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  • Oct 3 2017 12:40PM
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सोनाली मिश्रा की कहानी ‘सफर की महंगाई’

सोनाली मिश्रा की कहानी ‘सफर की महंगाई’

 

सोनाली मिश्रा युवा साहित्यकार हैं. उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद(साहिबाबाद) की रहने वाली हैं. हाल ही में इनका एक कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुआ है. संपर्क :-sonalitranslators@gmail.com. आज पढ़ें इनकी कहानी ‘सफर की महंगाई’

सफ़र की महंगाई!
वह ठहर गया था, कहीं राह में बोला ;सुनो, अब नहीं चलूंगा तुम्हारे साथ, बस समझ लेना यहीं तक था सफर; वह रेत में पैरों के निशान देखती रही, कुछ क्षण पूर्व तक उसके कानों में जो शब्द बांसुरी बनकर गूंज रहे थे, वे अब दहकता हुआ लावा हो गये, उसने कुछ सवाल नहीं किया, न ही रोई, दरी पर ताश के पत्ते बिखते हुए थे, जिससे वे दोनों अपना मन बहला रहे थे, उन्हें समेटा, और जैसे चलने को हुई, वह फिर से बोला पर तुम मुझे फोन कर सकती हो, अपने घर पहुंच कर मुझे, बता देना और जब तक टिकट न मिले, तुम मेरी मेहमान ही हो!

फ़िक्र मत करो!
लड़की ने धीरे से अपने बालों को पीले क्लचर में समेटा जैसे डूबते हुए सूरज का सारा पीलापन अपने बालों में समेट लेना चाहती हो, और कहा ;नहीं, अब तुम्हें जिंदगी तो क्या हर क्षण से विदा करती हूं ; उसने समंदर के किनारे लहर के साथ खेलना चाहा, पर असफल हुआ, वह हंस पड़ी, बोली ;देखा, लहर तक तुम्हारी मर्जी की गुलाम नहीं, और तुम मुझे केवल अपनी बातों के कारण दुःखी करना चाहते हो, जाओ, इस सफर में आगे के तुम मेरे साथी नहीं हो ; उसका दुपट्टा जब उड़ने लगा तो लड़के ने पकड़ना चाहा, पर वह एकदम से पीले क्लचर पर अटक गया, वह हंसी, दंभ की हंसी, बोली ;जाओ, तुम जाओ; वह जाने लगा था. लड़की ने पानी में डूबते हुए सूरज को देखा. उस दिन उसे अपना दुःख उन लहरों पर बहते हुए दिखा! जैसे- जैसे सूरज नीचे जा रहा था, उसका दुःख सिंदूरी होकर और भी तेज होता जा रहा था.
लड़की ने एक बार फिर से रेत को देखा. उसे अहसास हुआ जैसे उन पैरों के निशान पर एक और निशान उभर आये थे, और लड़के ने एकदम निष्ठुर होकर उन्हें हटा दिया हो! उसने अपने नीचे वाले निशान एकदम सुरक्षित कर लिए और ऊपर वाले हटा दिए! लड़की बहुत देर तक वहीं बैठी रही थी. वह बहुत देर तक खुद से बातें करती रही थी. शायद इस कहानी में लड़की का उदास होना ही लिखा होगा. लड़की ने आंखें बंद कीं, उसकी आंखों के सामने वह सब था जो नहीं होना चाहिए था, और जो होना चाहिए था, वह समुद्र में डूब रहा था.
लड़की को सब याद आ रहा था!
 
