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  • Sep 21 2019 7:47AM
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Film Review : जानें कैसी हैं संजय दत्‍त की 'प्रस्‍थानम'

Film Review : जानें कैसी हैं संजय दत्‍त की 'प्रस्‍थानम'

II उर्मिला कोरी II

फ़िल्म : प्रस्थानम

निर्माता : मान्यता दत्त

निर्देशक : देव कट्टा

कलाकार : संजय दत्त,मनीषा कोइराला,अली फ़ज़ल,जैकी श्रॉफ,चंकी पांडे,अमायरा दस्तूर और अन्य

रेटिंग : डेढ़

फ़िल्म 'प्रस्थानम' साउथ की फ़िल्म तेलुगु का हिंदी रीमेक है लेकिन फ़िल्म देखते हुए यह महाकाव्य महाभारत की याद दिलाता है. फ़िल्म की कहानी की बात करें तो फ़िल्म बलदेव प्रताप सिंह (संजय दत्त) की है जो एक सफल बाहुबली राजनेता है. सत्ता पाने के लिए बलदेव को निजी जिंदगी में कई समझौते करने पड़े हैं. उन्होंने दो बच्चों की मां विधवा सरोज ( मनीषा कोइराला) से शादी की है. सरोज से बलदेव का भी एक बेटा विवान (सत्यजीत दुबे) हुआ है. अब दो बेटे हैं तो अच्छे और बुरे वाली जंग भी होगी. सत्ता किसकी होगी ये भी मारपीट है.

बलदेव सिंह क्या पांचवी बार भी विधायक बन पाएंगे ? उसे धोखा मिलेगा या जीत होगी ?ताकत, लालच, भ्रम, धोखा इन्ही इमोशन्स के साथ फ़िल्म की कहानी कही गयी है.

फ़िल्म का पहला हाफ किरदारों के जानने पहचानने में चला जाता है दूसरे भाग में कुछ ट्विस्ट हैं लेकिन वो रटे रटाये से हैं. फ़िल्म की कहानी में ज़रूरत से ज़्यादा मसाले डालने की कोशिश में कहानी बेस्वाद हो गयी है. फ़िल्म की कहानी में बहुत कुछ चल रहा है. एक साथ कई ट्रैक. कई फ्लैशबैक आते जाते रहते हैं गानों के साथ. ये सब मिलकर कहानी को रोचक बनाने के बजाय बोझिल हो जाती है.

फ़िल्म में सरकार सहित कई फिल्मों का प्रभाव भी दिखता है. इसके साथ ही मन में ये सवाल आता है कि उन फिल्मों को ही इस फ़िल्म के बजाय वापस देख लेना समझदारी होगी.

अभिनय की बात करें तो फ़िल्म में अभिनय के कई बड़े दिग्गज नाम फ़िल्म में हैं लेकिन फ़िल्म में उन्हें मौके नहीं मिले हैं. मनीषा कोइराला का काम पूरी फिल्म में बस अपने परिवार को बिखरते देख आंसू बहाना था. जैकी श्रॉफ के हिस्से में भी ना संवाद आए हैं ना ही प्रभावी दृश्य. चंकी पांडे विलन के किरदार में प्रभावित करते हैं. अली फ़ज़ल भी अपनी भूमिका में छाप छोड़ने में कामयाब दिखते हैं. संजय दत्त अपने चिर परिचित अंदाज़ में नज़र आए हैं. अमायरा दस्तूर और चाहत खन्ना के लिए फ़िल्म में करने को कुछ खास नहीं था.

फ़िल्म के संवाद  कहानी की तरह ही घिसे पिटे हैं. 90 के दशक के डायलॉग लगते हैं. भारी भरकम  लेकिन प्रभावी कम।फ़िल्म का गीत संगीत भी निराश करता है. कुलमिलाकर मंझे हुए कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद यह पॉलिटिकल ड्रामा फ़िल्म निराश करती है.

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