झारखंड के टैगोर थे डॉ रामदयाल मुंडा

By Prabhat Khabar Digital Desk
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मेघनाथ

झारखंड में एक से एक आदिवासी जननेता-बुद्धिजीवी पैदा हुए लेकिन अधिकांश का सार्थक मूल्यांकन अभी तक नहीं किया गया. ऐसे प्रसिद्ध नेताओं में मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा, कार्तिक उरांव, एनइ होरो और सैकड़ों आदिवासी बुद्धि शामिल हैं. पद्मश्री डॉ रामदयाल मुंडा को गुजरे तीन साल हो गये, लेकिन उनका भी सही मूल्यांकन आरंभ नहीं हो पाया है. मैं मानता हूं कि डॉ राम दयाल मुंडाजी झारखंड के रवींद्रनाथ टैगोर थे. जिस तरह टैगोर ने सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति के लिए बिगुल बजाया था, उसी तरह डॉ मुंडा ने भारत के आदिवासी आंदोलन को आगे बढ़ाया, झारखंड में सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक क्रांति का बिगुल फूंका.
या फिर गीत को ही लें. रवींद्रनाथ (टैगोर) ने प्राकृतिक-सामाजिक विषयों पर गीतों की रचना की. डॉ मुंडा ने भी इन विषयों पर गीत लिखा. वे दो भाषाओं, नागपुरी और मुंडारी में गीत लिखते थे. रवींद्रनाथ जी ने सिर्फ गीतों की रचना ही नहीं की, बल्कि उसे सुर भी दिया. खुद गाये. ऐसा ही काम डॉ मुंडा ने किया. दुनिया की अच्छाई को देखने और समझने के लिए रवींद्रनाथ बोलते थे-दिल और दिमाग का दरवाजा खोल कर रखो. मुंडाजी ने अपना दिल और दिमाग का दरवाजा खोल कर रखा. टैगोर के गीत भारत की आजादी के समय आजादी के दीवानों को प्रभावित करते थे. डॉ मुंडा द्वारा रचित गीत भी झारखंड आंदोलन को प्रेरणा देते थे. मुंडाजी का झारखंड आंदोलन का गीत हमारे कानों में गूंजता है. जैसे -
अखंड झारखंड में
अब भेला बिहान हो
अखंड झारखंड में..
और समय अइसन आवी न कखन,
लक्ष भेदन लगिया,
उठो-उठो वीर,
धरु धनु तीर
उठो निजो माटी लगिया ..
मुंडा जी को झारखंड आंदोलन के बौद्धिक विचारक के रूप में देखा जाता है. 80 के दशक के अंत में भारत सरकार द्वारा बनायी गयी ‘कमेटी ऑन झारखंड मैटर’ के वे प्रमुख सदस्य थे. उसी दौरान उन्होंने ‘द झारखंड मूवमेंट रेट्रोसपेक्ट एंड प्रोस्पेक्ट’ नामक आलेख लिखा. टैगोर और डॉ मुंडा, दोनों ने ही शिक्षा को महत्वपूर्ण माना. रवींद्रनाथ ने शांति निकेतन बनाया, जबकि मुंडाजी ने अमेरिका से नौकरी छोड़ कर रांची विश्वविद्यालय में आदिवासी और क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना की.
धार्मिक विचारों को देखें तो रवींद्रनाथ की रचनाओं ने ब्रह्म समाज की विचारधारा को दृढ़ता प्रदान की. रामदयाल मुंडा ने भी आदिवासियों का जो पारंपरिक धर्म है उसे ‘आदि धरम’ के रूप में खड़ा किया और उसे प्रतिष्ठित करने की दिशा में काम किया. वे मानते थे कि आदिवासियों का जो धर्म है, वह मुख्यधारा के सभी धर्मो तथा इसलाम, हिंदू और ईसाई धर्म से अलग है. उन्होंने ‘आदि धरम’ नामक पुस्तक लिखी.
