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asansol

  • Feb 14 2019 12:59AM

आसनसोल : महिलाओं का हार्मोनल चक्र बना मुख्य बाधक, नारीवादी आंदोलनों से सोच में आया बदलाव, लेकिन मंजिल दूर

 आसनसोल : काजी नजरूल यूनिवर्सिटी (केएनयू) के प्रशासनिक भवन स्थित सभागार में विज्ञान में उपेक्षित नारी विषय पर बुधवार को सेमिनार आयोजित हुआ. इसका आयोजन यूनिवर्सिटी के फिलॉस्फी विभाग ने किया.

यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति सह अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ सजल कुमार भट्टाचार्या,  कला संकाय के डीन सह हिंदी के विभागाध्यक्ष डॉ विजय कुमार भारती, फिलोस्फी विभाग के प्रधान डॉ कल्याण बनर्जी, अनन्या पॉल, आप्रि दत्त, हिंदी की प्रतिभा प्रसाद, बांग्ला विभाग की नंदिनी बनर्जी व विभिन्न विभागों के अध्यापक व फिलोस्फी विभाग के स्टूडेंट्स उपस्थित थे.

 

यादवपुर यूनिवर्सिटी के फिलॉस्फी विभाग के प्रोफेसर डॉ प्रयास सरकार ने महिलाओं की सामाजिक दशा, उनके प्रति पुरूषों की सोच और पुरूष प्रधान समाज में नारियों की समाज के प्रति सोच को विवेचित किया. उन्होंने कहा कि समाज भले ही पुरूष और नारियों को बराबरी का दर्जा देने का नारा बुलंद करता हो. परंतु भारत जैसे देश में जमीनी स्तर पर इसे अमल में लाने में अभी लंबा वक्त लगेगा. उन्होंने कहा कि विज्ञान ही नहीं अन्यान्य विषयों के गवेषणा कार्यों में भी नारियों को स्थान नहीं दिया जा रहा है.
 
वे उपेक्षा का शिकार हो रही हैं. लैंगिक भेद पुरूष और नारी दोनों को समान रूप से आहत करती हैँ. उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर नये रोगों के निदान के लिए होने वाले औषद्यीय अनुसंधानों में कंपनियां विभिन्न चरणों में होने वाले शोध के दौरान दवाओं का प्रयोग जिन चूहों या पशुओं पर करते हैं, वे भी पुरूष होते हैँ. इसके लिए उन्होंने महिलाओं के हार्मोनल चक्र को एक प्रमुख कारण बताया. जन्म दर नियंत्रण के लिए वैश्विक कंपनियों द्वारा बनाये गये उत्पादों का पहला प्रयोग पुरूषों पर ही किया गया.
 
उन्होंने कहा कि पुरूष और नारी के समानता के नारे के बावजूद देश के विभिन्न स्थानों विशेष कर ग्रामीण इलाकों में नारियों को लेकर पुरानी सोच में कुछ विशेष बदलाव नहीं आया है. पुरूष प्रधान समाज में नारियां अभी भी खुद को भोग की वस्तु और घर की चारदिवारी में घिरी पाती हैँ. 
 
उन्होंने नारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए दुनिया भर में चल रहे नारीवादी आंदोलनों शिक्षा एवं समाज में समानता एवं नेतृत्व का अधिकार, समान वेतन, समान सम्मान, यौन एवं घरेलू हिंसा से बचाव, महिलाओं के मताधिकार, यौन उत्पीडन, जैसे मुद्दों पर चल रहे सुधारों का हवाला देते हुए कहा कि इन आंदोलनों से नारियों की सोच में बहुत बदलाव आया है.
 
उन्होंने जोर दिया कि नारियों को खुद को शोषित होने से बचाने के लिए दूसरों से मदद की अपेक्षा के बजाय खुद ही आंदोलन करने को आगे आना पडेगा. इसके लिए नारियों को अपने सोच को बदलना होगा.
 
उन्होंने कहा कि ग्रामीण अंचलों में बेटों को बढ़ावा और बेटियों को शिक्षा, उपहार आदि मुद्दों पर उपेक्षित रखे जाने का चलन है. नारियों को खुद ही इस सोच से परे हट कर अपने अंतर्मन की आवाज को समाज के सामने रखना होगा. इसकी शुरूआत उन्हें अपने घर से ही करनी होगी. उन्होंने कहा कि पुरूष प्रधान समाज में नारियों को उम्र के हर अवस्था में किसी न किसी पर आश्रित होना विवशता है. बाल्यावस्था में पिता पर, विवाहोपरांत पति पर और वृद्धावस्था में पुत्र पर निर्भर रहना पड़ता है.
 

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