B positive

  • Nov 25 2019 2:07PM
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बदलाव न रुका है और न ही रुकेगा, परिवर्तन ही सच है

बदलाव न रुका है और न ही रुकेगा, परिवर्तन ही सच है

विजय बहादुर
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उम्र व परिस्थिति के हिसाब से चीजों में बदलाव आता है, इसे पहचानिए. दो दिन पहले विलक्षण प्रतिभा के धनी गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन हो गया. वो पिछले 40 वर्षों से सिजोफ्रेनिया से पीड़ित थें. वशिष्ठ नारायण की गिनती जीनियस ऑफ जीनियस में की जाती थी. उन्होंने ग्रामीण परिवेश से निकलकर नासा जैसे संस्थान में रिसर्च का काम किया और अल्बर्ट आइंसटीन के सापेक्षता के सिद्धांत को चैलेंज करने की कोशिश की. लेकिन, शीर्ष में पहुंच कर वो सिजोफ्रेनिया के शिकार हो गये तथा निधन तक इससे जूझते रहें. इस बीमारी के कारण उन्हें जिस ऊंचाई तक जाना चाहिए था या यूं कहें उनकी प्रतिभा का जो लाभ दुनिया को मिलना चाहिए था, उसमें कमी रह गयी. वो क्यों अचानक से सिजोफ्रेनिया के शिकार हो गये, उसके बारे में बहुत सारी बातें कही जाती है. कुछ लोग इसे पारिवारिक कलह, तो कुछ लोग कार्य क्षेत्र में सामंजस्य नहीं रख पाना ही मुख्य कारण मानते हैं. इस कारण ही वो अवसाद में चले गये.

हाल में ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेटर मैक्सवेल और निक मेडिनसन ने मानसिक परेशानी के कारण खेल से अवकाश ले लिया. वहीं, कुछ वर्ष पहले नामचीन रैपर हनी सिंह को ड्रग्स की लत से निजात पाने के लिए सुधार गृह जाना पड़ा. इसी तरह पिछले वर्ष नामचीन कॉमेडी शो होस्ट कपिल शर्मा भी अचानक से अवसाद में चले गये थे.

ऊपर दिये गये जितने लोगों की चर्चा मैंने की है, इसमें एक चीज कॉमन है. ये सभी अपने-अपने क्षेत्र के बहुत नामचीन लोग हैं (या थें). लेकिन, इन सभी का करियर मानसिक परेशानी के कारण अचानक से नीचे चला आया या गड़बड़ा गया. मन में विचार आता है कि ऐसी कौन सी चीज है, जिसके कारण ये लोग शीर्ष पर पहुंच कर भी अपने को बनाये नहीं रख सके.

कुछ दिनों पहले मैं इनसे जुड़े विषयों पर ही ऑस्ट्रेलिया के सबसे स्थापित परफॉर्मेंस साइकोलोजिस्ट डॉ फिल जॉनसे के विचार एक अखबार में पढ़ रहा था. उसमें उन्होंने इस तरह की बड़ी हस्तियों के माइंडसेट पर बहुत ही अहम जानकारी दी. उन्होंने बताया कि इस तरह के लोगों के जीवन में दो तरह की चीजें घटित होती है. एक निराशा और दूसरा पछतावा. निराशा तब होती है जब उन्होंने अपना बेस्ट दिया, लेकिन वो अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकें, क्योंकि किसी ने उनसे बेहतर किया, जिसके कारण वो दूसरे पायदान पर रह गये और पछतावा तब होता है जब खुद से अपने आपको बर्बाद कर लिया. इसके कारण कुछ भी हो सकते हैं.

हमें यह भी समझना होगा कि सफलता और असफलता हमारे हाथ में नहीं है. अपने लक्ष्य को पाने के लिए अपनी क्षमता के हिसाब से सौ फीसदी देना हमारे अख्तियार में है. हम सफलता पाने के बाद भी अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखते हैं. ये हमारे उम्मीदों के अंदर है और अगर हम अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं रखते हैं और दूसरे लोग बेंचमार्क ऊपर करते जाते हैं, तो फिर हम अपने को बर्बादी की तरफ उन्मुख कर देते हैं.

हाल के दिनों में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण भी इस तरह की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला है. सोशल मीडिया के कारण फीडबैक के प्रवाह पर कोई रोक नहीं है. इसकी वजह से जब फीडबैक बढ़िया मिलता है, तो सेलेब्रिटीज खुश होते हैं, लेकिन जब फीडबैक नकारात्मक मिलता है, तो तनाव में बढ़ोतरी कर देता है.

डॉ जॉनसे बताते हैं कि दबाव से निपटने का सबसे बेहतर तरीका क्या हो सकता है. उनका कहना है कि जिन चीजों को हम देख नहीं सकते हैं, उसे फिक्स करना भी सही नहीं है. हम दबाव को देख नहीं सकते हैं, लेकिन दबाव में हमारा व्यवहार कैसा हो, ये हम निर्धारित करने की कोशिश कर सकते हैं. नर्वस, तनाव जैसी चीजें ईंधन का काम करती है और ये ताकत व विध्वंस दोनों कर सकती है.

मेरा मानना है कि इंसान की क्षमता की कोई सीमा नहीं है, लेकिन हर इंसान की क्षमता का एक शीर्ष है. हम शीर्ष पर पहुंच कर इस बात को व्यावहारिक रूप से समझे कि आज हम शीर्ष पर हैं. संभव है कल हम इस स्तर को बरकरार नहीं रख सकें. कोई कितना भी शीर्ष पर जाता है, वो एक दिन ढलान की तरफ जाता ही है, क्योंकि उम्र और परिस्थिति के हिसाब से चीजों में बदलाव होना ही है. इस बदलते हालात के हिसाब से खुद में भी बदलाव कर कंपीटिटिव रख सकते हैं, लेकिन हालात को बदलना किसी के लिए भी संभव नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि जिन बड़े लोगों ने अपने को समय के साथ बदला व तालमेल बिठाया, वो अपने को शीर्ष पर लंबे समय तक रख पाते हैं. सबसे बेहतरीन उदाहरण सिनेमा जगत के महानायक अमिताभ बच्चन हैं. एक समय था जब लोगों के बीच एंग्री यंग मैन के रूप में उनका सिक्का चलता था, लेकिन उम्र के साथ उन्होंने अपने आपको बदला. आज चरित्र के रोल और कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से अपने को कंपीटिटिव और रेलिवेंट बनाये रखा है.

कहने का आशय है कि आप बदलाव को नहीं रोक सकते हैं. बेहतर है उसमें अपनी भूमिका और उपयोगिता तलाशिये.

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