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  • Dec 9 2019 10:09PM
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नागरिकता संशोधन विधेयक: हिटलर के क़ानून से भी बदतर-ओवैसी

नागरिकता संशोधन विधेयक: हिटलर के क़ानून से भी बदतर-ओवैसी
लोकसभा में नागरिकता (संशोधन) बिल, 2019 पर चर्चा जारी है. इस पर चर्चा के दौरान एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने विधेयक का विरोध करते हुए इसकी कॉपी को फाड़ दिया. हंगामा होने पर पीठासीन रमा देवी ने इसे संसद की कार्यवाही से निकालने का आदेश दिया.

इससे पहले एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि जब संविधान बना था तब और आज समाज में बड़ा बदलाव आ गया है. उन्होंने कहा कि इस बिल में मुसलमानों को नहीं रखा गया है, उससे उन्हें बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता है लेकिन आज मुसलमानों से इतनी नफ़रत क्यों की जा रही है.

उन्होंने कहा कि इस बिल की वजह से असम में एनआरसी के तहत सिर्फ़ मुसलमानों पर केस चलेगा और सिर्फ़ बंगाली हिंदुओं के वोट के लिए बीजेपी सरकार यह सब कर रही है.

https://www.youtube.com/watch?v=6hODuHcRoAQ

ओवैसी ने कहा कि चीन के तिब्बती बौद्धों को इसमें शामिल नहीं किया गया है, ऐसा उन्होंने इसलिए नहीं किया क्योंकि भारत के गृह मंत्री चीन से डरते हैं.

उन्होंने कहा, "यह क़ानून इसलिए बनाया जा रहा है ताकि दोबारा बंटवारा हो और यह हिटलर के क़ानून से भी बदतर है. हम मुसलमानों का गुनाह कि हम मुसलमान हैं. मैं पूछता हूं कि श्रीलंका के 10 लाख तमिल, नेपाल के मधेसी क्या हिंदू नहीं हैं. म्यांमार में चिन, काचिन, अराकान लोगों को क्यों नहीं इसमें शामिल किया गया. यह स्वतंत्रता दिलवाने वाले लोगों की बेज़्ज़ती है."

ओवैसी ने कहा कि महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ़्रीका में लोगों को बांटने वाले नेशनल रजिस्टर कार्ड को फाड़ दिया था.

वहीं, दिन में विपक्ष के विरोध और हंगामे के बाद बीच नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 को लोकसभा में रखते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यह विधेयक किसी भी तरह से संविधान के किसी भी अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं करता है.

उन्होंने दिन में दो बार संसद में अपनी बात रखी. शाम को जब उन्होंने दोबारा सदन में अपनी बात रखी तो उन्होंने कहा कि यह बिल किसी के साथ भेदभाव नहीं करता है, यह केवल भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान के पीड़ित अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने का काम करता है.

गृह मंत्री ने कहा कि इस बिल से किसी को डरने की ज़रूरत नहीं है और उत्तर-पूर्व भारत के लोग किसी के बहकावे में न आएं. उन्होंने कहा कि बिल से अगर कोई भेदभाव साबित होता है तो वो इसको वापस ले लेंगे.

साथ ही उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने मणिपुर को इनर लाइन पर्मिट सिस्टम में शामिल किया है जो एक बड़ा मुद्दा था, वो अब सुलझ चुका है.

मनीष तिवारी का पलटवार

इससे पहले दिन में गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल को लेकर कांग्रेस को घेरा था.

विधेयक के समर्थन में उन्होंने कहा था कि इस विधेयक की इसलिए ज़रूरत पड़ी, क्योंकि कांग्रेस ने धर्म के आधार पर देश का विभाजन किया.

शाम को इसके जवाब में कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा है कि यह बिल असंवैधानिक और समानता के मूल अधिकार के ख़िलाफ़ है.

उन्होंने कहा कि अगर इस देश में दो राष्ट्र की थ्योरी किसी ने दी थी तो वो कांग्रेस ने नहीं बल्कि 1935 में अहमदाबाद में हिंदू महासभा के अधिवेशन में विनायक दामोदर सावरकर ने दी थी.

दिन में अमित शाह ने विधेयक पेश करने की अनुमति मांगी, तो लोकसभा में हंगामा हो गया. अधीर रंजन चौधरी समेत कई विपक्षी नेताओं ने इस मामले पर केंद्र सरकार को घेरा.

लेकिन अमित शाह ने विधेयक के पक्ष में कई तर्क रखे. बाद में मतदान हुआ और 293 सदस्यों ने विधेयक पेश करने के पक्ष में मतदान किया. 82 सदस्यों ने इसके ख़िलाफ़ वोटिंग की.

इसके बाद लोकसभा में विधेयक पेश कर दिया गया.

https://twitter.com/ANI/status/1203947515151732736

इससे पहले सदन में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने ये कहते हुए बिल का विरोध किया कि ये समाज को पीछे ले जानेवाला है, जिसका ध्येय एक ख़ास मज़हब के लोगों को निशाना बनाना है.

