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  • Feb 11 2019 7:40AM

जलवायु परिवर्तन का कहर

जलवायु परिवर्तन का कहर
आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi
@prabhatkhabar.in
 
इन दिनों दुनियाभर में सर्दी ने कहर बरपा रखा है. अगर आपने पिछले कुछ दिनों की  दिल्ली और उससे सटे इलाकों की तस्वीरें देखी हों, तो उनमें सड़कें और  पार्क ओलों से पटे नजर आ रहे हैं. ऐसा दृश्य इससे पहले हाल-फिलहाल में देखने को नहीं  मिला. जम्मू कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में हर साल बर्फबारी होती है,  लेकिन इस बार तो इसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं. जम्मू कश्मीर में सर्दी  का करीब तीन दशक पुराना रिकॉर्ड टूट गया है. इस बार उन पहाड़ी इलाकों में भी  बर्फबारी हुई है, जहां पिछले एक दशक में बर्फ नहीं गिरी थी. 
 
दक्षिण और  पश्चिम भारत तक सर्दी नहीं पहुंचती थी, लेकिन इस बार सर्दी ने वहां तक मार  की है. केवल भारत ही नहीं, आधी से ज्यादा दुनिया इन दिनों भीषण सर्दी की  चपेट में है. अमेरिका, यूरोप सहित दुनिया के अनेक देश सर्दी का प्रकोप झेल  रहे हैं. मौसम के कहर को देखते हुए अमेरिका के कई हिस्सों में आपातस्थिति  घोषित करनी पड़ी. 
 
अमेरिका के कई शहरों में तो तापमान शून्य से 30 से 40   डिग्री तक नीचे चला गया था. शिकागो शहर में तापमान माइनस 23 डिग्री, उत्तरी  डकोटा में शून्य से 30 डिग्री नीचे और मिनेलोटा में सबसे कम शून्य  से 40 डिग्री नीचे तापमान दर्ज किया गया. यूरोप में भी हालात खराब हैं. चीन  और कोरिया में भी सर्दी का कहर है. कुछ समय के लिए चीन की राजधानी पेइचिंग  के सारे स्कूल बंद कर करने पड़े और लोगों से अनुरोध किया गया कि वे सड़कों  पर बर्फ हटाने के काम में हाथ बंटाएं. वहां दशकों बाद सबसे अधिक हिमपात  हुआ है. दक्षिण कोरिया भी सर्दी की चपेट में है. 
 
राजधानी सियोल को 70  वर्षों के बाद के सबसे अधिक हिमपात से जूझना पड़ रहा है. वहां भी कई हवाई अड्डों को बंद कर देना पड़ा. मौसम वैज्ञानिक इस असाधारण सर्दी के लिए  ध्रुवीय तूफान को जिम्मेदार मान रहे हैं. आर्कटिक क्षेत्र में ध्रुवीय  तूफान से हवाओं में उतार-चढाव के कारण ही दुनिया के उत्तरी हिस्से में भारी  ठंड पड़ी है. वैज्ञानिक इस वैश्विक शीतलहर को जलवायु परिवर्तन का नतीजा  मान रहे हैं. उन्होंने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में ऐसी  परिस्थितियों का और सामना करना पड़ सकता है.
 
 कुछ समय पहले जलवायु  परिवर्तन को लेकर एक और चेतावनी सामने आयी है. नासा के अध्ययन में वर्ष  2018 को अब तक का चौथा सर्वाधिक गर्म साल बताया है. नासा के मुताबिक, 2018  में वैश्विक तापमान 1951 से 1980 के औसत तापमान से 0.83 डिग्री सेल्सियस  अधिक रहा. 
 
1880 के बाद से धरती की सतह का औसत तापमान तकरीबन एक डिग्री  सेल्सियस तक बढ़ गया है. नासा का कहना है कि यह गर्मी कॉर्बन डाइऑक्साइड  उत्सर्जन, ग्रीनहाउस गैसों और पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ के कारण उत्पन्न  हुई है. जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने इस समस्या को गंभीर कर दिया है. जो  कार्बन डाइऑक्साइड पेड़ पौधे सोख लेते थे, वह अब वातावरण में घुल रही है.  
 
दूसरी ओर ब्रिटिश मौसम वैज्ञानियों ने चेताया है कि अगले पांच साल पिछले  150 वर्षों के मुकाबले सर्वाधिक गर्म रहेंगे. ब्रितानी वैज्ञानिकों के  अनुसार, 2014 से 2023 के दशक में अगले पांच साल सर्वाधिक गर्म रहने के आसार  हैं. पूर्वानुमानों से जाहिर है कि दुनिया में तापमान में तेजी से वृद्धि  होगी और औसत वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री तक की वृद्धि का अनुमान है. 
 
