Advertisement

bbc news

  • Aug 23 2019 8:04PM
Advertisement

चिदंबरम मामले में क़ानून के जानकारों के 5 सवाल

चिदंबरम मामले में क़ानून के जानकारों के 5 सवाल

पी चिदंबरम

PTI

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की उस विशेष याचिका पर सुनवाई होनी थी जिसमें उन्होंने हिरासत में लिए जाने से पहले दिल्ली हाईकोर्ट के उनकी अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी ठुकराए जाने के फ़ैसले चुनौती दी थी.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस दिन इसकी सुनवाई के लिए शुक्रवार का दिन मुकर्रर किया और उसी शाम को चिदंबरम हिरासत में ले लिए गए, फिर सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें पांच दिन की पुलिस रिमांड में भेज दिया.

दिल्ली हाई कोर्ट में उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका ख़ारिज किए जाने, सुप्रीम कोर्ट में उनकी अर्ज़ी पर तुरंत सुनवाई न होने और नाटकीय ढंग से उन्हें हिरासत में लिए जाने के इस पूरे घटनाक्रम पर क़ानूनविदों की राय बंटी हुई है.

सुप्रीम कोर्ट में चिदंबरम के आवेदन को लिस्ट नहीं किए जाने पर भी जानकारों की राय बंटी हुई है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने चिदंबरम की अग्रिम ज़मानत याचिका रद्द करते हुए अपने आदेश में कहा, "... तत्काल मामले के तथ्यों से प्रथम दृष्टया प्रकट होता है कि याचिकाकर्ता किंग पिन यानी इस मामले के मुख्य साज़िशकर्ता हैं. क़ानूनी अड़चनें लगाकर क़ानून का शासन स्थापित करने वाली एजेंसियों को प्रभावहीन नहीं बनाया जा सकता है..."

पी चिदंबरम
Getty Images

वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन की फ़ेसबुक पोस्ट हाई कोर्ट में उस दिन ज़मानत याचिका को देर से अस्वीकार करने पर सवाल उठाती है.

इस पोस्ट में उन्होंने लिखा, "मुझे चिदंबरम के मामले में मेरिट्स और डिमेरिट्स की कोई जानकारी नहीं है. लेकिन सवाल है कि किसी जज को इसकी योग्यता को देखते हुए अग्रिम ज़मानत याचिका पर अपना आदेश रिटायरमेंट से दो दिन पहले तक सुरक्षित रखना चाहिए था? अगर जमानत याचिका को अंत में ख़ारिज ही करना था तो आखिर एक साल तक उन्हें गिरफ़्तारी से बचने का लाभ क्यों दिया गया? अगर उनका अपराध बहुत अधिक गंभीर था, जैसा कि अंतिम फ़ैसले से मालूम पड़ता है, तो सुनवाई ख़त्म होने के तुरंत बाद ही आदेश क्यों नहीं दिया गया."

रेबेका जॉन
FB @Rebecca Mammen John

गिरफ़्तारी के ख़तरे को देखते हुए अग्रिम ज़मानत याचिका को तत्काल लिस्ट ना करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्या है?

रेबेका जॉन अपने पोस्ट में लिखती हैं, "मेरा यह सुझाव नहीं है कि सभी मामलों में राहत दी जानी चाहिए, लेकिन लोगों के पास सुने जाने का अधिकार ज़रूर है? कभी तत्काल? कभी तुरंत? और क्या अदालत को इस तथ्य का भी संज्ञान नहीं है कि जिन लोगों की ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी गई उन्हें वर्षों तक जेल में रहना पड़ा."

बीबीसी ने इस मामले से उठे कुछ तर्कसंगत सवालों का जवाब जानने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता सूरत सिंह और कुमार मिहिर से बात की. जिसमें कुमार मिहिर ने यह तर्क दिया, "यह चीफ़ जस्टिस का विशेषाधिकार है. यह न्यायिक से अधिक प्रशासनिक फ़ैसला है."

पी चिदंबरम
Getty Images

1- 24 पेज के इस आदेश का क्या मतलब निकाला जाए?

सूरत सिंहः हाई कोर्ट को अपनी भाषा मर्यादित रखनी चाहिए. अदालत ने कहा है कि प्रथम दृष्टया, इस व्यक्ति को ज़मानत दी जाए या नहीं. आदेश तर्कसंगत होने चाहिए और बहुत लंबे नहीं होने चाहिए.