उसे वह दिन याद आ रहा था, जब एक सुबह वह गलत रास्ते पर चली गयी थी. उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव से आई हुई लड़की ने केवल अपने गांव में नदी ही देखी थी. उसकी नदी उसे अपनी बिटिया मानती थी. लड़की नदी में सूरज ढलते हुए देखती थी. मगर न जाने कैसे एक ही छलांग में वह इतनी दूर आ गयी थी! नदी ने उससे पूछा भी था, कि वह कहां जा रही है! लड़की ने नदी से खुश होकर कहा था “मुंबई!” नदी हुलसी थी, नदी खुश हो गयी थी. उसने कहा“जाओ, वहीं किसी न किसी रूप में मैं भी मिलूंगी! मैं मिलती हूं, समुद्र से! और मेरा पानी उसमें
जाकर मिल जाता है! और तो सब ठीक है, मगर मुआ खारा हो जाता है! तुम इस खारे पन से दूर रहियो बिट्टो!”
नदी की बात सुनकर लड़की हंसी थी! बोली “मिलन के बाद खारापन कहां से आएगा!”
नदी रुआंसी हो चली थी “आतो है बिट्टो! जब एकतरफा प्रेम होत है! हमाई मिठास ले लेत है
और हमें खारोपन देत है!”
लड़की ने उसका पानी अपनी हथेलियों में बाँध लिया! और नदी का मीठापन उसकी हथेलियों से होता हुआ उसके पूरे शरीर में भर गया था. जैसे सीता मैया ने धर लिया आसीस सम्हाल कर!
जैसे युगों युगों से चली आ रही मीठी लड़की की परंपरा में जुड़ गया एक और! लड़की आहिस्ता से उठी और ट्रेन की तरफ बढ़ चली थी.
रास्ते में उसकी हथेलियों में सरसराहट होती रही थी, भला प्रेम भी कहीं हथेलियों से होकर गुजरता है! लड़की उसी के लिए तो जा रही थी! उसके मां बापू गुस्सा रहे थे! आखिर ऐसा कहीं होता है? जवान लड़की है! कहीं कुछ ऊंच-नीच हो गयी तो? मगर रिश्तेदारों ने कहा “काहे, भैया के संग भेज दयो! अब लरकी को रहन इत्ती दूर है, तो एक बार उस सहर को देख अइए, तो सही ही रहिये! और महंगो कमान वारो लरका है!”
महंगो लरका सुनकर लड़की का पीला छींट वाला कुर्ता कुछ और पीला हो जाता था. हां, लड़का महंगा था, कहने को वहीं किसी से शादी कर सकता होगा, मगर गांव से ही शादी करना चाहता था. और चाहता था कि पहले लड़की इस शहर को देख ले, लड़की अपने साथ नदी की मिठास और प्रेम को लेकर अपने भाई के साथ आ गयी थी.
लड़का देखने में बहुत सुंदर था, जितना रिश्तेदारों ने बताया था उससे कहीं ज्यादा! वह उस ज्यादा में खो गयी थी. लड़की अपने भाग को सराह रही थी. इतना अच्छा और महंगा लड़का उसे मिल रहा है! छोटी सी नदी की मिठास इस समुद्र में मिलने के लिए तैयार थी. लड़के का मन था, लड़की कुछ दिन मुंबई में रहे, मुंबई वाली लड़कियों की तरह सोचना शुरू करे और मुंबई वाली ही हो जाए, जिससे वह थोड़ा गर्व से अपने दोस्तों से अपनी होने वाली बीवी को
मिलवा सके!
लड़की उसके सामने थोड़ा भयभीत रहती, वह उसका हाथ अपने हाथों में लेकर अपने सपने बताता तो उसकी हथेलियों से नदी का पानी फिसल पड़ता! उसे लगता कि यह क्यों नहीं इस मिठास में भींग जाता? वह हमेशा ही इतना प्रैक्टिकल क्यों है? लड़की उस छोटे से फ़्लैट में नदी से बातें करती! वह नदी को अपने साथ ही तो ले आयी थी. नदी उससे सब्र रखने को कहती!
फिर लड़की के कानों में महंगा लड़का की आवाज़ आती और वह एकदम सतर होकर बैठ जाती!
हां, उसका एकदम सतर होकर बैठ जाना ही सबसे सरल काम था!
 
उसने अपने मां बापू को फोन करके कह दिया था, कि इस महंगाई में भी उसे इतना महंगा लड़का पसंद है! इसी बीच गांव की एक मुस्कान उसे बार बार याद आती रही थी. मगर वह महंगी नहीं थी. अपने शहर और गांव की मुस्कान का क्या? कहीं किसी भी कोने से फूट पड़ती हैं! मां बापू ने उसे गांव की किसी भी निगाह में अटकने से मना किया था. खुले आसमान में कहीं सपने पूरे होते हैं? गांव में खुले आसमान के नीचे कभी ठिठुरन होती है, कभी सावन पूरे गांव को ही बहाकर ले जाता है! अभावों की गोद में गांव की मुस्कान केवल गांव का खुला आसमान दे सकती है, जहां पर खेत है, जानवर हैं, गैया है, और सुख दुःख की तान है! मां बापू इन सबसे ऊब गए थे और उसे बाहर भेजना चाहते थे! चाहे कितना भी महंगा क्यों न हो, अपनी बेटी के लिए चाहते थे. और इसी चाह में उसे भेज दिया था इतनी दूर!
लड़की अभी भी उसी जगह खड़ी थी! वह देख रही थी, उसकी हथेलियों से पानी रिस रहा है! नदी उसके सामने खड़ी हो गयी! जैसे शांतनु के सामने गंगा खड़ी हो गयी थीं, और शांतनु अचकचा गए थे, उन्हें सामने देखकर! मगर शांतनु के सामने तो गंगा कुछ शर्तों के साथ आई थीं, ये नदी उसके सामने किन शर्तों के साथ आई है! अभी अभी तो समुद्र अपना सारा खारापन उसकी देह में डाल गया है!
हाँ, तभी नदी बाहर निकल आई! वह कैसे लड़की की देह के खारेपन के साथ रहती! देह में या तो मिठास रहेगी या खारापन ही! लड़की लड़के को जाता हुआ देख रही थी! मां ने चलते समय बहुत ही आस से कहा था “हमाई पहुँच से दूर को लरका है, मगर तुम्हें खुस रखिये! तुम सम्हार कर रहियो!”
अब वह मां को क्या बताती कि महंगा होना और मीठा होना, दो अलग बाते हैं! रात होने लगी थी, मां उसे गांव से पुकार रही थी, बापू ढोर लेकर घर की तरफ आ रहा होगा और उसके इंतज़ार में दो निगाहें थीं, जिन्होंने उसे अदृश्य रूप से ही बांधकर कुछ निवेदन किया था, रात में समुद्र के किनारे वे दो निगाहें भी उसके सामने आ गईं!
 
