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  • Dec 7 2018 12:57PM

Film Review: सारा का जबरदस्‍त परफॉर्मेंस, सुशांत ने जीता दिल, बेअसर 'केदारनाथ'

Film Review: सारा का जबरदस्‍त परफॉर्मेंस, सुशांत ने जीता दिल, बेअसर 'केदारनाथ'

II उर्मिला कोरी II

फ़िल्म: केदारनाथ

निर्देशक: अभिषेक कपूर

कलाकार: सुशांत सिंह राजपूत,सारा अली खान,नीतीश भारद्वाज,पूजा गौर और अन्य

रेटिंग: ढाई

सैफ अली खान और अमृता सिंह की बेटी सारा अली खान ने अभिषेक कपूर फ़िल्म 'केदारनाथ' से हिंदी फिल्मों में अपनी शुरुआत की है. पर्दे पर उनका आत्मविश्वास प्रभावित करता है. वह जिस भी सीन में दिखी पूरी तरह से उसे अपना बना लिया. सारा की प्रतिभा के साथ फ़िल्म की कहानी पूरी तरह से न्याय नहीं कर पाती है. 'रॉक ऑन' औऱ 'काय पोचे' जैसी सफल फिल्में बना चुके अभिषेक की यह फ़िल्म मूलतः एक प्रेमकहानी है. जिसका बैकड्रॉप 2013 में उत्तराखंड में आयी तबाही पर आधारित था.

कहानी की बात करें तो पंडित की बेटी मुक्कू उर्फ मंदाकिनी (सारा अली खान) को मुस्लिम लड़के मंसूर (सुशांत सिंह राजपूत) से प्यार हो जाता है. दो अलग धर्म के लोगों के बीच प्यार 'केदारनाथ' में भी हिन्दू-मुस्लिम को बांट देता है. दोनों के बीच जंग छिड़ जाती है.

मुस्लिम परिवार को 'केदारनाथ' छोड़कर जाने का फरमान सुनाया जाता है. मंसूर अपने कुनबे के साथ केदारनाथ से चला जाता है इसी बीच प्रकृति कहर बरपा देती है. क्या अपने प्यार मुक्कू को बचाने के लिए मंसूर वापस जाएगा. क्या वह इस तबाही में खुद और मुक्कू को बचा पाएगा. यही फ़िल्म की आगे की कहानी है. फ़िल्म की कहानी कमज़ोर होने के साथ धीमी भी है. प्रेम कहानी होने के बावजूद इससे जुड़ाव नहीं हो पाता है.

फ़िल्म देखते हुए न तो प्रेमी प्रेमिकाओं का दर्द महसूस होता है और न ही आंखें नम होती है. 2012 में केदारनाथ में आयी तबाही की वजह पर्यावरण को क्षति पहुँचाना था लेकिन इस मुद्दे को फ़िल्म में सरसरी तौर पर ही छुआ गया है. फ़िल्म में सुशांत सिंह  का एक संवाद है कि केदारनाथ में कितने पर्यटक साल में आने चाहिए. यह तय होना चाहिए.  पर्यटन का ज़रूरत से ज़्यादा व्यवसायीकरण प्रकृति और मानव दोनों के लिए नुकसानदेह है.

फ़िल्म में इस अहम मुद्दे को उठाया तो गया है लेकिन प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया है. प्रेमकहानी स्थापित करने में कई अहम मुद्दे चूक गए लेकिन प्रेमकहानी के साथ भी फ़िल्म न्याय नहीं कर पायी.

अभिनय की बात करें तो सारा कमाल की रहीं हैं. सुशांत इस बार औसत रह गए. बाकी के किरदारों के लिए करने को कुछ खास नहीं था.
फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी कमाल की है।हिमालय की काफी खूबसूरत तस्वीर परदे पर हर दृश्य में दिखती है. बाढ़ की त्रासदी वाले सीन्स पर स्पेशल इफेक्ट्स पर थोड़ा और काम करने की ज़रूरत महसूस होती है. फ़िल्म के गीत संगीत की बात करें नमो नमो गीत के अलावा और कोई गीत याद नहीं रह पाता है. कुलमिलाकर बेअसर कहानी में सारा का जबरदस्त परफॉर्मेंस ही फ़िल्म की एकमात्र यूएसपी है. 

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