अधीर रंजन चौधरी ने हंगामे के बीच संविधान की प्रस्तावना का ज़िक्र किया और कहा कि ये संविधान की भावना के विरूद्ध है जिसमें धर्मनिरपेक्षता, बराबरी और समाजवाद का ज़िक्र है.

सदस्यों का कहना था कि इसमें मुसलमानों को निशाना बनाया गया है. इसपर गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि ये बिल 000.1 फ़ीसद भी मुसलमानों के विरुद्ध नहीं है और विधेयक में कहीं भी मुसलमानों का ज़िक्र नहीं किया गया है.

टीएमसी के सुगत रॉय ने कहा है कि वो विधेयक का विरोध करते हैं.

हंगामा

अमित शाह ने कहा है कि ये बिल किसी भी क़ानून का उल्लंघन नहीं करता है. इसपर संसद में विपक्ष के सदस्य हंगामा मचाने लगे.

अमित शाह ने हंगामा ख़त्म होने के बाद कहा कि बिल किसी भी दृष्टिकोण से संविधान को ठेस नहीं पहुंचाता है.

संविधान की धारा 14 के बारे में उन्होंने कहा, जिसे लेकर अधिकतर सदस्य इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं. उनके मुताबिक़ इससे समानता का अधिकार आहत होगा.

अमित शाह का तर्क था कि मुनासिब आधार पर धारा 14 संसद को क़ानून बनाने से नहीं रोक सकता है.

1971 में इंदिरा गांधी ने निर्णय किया कि बांग्लादेश से जितने लोग आए हैं उन्हें नागरिकता दी जाएगी, तो पाकिस्तान से आए लोगों को नागरिकता क्यों नहीं दी गई.

उन्होंने युगांडा से आए लोगों को नागरिकता दिए जाने का भी हवाला दिया.

भारत के गृह मंत्री का कहना था कि प्रस्तावित क़ानून को समझने के लिए तीनों देश को समझना होगा.

अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के संविधानों का ज़िक्र करते हए अमित शाह ने कहा कि तीनों मुल्कों का राजकीय धर्म इस्लाम है.

बंटवारे के वक़्त लोगों का जाना इधर से उधर हुआ. नेहरू-लियाक़त समझौते का ज़िक्र करते हुए भारत के गृह मंत्री का कहना था कि इसमें अल्पसंख्यकों की हिफ़ाज़त की बात की गई थी जिसका पालन भारत में तो हुआ लेकिन दूसरी तरफ़ ऐसा नहीं हुआ.

इसपर अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि पाकिस्तान में शियाओं पर ज़ुल्म हो रहा है.

https://twitter.com/ANI/status/1203947515151732736

अमित शाह का कहना है कि जिन पड़ोसी देशों का ज़िक्र बिल में हुआ है वहां पारसी, हिंदू, सिख और दूसरे समुदायों की धार्मिक प्रताड़ना हुई है.

अमित शाह का कहना था कि मुसलमानों को नागरिकता के लिए आवेदन देने से किसी ने नहीं रोका है. 'पहले भी बहुत सारे लोगों को दिया है, आगे भी देंगे. धर्म के आधार पर देश का विभाजन कांग्रेस पार्टी नहीं करती तो इस बिल की ज़रूरत नहीं पड़ती.'

विधेयक पर रहा है विवाद

नागरिकता संशोधन विधेयक (Citizenship Amendment Bill) को संक्षेप में CAB भी कहा जाता है और यह बिल शुरू से ही विवाद में रहा है.

विधेयक पर विवाद क्यों है, ये समझने के लिए इससे जुड़ी कुछ छोटी-छोटी मगर महत्वपूर्ण बातों को समझना ज़रूरी है.

नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 क्या है?

इस विधेयक में बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख) से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव है.

मौजूदा क़ानून के मुताबिक़ किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य है. इस विधेयक में पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह समयावधि 11 से घटाकर छह साल कर दी गई है.

इसके लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में कुछ संशोधन किए जाएंगे ताकि लोगों को नागरिकता देने के लिए उनकी क़ानूनी मदद की जा सके.

मौजूदा क़ानून के तहत भारत में अवैध तरीक़े से दाख़िल होने वाले लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकती है और उन्हें वापस उनके देश भेजने या हिरासत में रखने के प्रावधान है.

ये भी पढ़ें: नागरिकता संशोधन बिल: सरकार और विरोधियों के अपने-अपने तर्क

नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में प्रदर्शन
Getty Images

नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 का पीडीएफ़ कहां मिलेगा?

विधेयक का शुरुआती परिचय पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की वेबसाइट पर उपलब्ध है. पीडीएफ़ के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं.

नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर विधेयक को लेकर विवाद क्यों है?

विपक्षी पार्टियों का कहना है कि यह विधेयक मुसलमानों के ख़िलाफ़ है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है.

