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  • Jan 12 2019 6:34AM
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आसनसोल : हिंदी का अलग स्टॉल न होने से पाठकों में भारी हताशा

आसनसोल :  हिंदी का अलग स्टॉल न होने से पाठकों में भारी हताशा
आसनसोल :  जनगणना के आंकड़ों के आधार पर आसनसोल महकमा क्षेत्र में 42 प्रतिशत आबादी हिंदी भाषी, 22 प्रतिशत आबादी उर्दू भाषी और शेष 34 प्रतिशत में अन्य भाषाई   आबादी है. 
 
हिंदी भाषियों की इतनी बड़ी आवादी होने के बावजूद भी युवा शिल्पी संसद द्वारा आयोजित 38 वें आसनसोल पुस्तक मेला में हिंदी भाषियों के लिए कुछ भी नहीं है.  हिंदी पुस्तकों का अलग से एक भी स्टॉल नहीं है .
 
 हिंदी पुस्तक प्रेमियों ने मेले के औचित्य पर ही सवाल उठाना शुरू किया है. आसनसोल शहर मिश्रित संस्कृति का बेजोड़  मिसाल है. ऐसे में पर्याप्त संख्या में हिंदी पुस्तकों के  पुस्तक मेला न होने पर हिंदी पाठक काफी हताश है. 
 
आयोजन कमेटी के सचिव डॉ नबारूण गुहाठाकुरदा ने कहा कि एक ही समय में कोलकाता के साथ-साथ बर्दवान, मालदह और खड़दह में जिला पुस्तक मेला का आयोजन चल रहा है. जिसके कारण काफी प्रकाशक मेला में नहीं आ सके है. जिसमें हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू प्रकाशक  भी शामिल है . 
 
जिसके कारण हिंदी और उर्दू के किताब का कोई अलग से स्टॉल नहीं लगा. अंग्रेजी में भी पिछले वर्ष के मुकाबले 40 फीसदी स्टॉल कम है. किसी भाषा के प्रति संस्था अशक्त नहीं है. इस बार परिस्थिति ऐसी बनी कि हिंदी और उर्दू के प्रकाशक नहीं आये. पिछले वर्ष हिंदी के तीन और उर्दू का एक स्टॉल यहां लगाया गया था. आसनसोल शिल्पांचल को मिनी भारत की संज्ञा काफी बड़े बड़े हस्तियों ने दी है . 
 
क्योंकि यहां मिश्रित संस्कृति है . यह एक औद्योगिक नगरी होने के कारण यहां हर जाति, धर्म, प्रान्त के लोग आकर बसे है. सेल आईएसपी, इसीएल, रेलवे, दुर्गापुर स्टील प्लांट आदि बड़े बड़े उद्योगों के अलावा सैकडों लघु, मझौले उद्योगों में कार्य करने वाले विभिन्न प्रान्तों के लोग है . 
 
इसलिए यहां की संस्कृति मिश्रित संस्कृति बन गयी है और इसे मिनी भारत की संज्ञा दी जाती है . ऐसे में आसनसोल पुस्तक मेला में सिर्फ बंगला भाषियों के लिए ही पुस्तक के स्टॉल होना. मिश्रित संस्कृति को प्रभावित किया है . कुल 60 पुस्तक के स्टॉल इसबार मेले में है. जिसमे हिंदी का एक भी नहीं है .
 

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