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bbc news

  • Mar 14 2019 10:48PM
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सऊदी अरब को अमरीकी सीनेट से तगड़ा झटका

सऊदी अरब को अमरीकी सीनेट से तगड़ा झटका
सलमान
Getty Images

सऊदी अरब ने पिछले तीन सालों से यमन में अमरीकी हथियारों के दम पर युद्ध छेड़ रखा है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ इस युद्ध के कारण 80 लाख लोग भुखमरी की कगार पर खड़े हैं.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जब से सत्ता में आए हैं, सऊदी प्रिंस सलमान उनसे नज़दीकियां बढ़ाकर उनका भरोसा जीतने में कामयाब रहे. बदले में अमरीका न केवल जमाल ख़ाशोज्जी के मसले पर बल्कि यमन के मुद्दे पर भी चुप रहा.

लेकिन अब अमरीकी सीनेट इस युद्ध को समाप्त करने का प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की यमन नीतियों को ज़ोरदार झटका दिया है.

अमरीकी सीनेट ने यमन में सऊदी अरब के नेतृत्व में चल रहे युद्ध को ख़त्म करने का प्रस्ताव पारित किया है.

सीनेट ने यह प्रस्ताव 46 के मुक़ाबले 54 मतों से पारित किया है. खास बात यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप की इच्छा के ख़िलाफ़ जा कर रिपब्लिकन पार्टी के सात सांसदों ने भी इस मुद्दे पर डेमोक्रेटिक पार्टी का साथ दिया.

यह सीनेट का राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की विदेश नीति को दिया एक बड़ा झटका है.

30 दिनों में सैनिकों को हटाने का निर्देश

रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत वाली सीनेट राष्ट्रपति ट्रंप को यह निर्देश दिया गया है कि 30 दिनों में यमन में युद्ध कार्यों में तैनात अमरीकी सैनिकों को वहां से हटाएं.

सीनेटर बर्नी सैंडर्स और रिपब्लिकन माइक ली ने इसका समर्थन किया. अब यह प्रस्ताव डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाली प्रतिनिधि सभा में जाएगी. इस बात की प्रबल संभावना है कि वहां यह पारित हो जाएगा.

इसके पारित होने से एक नया इतिहास बनेगा क्योंकि 1973 के बाद यह पहली बार होगा जब राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों में सीधे तौर पर कटौती की जाएगी.

अमरीकी सांसदों ने दशकों पुराने 'वार पावर रिजॉल्यूशन' का विदेशी धरती पर चल रहे संघर्ष को रोकने में कभी इस्तेमाल नहीं किया लेकिन इस बार वो उस युद्ध से अमरीकी समर्थन को काटने का फ़ैसला किया है जिसने मानवीय तबाही मचाई है.

लेकिन इस बीच व्हाइट हाउस ने वीटो का इस्तेमाल करने की धमकी दी है.

जमाल ख़ाशोज्जी
AFP
जमाल ख़ाशोज्जी

क्या है मामला?

बीते वर्ष अमरीका स्थित सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद से ही ट्रंप का सऊदी अरब को दिया जा रहा समर्थन अमरीकी कांग्रेस में चिंता का विषय बना हुआ है. दोनों पार्टियों के सांसदों ने सऊदी अरब की पर्याप्त निंदा नहीं करने के लिए ट्रंप की आलोचना की है.

यमन युद्ध में अमरीकी समर्थन को समाप्त करने के लिए इसी तरह का एक प्रस्ताव दिसंबर में भी सीनेट ने पारित किया था लेकिन तब रिपब्लिक पार्टी के नियंत्रण वाले सदन में उसे नहीं लिया गया था.

यमन संघर्ष
EPA

यमन युद्ध को शुरू हुए पांच साल होने वाले हैं. अब तक इसमें हज़ारों लोगों की जानें गई हैं जबकि लाखों लोग भुखमरी की कगार पर हैं.

संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक़ यह दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय आपदा है.

सीनेटर क्रिस मर्फी ने मतदान से पहले कहा, "इस फ़ैसले को सऊदी में एक संदेश के रूप में देखा जाएगा कि उन्हें अपने किए को स्पष्ट करने की ज़रूरत है."

