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  • Apr 14 2017 6:38PM

अश्‍लीलता भोजपुरी गानों में नहीं पूरे समाज में फैल रही है : कल्‍पना पटवारी

अश्‍लीलता भोजपुरी गानों में नहीं पूरे समाज में फैल रही है :  कल्‍पना पटवारी

।। बुधमनी ।।

भोजपुरी गानों में कल्पना पटवारी एक जाना-पहचाना नाम है. एक बार वे तान छेड़ती हैं तो कोई उनके गानों को सुने बिना नहीं रह सकता. असम में पैदा हुई कल्‍पना पटवारी ने भोजपुरी गानों को ऐसे आत्‍मसात कर लिया है कि हर कोई कहता है वे भोजपुरी गानों के लिए ही बनीं हैं. खुद कल्‍पना पटवारी का भी मानना है कि भोजपुरी गाने थिरकने पर मजबूर कर देते हैं. कल्‍पना को संगीत की कला विरासत में मिली. उनके पिता बिपीन पटवारी असम के जानेमाने लोक गायक थे. कल्‍पना को बचपन से संगीत में रुचि थी और मात्र 4 साल की उम्र में उन्‍होंने गाना शुरू कर दिया था. कल्‍पना का मानना है कि किसी भी मुकाम को हासिल करने के लिए कड़ा संघर्ष जरूरी है. उन्‍होंने भी खुद को यहां तक लाने में खूब मेहनत की. उन्‍होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी गाया है और उन्‍हें वहां भी लोगों का खूब प्‍यार मिला है. पेश है उनसे बातचीत के कुछ प्रमुख अंश : 

आपकी जन्‍मभूमि असम है और आप भोजपुरी गानों के‍ लिए जानी जाती हैं. कैसा महसूस करती हैं? 

(मुस्‍कुराकर) मुझे बहुत अच्‍छा लगता है. मेरे लिए यह गर्व की बात है कि लोग मुझे भोजपुरी की लोक गायिका के तौर पर पहचानते हैं. आप दूसरे समाज में पैदा होते हैं, अलग परिवेश में पलते-बढ़ते हैं और फिर सबकुछ छोड़कर एक दूसरे प्रदेश के समाज के लोगों से मिलते हैं. एक नया रास्‍ता तलाशते हैं. फिर इसी प्रदेश के लोगों का सपोर्ट आपको मिलता है और आप एक हस्‍ती बन जाती हैं. ये एक सपना जैसा लगता है लेकिन ऐसा मेरे साथ हुआ. उत्‍तर प्रदेश, बिहार और झारखंड तीनों ही राज्‍य भोजपुरी से जुड़े हैं. मुझे यहां अपनापन महसूस होता है. प्‍यार और संघर्ष एक ऐसी चीज है जो आपको कभी हारने नहीं देती. मैंने खूब संघर्ष किया और मुझे यहां लोगों का भरपूर प्‍यार मिला है. 

आपने गायकी में आने के बारे में कब सोचा? 

मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं गायकी के क्षेत्र में आऊंगी. मेरे पिताजी एक गायक हैं. ऐसे में, बचपन से मैं भी पिताजी के साथ कई कार्यक्रमों में  उनके साथ रहती थी. मैंने शास्‍त्रीय संगीत सीखा. मैंने 4 साल की उम्र में पहली बार पब्लिक अपीयरेंस दी थी. मैं अपनी बात‍ करूं तो मुझे लोकगीत पसंद नहीं थे. मुझे डिस्‍को गानों से ज्‍यादा लगाव था और मुझे बप्‍पी लाहिड़ी के गाने खूब पसंद थे. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे एक गायिका के तौर लोगों का इतना सपोर्ट मिलेगा. धीरे-धीरे मैंने गाना शुरू किया और आज मैं इस मुकाम पर हूं.

भोजपुरी गानों में अश्‍लीलता होती है. आप इस बारे में क्‍या सोचती हैं?

- अश्‍लीलता सिर्फ गानों में ही नहीं पूरे समाज में फैल रही है. इससे ज्‍यादा दुखद बात क्‍या होगी कि एक साल की बच्‍ची के साथ रेप हो रहा है, यह भी तो अश्‍लीलता का गिरता स्‍तर है. भोजपुरी गानों में अश्‍लीलता होती है इसपर तो खूब बातें हो रही है लेकिन इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है. दिन-ब-दिन गाने के बोल और अश्‍लील होते जा रहे हैं. मैंने जब ऐसे गानों को ना कह दिया उसके बाद भी ऐसा गाने बंद नहीं हुए बल्कि बढ़ गये. मैं उन लोगों से सवाल पूछना चाहती हूं जो ऐसे गाने बनाते हैं? ऐसे गानों को छोड़कर भी भोजपुरी के कई सारे गाने हैं जो अश्‍लीलता से परे हैं और लोग इन्‍हें बड़े चाव से स़ुनते हैं. 