बिल का विरोध यह कहकर किया जा रहा है कि एक धर्मनिरपेक्ष देश किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव कैसे कर सकता है?

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों असम, मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में भी इस विधेयक का ज़ोर-शोर से विरोध हो रहा है क्योंकि ये राज्य बांग्लादेश की सीमा के बेहद क़रीब हैं.

इन राज्यों में इसका विरोध इस बात को लेकर हो रहा है कि यहां कथित तौर पर पड़ोसी राज्य बांग्लादेश से मुसलमान और हिंदू दोनों ही बड़ी संख्या में आकर बसे हैं.

आरोप ये भी है कि मौजूदा सरकार हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश में प्रवासी हिंदुओं के लिए भारत की नागरिकता लेकर यहां बसना आसान बनाना चाहती है.

ये भी आरोप है कि सरकार इस विधेयक के बहाने एनआरसी लिस्ट से बाहर हुए अवैध हिंदुओं को वापस भारतीय नागरिकता पाने में मदद करना चाहती है.

ये भी पढ़ें: ये बिल भारत को इसराइल बना देगा- ओवैसी

नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में प्रदर्शन
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क्या नागरिकता संशोधन बिल, 2019 राज्यसभा में पारित हो चुका है?

नहीं, यह विधेयक अभी राज्यसभा में पारित नहीं हुआ है.

मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में पेश हुए बिल में कहा गया था कि पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आए हुए हिंदू, सिख, पारसी, जैन और दूसरे धर्मावलंबियों को कुछ शर्तें पूरी करने पर भारत की नागरिकता दे दी जाएगी लेकिन 2016 नागरिकता संशोधन बिल में मुसलमानों का ज़िक्र नहीं था.

यह विधेयक लोकसभा में तो पारित हो गया था लेकिन राज्य सभा में लटक गया. इसके बाद चुनाव आ गए.

चूंकि एक ही सरकार के कार्यकाल में के दौरान ये विधेयक दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए नहीं पहुंच पाया इसलिए बिल निष्प्रभावी हो गया और अब इसे दोबारा से लाया जा रहा है.

ये भी पढ़ें: नागरिकता संशोधन विधेयक पर पूर्वोत्तर भारत में भरोसे का संकट

एनआरसी
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एनआरसी क्या है?

एनआरसी यानी नेशनल सिटिज़न रजिस्टर. इसे आसान भाषा में भारतीय नागरिकों की एक लिस्ट समझा जा सकता है. एनआरसी से पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं. जिसका नाम इस लिस्ट में नहीं, उसे अवैध निवासी माना जाता है.

असम भारत का पहला राज्य है जहां वर्ष 1951 के बाद एनआरसी लिस्ट अपडेट की गई. असम में नेशनल सिटिजन रजिस्टर सबसे पहले 1951 में तैयार कराया गया था और ये वहां अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की कथित घुसपैठ की वजह से हुए जनांदोलनों का नतीजा था.

इस जन आंदोलन के बाद असम समझौते पर दस्तख़त हुए थे और साल 1986 में सिटिज़नशिप एक्ट में संशोधन कर उसमें असम के लिए विशेष प्रावधान बनया गया.

इसके बाद साल 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में असम सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन यानी आसू के साथ-साथ केंद्र ने भी हिस्सा लिया था.

इस बैठक में तय हुआ कि असम में एनआरसी को अपडेट किया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट पहली बार इस प्रक्रिया में 2009 में शामिल हुआ और 2014 में असम सरकार को एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया. इस तरह 2015 से सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह पूरी प्रक्रिया एक बार फिर शुरू हुई.

31 अगस्त 2019 को एनआरसी की आख़िरी लिस्ट जारी की गई और 19,06,657 लोग इस लिस्ट से बाहर हो गए.

ये भी पढ़ें: एनआरसी से हिंदुओं के लिए बंद दरवाज़े खोलेगा सीएबी?

नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में प्रदर्शन
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नागरिकता अधिनियम, 1955 क्या है?

नागरिकता अधिनियम, 1955 भारतीय नागरिकता से जुड़ा एक विस्तृत क़ानून है. इसमें बताया गया है कि किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता कैसे दी जा सकती है और भारतीय नागरिक होने के लिए ज़रूरी शर्तें क्या हैं.

नागरिकता अधिनियम, 2005 में कितनी बार संशोधन किया जा चुका है?

इस अधिनियम में अब तक पांच बार (1986, 1992, 2003, 2005 और 2015) संशोधन किया जा चुका है.

भारतीय नागरिकता ख़त्म कैसे हो सकती है?

भारतीय नागरिकता तीन आधार पर ख़त्म हो सकती है.

-अगर कोई स्वेच्छा से भारतीय नागरिकता छोड़ दे

-अगर कोई किसी दूसरे देश की नागरिकता स्वीकार कर ले

-अगर सरकार किसी की नागरिकता छीन ले.

ये भी पढ़ें:एनआरसी: नागरिकता की चक्की में पिसते असम के बच्चे - बीबीसी विशेष

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