“नदी, तुम क्यों आई हो! देख रही हो, वह चला गया है!” उसने पीला क्लचर फिर से अपने बालों से निकाल लिया था. उसके लंबे बालों ने रात को थोडा और जल्दी उसके करीब कर दिया! रात ने चुपके से कदम धरा, और वे निगाहें और उसकी पीठ पर चस्पा हो गईं! लड़की बेचैन सी हो गयी! नदी ने पूछा “खारापन चाहिए या मिठास?”
लड़की भड़की हुई थी “अब ये क्या सवाल है? मुझे मिठास ही चाहिए!” वह एकदम से बोली! “तुम्हारे लिए साथी कौन हो सकता है?” नदी ने दोबारा सवाल किया!
“तुम मुझे परेशान मत करो!” उस समय समुद्र के किनारे, बस वह और नदी और दो निगाहें थीं!
उन निगाहों में कुछ सवाल था! एकदम से वे निगाहें उसके सामने आ गईं और उससे सवाल करने लगीं!
लड़की पहले तो सहम गयी और फिर उन निगाहों से कहा “क्यों मेरे पीछे पीछे हो!”
 
उन निगाहों ने पहले तो लड़की को घूरा और फिर एकदम से झुक गईं! लड़की को उन निगाहों का तीखापन भला नहीं लगा! अभी उसने उस महंगे लड़के को अपनी ज़िन्दगी से दफा किया था. उसे लग रहा था इतनी हिम्मत उसने पहले कर ली होती तो इतना लंबा सफ़र और इतना अपमान न झेलना पड़ता!
लड़के ने उससे साफ़ कह दिया था कि वह अच्छी है, मगर उसके साथ चलने लायक नहीं! उसे सामान समेटकर आज ही निकलना होगा! उसे फोन भी गांव में करना होगा! उसका भाई टिकट कराने गया था! रात की ट्रेन मिल जाए तो उसीसे निकल जाये. मगर उसने भाई को एक दिन बाद की टिकट लाने के लिए कहा था. एक दिन वह इस शहर को अपनी नजर से देखना चाहती
थी. फिर मौक़ा मिले या न! वह इस शहर को जीकर जाएगी! वह रोती बिसूरती क्यों जाए?
नदी उससे बहुत कुछ बात करना चाहती थी. उसने हथेलियों में फिर से नदी को समा लिया.
नदी ने देखा कि इस शहर का खारापन उस लड़की को छू नहीं पाया है! वह अछूती सी है! उसने
इस शहर के दड़बे नुमा फ़्लैट से दिखने वाले आसमान के बजाय अपने गांव का खुला आसमान चुन लिया है!
लड़की ने लड़के को जाते हुए देखा! उसने देखा कि लहरों ने उसके पैरों के भी निशान मिटा दिए थे! उसने रेत पर अपने पैरों के निशान बनाए और महंगे लड़के का महंगापन भी!
 
इतने दिनों में उसके अन्दर भी एक खारापन आ गया था, लड़की वहीं लेट गयी! लहरें उसके तलवों को छूकर वापस जा रही थीं, वह इस शहर का खारापन उसके तलवों से सोखकर जा रही थीं!
उस रात लड़की ने लहरों को सारा खारापन दे दिया और गांव की उन निगाहों को नदी के साथ हथेलियों में सहेज लिया!
मां को समझाएगी “महंगा और मीठा होने में अंतर है, उसे मिठास चाहिए! उसे गांव का खुला
आसमान चाहिए!”
गांव में कोई बस अड्डे पर पिछले एक सप्ताह से प्रतीक्षारत बैठा है! गंगा को शांतनु को इतनी प्रतीक्षा नहीं करानी चाहिए!


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