Advertisement

Novelty

  • Oct 17 2017 3:41PM
Advertisement

जब चांद का धीरज छूट गया...

जब चांद का धीरज छूट गया...

दीपावली खुशियों का त्यौहार है. इस अवसर पर लोग खुशियां बांटते हैं. साहित्य में कविता एक ऐसी विधा है, जिसमें बहुत कुछ ऐसा कह दिया जाता, जिसे अन्य किसी विधा में कहना मुश्किल है. प्रस्तुत है ऐसी ही एक कविता, जिसमें चांद और भगवान राम का संवाद दर्शाया गया है, जिसमें चांद श्रीराम से अपनी शिकायत दर्ज करा रहा है कि आखिर दीवाली अमावस की रात को क्यों मनायी जाती है.
 

जब चांद का धीरज छूट गया .
वह रघुनंदन से रूठ गया .
बोला रात को आलोकित हम ही ने किया है .
स्वयं शिव ने हमें अपने सिर पे धरा है .
 
तुमने भी तो उपयोग किया हमारा है .
हमारी ही चांदनी में सिया को निहारा है .
सीता के रूप को मैंने ही संवारा है .
चांद के तुल्य उनका मुखड़ा निखारा है .
 
जिस वक़्त याद में सीता की ,
तुम चुपके - चुपके रोते थे .
उस वक़्त तुम्हारे संग में बस ,
हम ही जागते होते थे .
 
संजीवनी लाऊंगा ,
लखन को बचाऊंगा ,.
हनुमान ने तुम्हें कर तो दिया आश्वश्त
मगर अपनी चांदनी बिखरा कर,
मार्ग मैंने ही किया था प्रशस्त .
तुमने हनुमान को गले से लगाया .
मगर हमारा कहीं नाम भी न आया .
 
रावण की मृत्यु से मैं भी प्रसन्न था .
तुम्हारी विजय से प्रफुल्लित मन था .
मैंने भी आकाश से था पृथ्वी पर झांका .
गगन के सितारों को करीने से टांका .
 
सभी ने तुम्हारा विजयोत्सव मनाया.
सारे नगर को दुल्हन सा सजाया .
इस अवसर पर तुमने सभी को बुलाया .
बताओ मुझे फिर क्यों तुमने भुलाया .
क्यों तुमने अपना विजयोत्सव
अमावस्या की रात को मनाया ?
 
अगर तुम अपना उत्सव किसी और दिन मानते .
आधे अधूरे ही सही हम भी शामिल हो जाते .
मुझे सताते हैं , चिढ़ाते हैं लोग .
आज भी दीवाली अमावस में ही मनाते हैं लोग .
 
तो राम ने कहा, क्यों व्यर्थ में घबराता है ?
जो कुछ खोता है वही तो पाता है .
जा तुझे अब लोग न सतायेंगे .
आज से सब तेरा मान ही बढ़ायेंगे .
जो मुझे राम कहते थे वही ,
आज से रामचंद्र कह कर बुलायेंगे. 
 
 
 
 
Advertisement

Comments

Advertisement

Other Story

Advertisement