उन्होंने कहा, "जब हम स्वेच्छा से युद्ध अपराध में भाग लेते हैं या अपने भागीदारों को नरसंहार में शामिल होने की अनुमति देते हैं, तो हम दुनिया की नज़रों में कमज़ोर हो जाते हैं."

क्या है यमन में संघर्ष की वजह?

यमन में शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच लंबे वक़्त से संघर्ष चल रहा है.

उत्तर यमन में हूती बसते हैं जो शिया मुसलमान हैं और उन्हें ईरान का समर्थन हासिल है.

यमन के बाक़ी हिस्सों में बहुतायत सुन्नी मुसलमानों की है और उन्हें सऊदी अरब का समर्थन है.

उत्तर यमन में बसने वाले इन्हीं हूती विद्रोहियों ने 2011 की क्रांति के बाद राष्ट्रपति अली अबदुल्लाह सालेह को हटा दिया गया था. हालांकि बाद में उनके मारे जाने की ख़बर और फ़ुटेज भी सामने आई.

सालेह को उन्हीं के पूर्व सहयोगी रहे हूती विद्रोहियों ने मार दिया. सालेह पर राजधानी सना में हुए हमले के बाद विद्रोहियों ने मीडिया को बैन कर दिया था. बाद में जनवरी 2018 में उस हमले की फ़ुटेज सामने आई है.

सऊदी अरब ने 2015 से यमन में एक भयानक जंग छेड़ रखी है. सऊदी प्रिंस सलमान के शुरू किए इस युद्ध में हर रोज़ बच्चे, बूढ़े और महिलाओं की मौत हो रही है.

बरा शिबन
BBC
बरा शिबन

"सालेह ने दी थी संघर्षों को हवा"

रिपरिव इन यमन संस्था के साथ काम करने वाले बरा शिबन जो अब लंदन में रहते हैं ने बीबीसी को बताया था, "मौजूदा संघर्ष 33 साल के अत्याचारों का नतीजा है. पूर्व राष्ट्रपति सालेह ने ख़ुद को सत्ता में बनाए रखने के लिए कई संघर्षों को हवा दे रखी थी."

वो कहते हैं, "2004 में हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति सालेह के युद्ध के दौरान लगभग 40 हज़ार लोग मारे गए थे. इससे लोगों में यह भावना गहरे तक घर गई कि सरकार को अपने नागरिकों की कोई चिंता नहीं है और इस युद्ध को हमेशा के लिए क़ायम रखना चाहती है. हूती ख़ुद को नए सत्ता केंद्र के रूप में देख रहे हैं."

1990 में उत्तर और दक्षिण यमन एक ही देश के हिस्सा थे.

वास्तव में दक्षिण हिस्सा ज़्यादा खुशहाल था. लेकिन चार साल बाद सालेह ने जैसे ही सत्ता संभाली देश गृह युद्ध की गिरफ़्त में आ गया.

सुमेर नसीर न्यूयॉर्क में पढ़ाई कर रही हैं
BBC
सुमेर नसीर न्यूयॉर्क में पढ़ाई कर रही हैं

यमन मूल की अमरीकी नागरिक सुमेर नसीर ने बीबीसी को बताया, "2007 में दक्षिण यमन में आंदोलन शुरू हुआ, वे अलग देश की मांग नहीं कर रहे थे, लेकिन अपनी समस्याओं का हल करने की बात कर रहे थे."

वो कहती हैं, "इसलिए मौजूदा संकट का हल तब तक नहीं होगा जब तक दक्षिणी यमन की चिंताओं को दूर नहीं किया जाता."

क्या कहना है संयुक्त राष्ट्र संघ का?

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यमन में इस समय दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय संकट चल रहा है.

वहां चल रहे युद्ध में अब तक लगभग 2.3 करोड़ लोग, जो आबादी का दो-तिहाई हिस्सा हैं, जीवित रहने के लिए मानवीय सहायता पर भरोसा कर रहे हैं.

लगभग 80 लाख लोग अकाल के कगार पर हैं. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 100 वर्षों में ये सब से बुरा अकाल' हो सकता है.

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