कुमार मिहिरः अग्रिम ज़मानत याचिका की सुनवाई में अदालत को मुक़दमे की मेरिट में नहीं पड़ना चाहिए. लेकिन चिदंबरम के पक्ष की एक दलील ये थी कि उनका नाम एफ़आईआर में नहीं है और इसलिए उन्हें अग्रिम ज़मानत मिलनी चाहिए. इसलिए अदालत को उनकी भूमिका के बारे में टिप्पणी करने के लिए मजबूर होना पड़ा. अन्यथा उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका रद्द ही नहीं होती. शायद बेहतर शब्दों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था लेकिन अपना आदेश लिखना जज का विशेषाधिकार है.

ज़मानत की स्टेज पर अदालत जो भी कहे, वो प्रथम दृष्टया राय होती है, और ये ट्रायल कोर्ट में बाध्य नहीं होती है. चिदंबरम के ख़िलाफ़ अभी पूरी जांच की जानी बाकी है. सीबीआई ये भी कह सकती है कि उन्हें कोई सबूत नहीं मिला है और कोई मामला ही नहीं बनता है.

कपिल सिबल
Getty Images

2- क्या चिदंबरम को सुप्रीम कोर्ट में जाने का पर्याप्त समय मिल पाया?

सूरत सिंहः जब दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी ज़मानत रद्द की तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का पर्याप्त समय मिलना चाहिए था. अदालत ये कह सकती थी कि उन्हें तय समय तक उन्हें हिरासत में नहीं लिया जाए. अगर अपील करने का समय ही नहीं दिया गया तो ये न्याय नहीं है. हमारी व्यवस्था में अगर किसी व्यक्ति को अभियुक्त बना लिया जाता है तो उसे दोषी मान लिया जाता है भले ही आरोप अदालत में सिद्ध न हो पाए हों. मीडिया भी व्यक्ति को दोषी के तौर पर ही पेश करता है. क्या होगा अगर हाई कोर्ट ग़लत साबित हो जाए. व्यक्ति का सम्मान तो चला गया. उसकी आज़ादी तो चली गई. हाई कोर्ट के बहुत से फ़ैसले बाद में बदल दिए जाते हैं.

कुमार मिहिरः अग्रिम ज़मानत के लिए अदालत तीन-चार चीज़ें देखती है- मामले में व्यक्ति की भूमिका...क्या वो भाग सकता है, हिरासत में उससे पूछताछ किया जाना कितना ज़रूरी है, और उसका कितना प्रभाव है, क्या वो चश्मदीदों और सबूतों को प्रभावित कर सकता है?

आईएनएक्स मीडिया केस में दर्ज एफ़आईआर में उनका नाम नहीं है. इसलिए अदालत को ये देखना चाहिए था कि उन्हें हिरासत में लिया जाना ज़रूरी है या नहीं. अन्य बिंदुओं को भी ध्यान में रखा जाना था. कार्ति चिदंबरम के ख़िलाफ़ मुख्य आरोप ये है कि उन्होंने रिश्वत लेने के लिए अपने पिता के प्रभाव का इस्तेमाल किया. ऐसे में आप हाई कोर्ट के आदेश में कोई कमी नहीं खोज सकते हैं.

3- क्या एजेंसियों ने चिदंबरम को लेकर जल्दबाज़ी की?

सूरत सिंहः मैंने अमरीका में पढ़ाई की है. वहां यदि किसी व्यक्ति पर आरोप लगता है तो पुलिस सबूत जुटाने में पर्याप्त समय लगाती है और अभियुक्त को भी पर्याप्त समय देती है. उसके बाद ही कार्रवाई की जाती है.

भारत में, अगर किसी व्यक्ति को अभियुक्त बना दिया जाता है, पुलिस उसे ऐसे दबोचती है जैसे वो कोई बहुत शातिर अपराधी हो. ये मामला मई से चल रहा था. उन्होंने पहले इसमें कुछ भी नहीं किया. और फिर वो चाहते हैं कि अभियुक्त ईडी के समक्ष दो घंटे में पेश हो जाए. इतनी जल्दबाज़ी क्यों हैं?