रामदयाल जी आदिवासी चिंतक वेरियर एल्विन का उदाहरण देते हुए समझाते थे कि आदिवासियों के विकास के तीन रास्ते हैं- अपने पुरातन रीति-रिवाजों के साथ अलग रहो, मुख्यधारा के स्थापित धर्मो के साथ घुल-मिल जाओ और उसकी संस्कृति अपना लो और अपनी शर्त के साथ ही विकास की मुख्यधारा में शामिल हो जाओ. रामदयाल तीसरे के पक्ष में थे. यह उनके जीवन शैली, पहनावा, आचार-विचार आदि में दिखता था. इसका सबसे अच्छा उदाहरण है उनके रचित - ‘सरहुल का मंत्र’. इस मंत्र में वे स्वर्ग के परमेश्वर से लेकर धरती के धरती माई, शेक्सपीयर, रवींद्रनाथ टैगोर, मार्क्‍स, एंगेल्स, लेनिन से लेकर सिद्धू-कान्हु, चांद भैरव, बिरसा मुंडा, गांधी, नेहरू, जयपाल सिंह मुंडा और सैकड़ों दिवंगत व्यक्तियों को एक साथ बुला कर पंक्ति में बैठने बोलते हैं और कहते हैं -
हम तोहरे के बुलात ही,क
हम तोहरे से बिनती करत ही,
हामरे संग तनी बैठ लेवा,
हामरे संग तनी बतियाय लेवा,
एक दोना हड़िया के रस,
एक पतरी लेटवा भात,
हामर संग पी लेवा,
हामर साथे खाय लेवा.. ।
यहां दिखाता है कि वे अपनी शर्त पर सभी को बुलाते हैं.विकास के सवाल पर भी दोनों की एक ही अवधारणा थी. रवींद्रनाथ ने कहीं पर कोई अच्छी चीज देखी तो उसे अपने जीवन में उतारने की कोशिश की. मुंडाजी के दिलोदिमाग में भी विकास की एक वैकल्पिक अवधारणा थी. रवींद्रनाथजी ने अपने जीवन के आखिरी समय में चित्रकारी की. हम उनकी कई पेंटिंग आज देख सकते हैं. मुंडाजी ने भी ऐसा ही किया.
फिल्मकार होने के नाते मैं इन दोनों के बीच एक समानता देखता हूं- वह है सिनेमा की समझ. रवींद्रनाथ सिनेमा को अभिव्यक्ति का एक अच्छा माध्यम मानते थे. रवींद्रनाथ ने एक सिनेमा का निर्देशन भी किया था. 1931 में कोलकाता के न्यू थियेटर के मालिक बीएन सरकार के अनुरोध पर उन्होंने स्वरचित नाटक ‘नोटीर पूजा’ का निर्देशन किया था. डॉ मुंडा ने भी अखड़ा की क ई फिल्मों के निर्माण में हमारे साथ थे. उनका योगदान ‘विकास बंदूक की नाल से, ‘कोड़ा राजी’ और ‘लोहा गरम हैं’ फिल्मों में देखा जा सकता है. इन वृत्तचित्रों में उन्होंने पाश्र्वस्वर दिया है.
उनके कहने पर ही हमें ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’ फिल्म बनायी. इस फिल्म में उनको मुख्य किरदार के रूप में गाना गाते भी देखा जा सकता है. अपने अंतिम दिनों में वे हमारे ‘आदि धरम’ फिल्म के निर्माण में हिस्सा ले रहे थे और इस फिल्म में वे सृष्टिकथा के ऊपर एनिमेशन बनाने में अपना सहयोग दे रहे थे.
अपनी बीमारी के समय जब वे दिल्ली के एम्स में भरती थे, उस दरम्यान मैंने उनके तरिये के बगल में रवींद्रनाथ की किताब पड़ी देखी. अमेरिका से इलाज के बाद जब वे रांची के अस्पतालों में थे तब वे अक्सर मुझसे रवींद्रनाथ टैगोर के बारे में चर्चा करते थे. कई बार उन्होंने मुझसे रवींद्रनाथ टैगोर जी की कविताएं लाकर पाठ करने को कहा. ऐसी ही एक कविता ‘भारत तीर्थ’ की पंक्तियां हैं- ‘ए इ भारोतेर महामानवेर सागारतीरे’ (भारत के महामानव के सागर किनारे). वे चाहते थे कि टैगोर हिल के पीछे एक रवींद्र कला क्षेत्र बनाया जाये. इसके लिए उन्होंने शिलान्यास भी किया था जो उनका आखिरी जन संबोधन था. दु:ख की बात यह है कि उनका यह सपना अधूरा रह गया.
टैगोर पर देशभर में बहुत काम हुए लेकिन डॉ मुंडा पर अभी काम करने की आवश्यकता है. यह शोध कार्य होगा, लेखन कार्य होगा. ऐसा कर ही झारखंडी सांस्कृतिक धरोहर को और समृद्ध बना सकते हैं.
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