या ख्याल आया? 
 
सबसे पहला ख्याल आया कि यह बेहतरीन इंस्पिरेशनल स्टोरी है. इस फिल्म को देखकर आशा का संचार हो सकता है. इस फिल्म ने यही किया है. 
 
स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद कैरेक्टर मेरे माइंड में था. उसके बाद मुझे बताया गया कि आनंद सर से मिलना है. मुझे लगा कि एक ऐसी  छवि जो बनी है वह कहीं टूट न जाये, नहीं मिला जाये. लेकिन उनसे मिलना तो था ही. जब मैं आनंद सर ने मिला तो उन्होंने उस इमेज में और भी रंग भर दिया. मेरी मेहनत केवल फिजिकल थी. आनंद सर से मिलकर उस स्क्रिप्ट की आत्मा मेरे भीतर छप गयी थी. 
 
-   फिल्म को प्राचीन नालंदा विवि में रिलीज करने का प्लान था? क्या अब आप वहां जायेंगे? 
 
पिक्चर जब एनाउंस हुआ तभी से यह प्लान था लेकिन कई कारणों से ऐसा नहीं हो सका. हर बार कुछ अड़चन आ गयी. पटना भी मैं पहले ही आना चाहता था लेकिन नहीं आ सका. अब आकर अच्छा लग रहा है.  
 
आपने नालंदा यूनिवर्सिटी के बारे में चर्चा की तो मैं यह अवश्य बताऊंगा  कि नालंदा के बारे इतना कुछ सुन और पढ़ चुका हूं कि मुझे इस पर  काफी गर्व होता है. हमारे देश के बच्चे आज पढ़ने के लिए हार्वर्ड जाते हैं, कभी पूरी दुनिया यहां नालंदा पढ़ने आती थी. यदि हम अभी भी इस पर  ध्यान दें तो हमारा हार्वर्ड यही बन सकता है. 
 
-   फिल्म ‘सुपर 30’ में डार्क स्किन टोन आैर बिहारी एक्सेंट पर काफी सवाल उठे रहे हैं?
 
ये सारी चीजें कुछ मायने नहीं रखती. ट्रेलर को देखकर लोग बोलते हैं, पर इसका कोई ज्यादा मतलब नहीं है. जिनकी आदत बोलने की होती है वह फिल्म देख कर जब बाहर निकलते हैं तो कई चीजों पर बात करते हैं. कहते हैं कि फिल्म में हीरो का रोल तो बहुत अच्छा है पर वह जो शर्ट पहना था वह गंदा था, या फटा हुआ था.  मेकअप क्यों था ऐसा? 
 
फिल्म का काम आपको  उठाकर दूसरी दुनिया में ले जाने का है. यदि फिल्म फेल होती तो आपको यह महसूस होता कि भाषा और मेकअप ठीक नहीं थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि फिल्म काफी अच्छी बनी है. मैंने बचपन में जो बिहारी भाषा को पिकअप किया वही इस फिल्म में सामने आया है. मेरे मन में यह स्पष्ट था कि फिल्म करते समय मेरे दिमाग में न बिहारी होना चाहिए न मेरे कपड़े, न मेरा लुक. 
 
केवल  मेरा विल होना चाहिए. इसके बाद जो निकला फिर वही सही है क्योंकि वह मेरे  दिल से निकला है. अब वो एक्सेेंट थोड़ा यहां वहां है, मेकअप थोड़ा इधर-उधर  है उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है. क्योंकि मुझे मालूम है कि हर शॉट पर  मैंने दिल दिया है, इससे बढ़कर कुछ नहीं हो सकता. 
 
-  जब आप स्कूल लाइफ में थे तो आपका मैथ 

कैसा था?
 
(हंसते हुए)   मैंने इस फिल्म में केवल एक मैथमेटिक्स टीचर की भूमिका निभायी है़   मैं थैंक यू कहना चाहूंगा आनंद सर को की जिन्होंने मुझे इस रोल को निभाने  में मेरी काफी मदद की. मैथ मेरे छात्र जीवन का एक डरावना विषय रहा है.  मैं मैथ में औसत था. जब भी मैथ की परीक्षा की बारी आती थी मैं काफी डर जाता था़  मुझे लगता था पता नहीं पास भी हो पाऊंगा या नहीं.  हालांकि मैथ  में कभी फेल नहीं हुआ 60 प्रतिशत से ऊपर मार्क्स हमेशा आता रहा़  फिल्म में मुझे मैथ के टीचर का रोल निभाने में काफी मजा आया़  

-  आप स्कूल के दौरान बंक भी मारते थे़  खासकर जब आपका ओरल टेस्ट होता था?
 
मुझे स्टैमरिंग की प्रॉब्लम है.  जिसके चलते ओरल एग्जाम में जाना मुझे अच्छा नहीं लगता था़   हकलाहट के कारण मैं किसी से बात करने में डरता था़   किसी  टीचर के सामने कुछ भी कहना मेरे लिए काफी कठिन होता था़ इसलिए स्कूल में  जब भी  ओरल टेस्ट होने वाला होता था उस दिन मैं स्कूल से बंक मार देता था़    कभी  बीमार हो जाता था, कभी मेरा हाथ टूट जाता था तो कभी मुझे मोच आ जाती थी़    मतलब मुझे किसी भी तरीके से वह टेस्ट नहीं देना पड़े इसका मैं बहाने तलाशता.

-  बिहारी अंदाज में बोलना आपने किससे सीखा? 
 
मैंने भागलपुर के गणेश जी से बिहारी भाषा सीखी है. दो से ढाई महीने तक उनसे बिहारी भाषा सीखी, मुझे यह भाषा काफी पसंद आयी. 
   
-  आपके आने के एक दिन पहले फिल्म को बिहार सरकार ने टैक्स फ्री कर दिया. 
 
टैक्स फ्री करना बहुत अच्छी बात है क्योंकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस फिल्म को देख सकेंगे. आनंद सर की कहानी इतनी प्रेरक है कि इससे काफी कुछ सीखने को मिलेगा. जो लोग होपलेस हैं उनसे हम कह रहे हैं कि  होप करो. हम कह रहे हैं कि विपरीत परिस्थितियों में भी आपके लिए रास्ते बन सकते हैं. आपके  ड्रीम पूरे हो सकते हैं.
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