दरअसल, पिछली कुछ सदियों से हमारी जलवायु में लगातार बदलाव हो रहा है. इसका  अर्थ है कि सैकड़ों सालों से जो औसत तापमान बना हुआ था, वह अब बदल रहा  है.पृथ्वी का औसत तापमान अभी लगभग 15 डिग्री सेल्सियस है, लेकिन पिछले कुछ  वर्षों में जलवायु में परिवर्तन हो रहा है जिसके कारण गर्मियां लंबी और सर्दियां छोटी होती जा रही हैं.
 
आपको याद होगा पिछले  साल दक्षिणी राज्य केरल में पिछले 100 साल की सबसे विनाशकारी बाढ़ आयी थी.  वैसे तो हर साल केरल में देश के अन्य राज्यों की तुलना में अधिक बारिश होती  है, लेकिन ऐसी तबाही की बारिश पहले कभी नहीं देखी गयी.
 
पिछली बार केरल में  लगभग 37 फीसदी अधिक बारिश हुई. पूरा राज्य भारी बारिश और बाढ़ से बुरी तरह  प्रभावित हुआ था. हर तरफ तबाही का मंजर था. राज्य में बिजली, पानी, रेल और  सड़क व्यवस्था सब ठप हो गयी थी. अपने देश में पर्यावरण की अनदेखी आम बात है.  अगर हम अपने आसपास देखें तो हम पायेंगे कि नदी के किनारों पर अवैध कब्जे हो  रहे हैं और उसके आसपास इमारतें खड़ी होती जा रही हैं. इसके कारण नदी के  प्रवाह में दिक्कतें आती हैं और जब भी अच्छी बारिश होती है, बाढ़ आ जाती  है.
 
जलवायु परिवर्तन के दंश को पूरे देश को झेलना पड़ रहा है.  ज्यादा बारिश होने के कारण कर्नाटक, उत्तराखंड, हिमाचल, असम और ओड़िशा के  लोगों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ा था, तो दूसरी ओर झारखंड और  बिहार में बारिश कम हुई. इसके कारण झारखंड के बड़े इलाके में धान के रोपा  में समस्या आयी थी. समस्या केवल कम या अधिक बारिश की नहीं है. बारिश होती भी  है, तो हम जल संरक्षण नहीं करते हैं. जो हमारे तालाब हैं, उनको हमने पाट  दिया है. 
 
शहरों में तो उनके स्थान पर बहुमंजले अपार्टमेंट्स और मॉल खड़े हो  गये हैं. झारखंड की ही मिसाल लें. यहां साल में औसतन 1400 मिलीमीटर बारिश  होती है. यह किसी भी पैमाने पर अच्छी बारिश मानी जायेगी, लेकिन बारिश का  पानी बह कर निकल जाता है, उसके संचयन का कोई उपाय नहीं है. इसे चेक डैम अथवा  तालाबों के जरिए रोक लिया जाए, तो सालभर खेती और पीने के पानी की समस्या  नहीं होगी. 
 
बिहार की बात करें, तो दो दशक पहले तक बिहार में लगभग ढाई लाख  तालाब हुआ करते थे, लेकिन आज इन तालाबों की संख्या घटकर लगभग 90 हजार रह  गयी है. शहरों के तालाबों पर भूमाफियाओं की नजर पड़ गयी और डेढ़ लाख के अधिक तालाब काल कलवित हो गये. उनके स्थान पर इमारतें खड़ी हो गयीं. नतीजा  यह हुआ कि शहरों का जलस्तर तेजी से घटने लगा. 
 
हमने जल संरक्षण के  उपाय करने जाने कब के छोड़ दिये हैं. बस्ती के आसपास जलाशय- तालाब, पोखर  आदि बनाये जाते थे. जल को संरक्षित करने की व्यवस्था की जाती थी, लेकिन  हमने अपने आसपास के तालाब मिटा दिये और जल संरक्षण का काम छोड़ दिया.  चिंताजनक खबर यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण देश का औसत तापमान लगभग एक  डिग्री सेल्सियस बढ़ जायेगा, जिसका सीधा असर खेती-किसानी पर पड़ेगा और पैदावार  कम हो जायेगी. 
 
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि देश का एक डिग्री तापमान  बढ़ने से पैदावार में 3 से 7 फीसदी की कमी आ जाती है. पर्यावरण का मसला  सीधे तौर से खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है. इसलिए इसकी अनदेखी की भारी कीमत  चुकानी पड़ सकती है.
 

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