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Book review

  • Feb 15 2019 3:05PM
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पुस्तक चर्चा : पत्रकारों के लिए जरूरी किताब

पुस्तक चर्चा : पत्रकारों के लिए जरूरी किताब

पुस्तक आरटीआई से पत्रकारिता

लेखक : श्यामलाल यादव

प्रकाशक: सेज/भाषा, नयी दिल्ली

मूल्य: 440

पृष्ठ : 228 

महाराष्ट्र का आदर्श हाउसिंग स्कैम टूजी, कोयला ब्लॉक आवंटन, कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़े घोटालों पर से पर्दा न उठ पाता, अगर सूचना का अधिकार न होता. इसी कानून के दंश का असर था कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण की गद्दी छिन गयी. 12 अक्टूबर 2005 को भारतवासियों को सूचना का अधिकार(राइट टू

इन्फॉर्मेशन) हासिल हुआ. यह एक लंबे-निरंतर आंदोलन और राष्ट्रीय विमर्श का परिणाम था. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) कहता है कि ‘सभी नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा.’

सूचना का अधिकार कानून को इसी का विस्तार माना जाता है. इस कानून के पारित होने से बहुत पहले से भारतीय प्रेस परिषद और मीडिया के कई कुछ अग्रणी लोग इसकी मांग करनेवाले आंदोलन के साथ जुड़े हुए थे. सूचना का अधिकार कानून ने मीडिया को भी यह अवसर उपलब्ध करा दिया कि वह सार्वजनिक धन के कुप्रबंधन को उजागर करे और लोकसेवकों की गलतियों का पर्दाफाश करे. मीडिया के लिए यह ऐसा उपकरण साबित हुआ जो प्रकाशित समाचार के पक्ष में ठोस सबूत का काम करे. सूचना का अधिकार कानून का मीडिया के क्षेत्र में सबसे ज्यादा कारगर उपयोग जिन पत्रकारों ने किया हैं, उनमें श्यामलाल यादव का नाम सबसे आगे आता है.

श्यामलाल खोजी पत्रकारिता के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं. वह जनसत्ता, अमर उजाला और इंडिया टुडे में काम कर चुके हैं. इस समय इंडियन एक्सप्रेस में वरिष्ठ संपादक है. वह पत्रकारिता जगत के सबसे चर्चित खुलासे ‘पैराडाइज पेपर्स’ की टीम का हिस्सा थे. अपनी पत्रकारीय यात्रा में उन्होंने अपनी खबरों के लिए सूचना का अधिकार कानून को किस तरह उपकरण बनाया, इन्हीं अनुभवों

का निचोड़ है पुस्तक: ‘आरटीआई से पत्रकारिता, खबर पड़ताल’. यह पुस्तक वर्ष 2017 में अंग्रेजी में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘जर्नलिज्म थ्रू आरटीआई : इन्फॉर्मेशन, इन्वेस्टिगेशन, इम्पैक्ट’ का हिंदी अनुवाद है. पुस्तक में यह बताया गया है कि पत्रकार किस तरह आरटीआई का इस्तेमाल करें और बदलाव लाएं. वह कहते हैं कि इस

कानून का उपयोग करने के पहले स्टोरी आइडिया की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए. सवाल पूछने की बजाय सिर्फ सूचना मांगनी चाहिए. प्रारूप सरल और स्पष्ट रखना चाहिए. इस अधिकार का उपयोग करने से पहले इसकी छूटों के बारे में जान लेना चाहिए. प्राप्त सूचना पर और अधिक काम करना चाहिए. लेखक मानते हैं कि पत्रकारों को इस कानून का ज्ञान और रणनीति की समझ होना वक्त

की जरूरत है, क्योंकि तभी वे इसका इस्तेमाल असर डालनेवाले और सुधार लानेवाले कानूनों के रूप में कर पायेंगे. इस लिहाज से यह पुस्तक मीडिया के क्षेत्र में काम करनेवाले सभी पत्रकारों के लिए संग्रहणीय है. यूनेस्को की ग्लोबल इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म केसबुक के संपादक मार्क ली हंटर लिखते हैं कि -‘ भारत का

आरटीआई कानून यदि इतने प्रभावशाली ढंग से लागू है तो इसकी मुख्य वजहों में से एक श्यामलाल यादव हैं. उन्होंने न सिर्फ यह दि खाया कि सरकार से हैरत में डाल देनेवाले दस्तावेज कैसे जुटाये जाएं, बल्कि यह भी कि इन तथ्यों को ऐसी सशक्त खबरों में बदला जा सकता है, जो लोगों को कुछ करने के लिए प्रेरित कर सके.’

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