aalekh

  • Nov 25 2013 5:09AM
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देसी दूध उत्पादकों से छिनता बाजार

।। कृष्ण प्रताप सिंह।।

( वरिष्ठ पत्रकार)

भूमंडलीकरण की नीतियों की विडंबना देखिए : लगातार उत्पादन बढ़ने के बावजूद खाद्यान्नों की कीमतें इतनी बढ़ गयी हैं कि आम लोगों के लिए पेट भरना मुहाल है, लेकिन उन्हें उपजाने वाले किसानों को इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा. वे फसलों की बढ़ती लागतों की भी भरपाई नहीं कर पा रहे और अपने सामने उपस्थित जीवन-मरण के प्रश्नों से परेशान होकर आत्महत्या करने या खेती छोड़ देने पर मजबूर हैं. अभी दो-ढाई दशक पहले तक उनके पास उपजों के लाभकारी दाम न मिलने या प्राकृतिक आपदाओं में उनके नष्ट होने से हुए नुकसान से उबरने का एक विकल्प मौजूद था. यह कि दुधारू पशुओं को पालें और उनके दूध की बिक्री से चार पैसे कमायें.

लेकिन भूमंडलीकरण द्वारा प्रवर्तित ‘मुक्त व्यापार’ है कि उनका यह विकल्प खत्म कर देने पर उतारू है और एक सीमा तक अपने मकसद में कामयाब भी हो गया है. उसने दूध के बाजार का खासा बड़ा हिस्सा उनसे छीन लिया है, जिससे दूध के मामले में भी वही खाद्यान्नों वाली स्थिति पैदा हो गयी है. मतलब, दूध की खपत व उपलब्धता दोनों बढ़ने के बावजूद पशुपालक व देसी डेयरी उद्योग संकटग्रस्त हैं.

उनके संकट की जड़ में दूध और उससे बने पदार्थो का खुला और लगभग शुल्कमुक्त आयात है, जो ‘मुक्त व्यापार’ की शुरुआत में ही विश्व व्यापार संगठन की बेजा, एकतरफा व अन्यायी शर्तो पर किये गये समझौते के तहत खासकर यूरोपीय यूनियन के देशों से किया जाता है. इस दौरान सरकारें कहती रही हैं कि इससे एक तो देश में दूध की बढ़ती हुई जरूरत पूरी होगी, दूसरे, प्रतिस्पर्धा होगी, तो देसी डेयरी उद्योग भी अपना विकास व विस्तार कर सकेगा. जाहिर है कि इसका फायदा दुधारू पशु पालकों को मिलेगा.

लेकिन हुआ है इसका ठीक उलटा. क्योंकि इस ओर कतई ध्यान नहीं दिया गया है कि प्रतिस्पर्धा स्वस्थ हो और उसमें अनैतिक हथकंडों की जगह न बनने पाये. वास्तव में मुकाबला नाना प्रकार के संरक्षण प्राप्त विदेशी दूध उद्योग और एकदम से निष्कवच देसी दूध उत्पादकों के बीच है जिसमें बड़ी मछली छोटी को खाये जा रही है.

वैसे भी हरित क्रांति के नाम पर अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए देश में खेती की जो प्रणाली अपनायी गयी, उसने किसानों के लिए पशुपालन को एक दु:साध्य काम में बदल दिया है. अब खाद्यान्नों की छोटे पौधों वाली प्रजातियां बोई जाती हैं, जिनसे जरूरत भर पशुओं के चारे का उत्पादन नहीं होता. कटाई-मड़ाई के हार्वेस्टर जैसे यंत्रों के प्रयोग से पौधों का भूसा या चारा बनाने के काम आनेवाला ज्यादातर हिस्सा खेत में ही रह जाता है. तिस पर दुधारू पशुओं को सिर्फ भूसे के सहारे पूरा पोषण नहीं दिया जा सकता. इसके लिए खली की जरूरत होती है, जो अंधाधुंध निर्यात की छूट के चलते खासी महंगी है. चारागाह कम ही बचे हैं और उचित-अनुचित अधिग्रहण के चक्कर में वह जमीन भी किसानों के पास नहीं रहने पा रही, जिसके आधार पर उनके लिए पशुपालन सुभीते का हो जाता था.

अतीत में श्वेतक्रांति के नाम पर देसी दुधारू पशुओं की नस्लें सुधारने से ज्यादा जोर विदेशी नस्लों के पशु पालने पर दिया गया, जबकि भारतीय किसान उनके संरक्षण व पालन-पोषण के खर्चीले तरीकों से अनभिज्ञ या उन्हें अपनाने में असमर्थ थे. कालांतर में भिन्न जलवायु के कारण वे नस्लें अनुकूल नहीं सिद्घ हुईं और किसान इससे होने वाले नुकसान का बोझ अकेले-अकेले उठाते रहे. अभी भी यह स्थिति लगभग अपरिवर्तित है, जबकि प्रतिद्वंद्वी यूरोपीय यूनियन के देशों में दूध उत्पादकों को भरपूर सब्सिडी व सुविधाएं देकर उनकी उत्पादन लागत को न्यूनतम कर दिया जाता है और वे अपेक्षाकृत सस्ते निर्यात की स्थिति में भी मुनाफे में रहते हैं. वे कम से कम तब तक तो सस्ता निर्यात करते ही हैं, जब तक संबंधित देश के प्रतिद्वंद्वियों को बाजार से बाहर न कर दें. वे हमारे देश को अपने ‘सस्ते’ दूध से भर कर वे यही कर रहे हैं.

 

हमारी सरकारों ने अपने पशुपालकों को नये प्रोत्साहन देने के बजाय उनसे वे रियायतें भी छीन ली हैं, जो उन्हें पहले मिला करती थीं. ये पशुपालक इस अर्थ में बहुत अभागे हैं कि खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के खुदरा व्यापारियों पर बुरे असर की तो कभी-कभार थोड़ी बहुत चर्चा हो भी जाती है, दूध व्यापार में अस्वस्थ व अनैतिक स्पर्धा के कारण देसी डेयरी उद्योग व दूध उत्पादक दोनों के त्रस्त होने पर औपचारिक चिंता तक नहीं जतायी जाती. ‘मुक्त व्यापार’ नीतियों के उपकृतों को लगता है कि पशुओं को पाल कर उनके दूध के व्यवसाय से बेहतर उनके मांस व चमड़े का व्यवसाय है, क्योंकि उसके निर्यात में अकूत संभावनाएं हैं और अनाजों की आत्मनिर्भरता पर गर्व करती न थकनेवाली सरकार दूध के मामले में आयात पर निर्भरता को गले का हार बनाये हुए है!

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