एक स्वस्थ लोकतंत्र में, सार्वजनिक व्यवस्था और एक अभियुक्त के अधिकारों के बीच संतुलन होना चाहिए जो उचित प्रतिबंधों के अधीन हो सकता है. दो घंटे की समय सीमा उचित प्रतिबंधों के तहत नहीं आती है. वो उन्हें दो दिन भी दे सकते थे. जैसे कि उन्होंने प्रणय रॉय को एयरपोर्ट पर रोका था. चिदंबरम भारत के वित्त मंत्री और गृह मंत्री रहे हैं. ये हमारे सिस्टम की कमज़ोरी का ही प्रतीक है कि एक पूर्व मंत्री एजेंसियों से भाग रहा है.

कुमार मिहिरः समस्या ये है कि आप इसे पी चिदंबरम के चश्मे से देखने की कोशिश कर रहे हैं. सामान्य नागरिक के तौर पर नहीं देख रहे हैं. ये भूल जाइये कि कोई प्रभावशाली व्यक्ति इसमें शामिल है. यदि आप सामान्य न्यायशास्त्र पर भी चलते हैं, और अगर आप तुरंत क़दम नहीं उठाते हैं तो बहुत कुछ हो सकता है, वो भाग सकते हैं, ऐसा कुछ कर सकते हैं जिससे चश्मदीद प्रभावित हो सकते हैं, उन्हें धमकी दी जा सकती है, दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ की जा सकती है. वो एक वरिष्ठ नागरिक हैं, ऐसे में सीबीआई का तरीका कठोर लग सकता है, लेकिन ये कहना कि उन्हें और समय दिया जाना चाहिए था और एजेंसी को इंतज़ार करना चाहिए था, मेरे नज़रिए से ग़लत है.

इस मामले में हाई कोर्ट का फ़ैसला जनवरी के बाद से ही सुरक्षित है लेकिन जब हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वो किंग पिन हैं तो जांच एजेंसी के पास उन्हें हिरासत में लेने के अलावा बहुत विकल्प बचे नहीं थे.

सुप्रीम कोर्ट
Getty Images

4- सुप्रीम कोर्ट ने चिदंबरम के मामले पर तुरंत सुनवाई क्यों नहीं की?

सूरत सिंहः सुप्रीम कोर्ट में सभी को एक प्रक्रिया का पालन करना होता है. जो सुप्रीम कोर्ट ने किया है वो वैध है, लेकिन एक और वैध तरीका ये हो सकता था कि सुप्रीम कोर्ट उन्हें अंतरिम राहत दे देता. क़ानून की भाषा में एक ही सवाल के कई सही जवाब हो सकते हैं. चिदंबरम का मामला ये रेखांकित करता है कि हम अभियुक्त को तकनीकी न्याय देते हैं लेकिन हमें उन्हें पर्याप्त न्याय देना चाहिए.

कुमार मिहिरः जब आप अदालत में याचिका दायर करते हैं, तब उसमें सभी दस्तावेज़ ठीक से होने चाहिए और उसके बाद ही रजिस्ट्रार को उन्हें अदालत के समक्ष पेश करना चाहिए. कोई कुछ नहीं कह सकता क्योंकि ये ही अंतिम अदालत है.

पी चिदंबरम
Getty Images

5- पी चिदंबरम के पास अब विकल्प क्या हैं?

सूरत सिंहः अब सुप्रीम कोर्ट में उनकी याचिका निष्फल हो चुकी है इसलिए अब उन्हें सामान्य ज़मानत मांगनी होगी. वो निचली अदालत में जाकर सामान्य ज़मानत मांग सकते हैं. अगर उनकी याचिका रद्द हो जाती है तो वो फिर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी जा सकते हैं. अब मुक़दमा चलेगा और चार्जशीट दाख़िल की जाएगी.

कुमार मिहिर: सुप्रीम कोर्ट में जो मामला है वो अब निष्फल हो चुका है. क़ानून कहता है कि किसी भी अभियुक्त को चौबीस घंटे के भीतर ट्रायल कोर्ट में पेश किया जाना चाहिए, वो सांसद हैं तो उन्हें सांसदों के लिए विशेष न्यायालय में ले जाया जाएगा. हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद इस बात की संभावना बहुत कम है कि उन्हें अब ज़मानत मिलेगी. एजेंसियां उनसे पूछताछ करना चाहेंगी.

ये भी पढ़ें:

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

]]>

Advertisement

Comments

Advertisement
Advertisement