आपने 30 अलग-अलग भाषाओं में गाया है. आप कैसे इन गानों में तुरंत ढाल लेती हैं ?

गाने किसी भी भाषा के हो मैं उसे इंज्‍वॉय करती हूं. उन गानों के साथ मेरे भी पांव थिरकते हैं. मैं खुद को बॉलीवुड सिंगर की तरह नहीं देखती हूं. मैं हर प्रांत की मिट्टी से जुड़ना चाहती हूं. मुझे अलग-अलग बोलियों और भाषाओं में गाना पसंद है. भोजपुरी गाने मेरे लिए बेहद खास है. इन गानों ने भी मुझे एक खास पहचान दिलाई है. मैं उन बोलियों को लोगों के बीच लाना चाहती हूं जो लुप्‍त होने की कगार पर हैं. 

आपका यहां तक का सफर कैसा रहा ? 

(हंसते हुए) अगर अपने पूरी सफर और संघर्षो के बारे में बात करूं तो पूरा दिन बीत जायेगा. उस समय भी संघर्ष था लेकिन अब संघर्ष का स्‍तर बदल गया है. मैं पुराने समय को याद नहीं करना चाहती. संघर्ष समाज से भी है और खुद को साबित करने में भी. क्षेत्रवाद भी अहम मुद्दा है. आज महिलाएं बहुत ज्‍यादा सुरक्षित नहीं है. ऐसे में खुद को साबित करना मेरे लिए बहुत आसान नहीं था. मैं एक और बात आपको बताना चाहूंगी मैं सरकारी कार्यक्रमों में बहुत कम नजर आती हूं. मैं अपना आदर्श गुरु भूपेन हजारिका को मानती हूं जिन्होंने 'कल्पना' को संगीत में आगे बढ़ने को प्रेरित किया.

वैसे तो आपने बॉलीवुड के कई गाने गाये हैं लेकिन आज रिलीज हुई फिल्‍म 'बेगम जान' में गाने का आपका अनुभव कैसा रहा ? 

बेगम जान एक स्‍ट्रांग करेक्‍टर है (फिल्‍म में बेगम जान का किरदार विद्या बालन ने निभाया है). 'ओ रे कहारो...' गाने में मातृत्‍व बोध को संवारा गया है. मुझे गाने को लेकर कहा गया था कि इस गाने को गंभीरता होनी चाहिए और इस भाव से गाना है कि वो चेहरे के भाव को दिखा सके. मैं 'ओ रे कहारो...' गाने को गाकर संतुष्ट हूं. यह फिल्‍म लोगों को एक नयी दिशा की ओर लेकर जायेगी. यह फिल्‍म भी एक संघर्ष की कहानी कहती है. 

आज सिंगर नहीं होती तो क्‍या होती ? 

मुझे लोगों के बीच रहना पसंद है. मैं एक गायक के तौर पर खुश हूं. लेकिन अगर मैं सिंगर नहीं तो शायद राजनीति में होती या फिर समाज सेवक के तौर पर सक्रिय रहती. मुझे लोगों के बीच रहना अच्‍छा लगता है इसलिए लोगों के बीच रहकर ही कुछ नया करती.   

आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देती है ? 

मैं पूरी तरह से सफल नहीं हुई हूं. मुझे जिस दिन ऐसा लगेगा कि मैं पूरी तरह से सफल और संतुष्‍ट हो गई हूं तो उस दिन मेरा अंतिम दिन होगा. मुझे अभी बहुत कुछ करना है. मैं अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, अपनी बहनों और पति परवेज को देना चाहूंगी जिन लोगों ने हर मोड़ पर मेरा साथ दिया. मैं ऑडियंस को भी अपनी सफलता का श्रेय देना चाहूंगी. उनका सपोर्ट आपके लिए एक पूंजी की तरह होती है. उनकी आंखों की उर्जा को देखकर आपका हौसला लगातार बढ़ता जाता है. 

न्‍यूकमर्स के लिए क्‍या कहना चाहेंगी ? 

अपनी पहचान खुद बनायें. भीड़ से हटकर जो खड़ा होता है उसकी प‍हचान ज्‍यादा होती है. मैं चाहती हूं कि गायक अपनी संस्‍कृति को न भूलें, इसे देश के साथ-साथ विदेशों में भी फैलायें. 

 

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