नरेंद्र मोदी सरकार पर Economist का पांच साल में बदला स्टैंड?

By Prabhat Khabar Digital Desk
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लंदन से प्रकाशित होने वाली अंग्रेज़ी पत्रिका 'द इकोनॉमिस्ट' के 25 जनवरी, 2020 के अंक की कवर स्टोरी 'इंटोलरेंट इंडिया, हाउ मोदी इज़ एंडेंजरिंग द वर्ल्ड्स बिगेस्ट इकॉनमी' (असहिष्णु भारत, मोदी कैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को ख़तरे में डाल रहे हैं) है.

इस स्टोरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की समीक्षा की गई है और लिखा गया है कि मोदी एक सहिष्णु, बहु-धार्मिक भारत को एक हिंदू राष्ट्र में बदलने की कोशिश कर रहे हैं.

इसमें कहा गया है कि नागरिकता संशोधन क़ानून एनडीए सरकार का एक महत्वाकांक्षी क़दम है. लेख में कहा गया है कि सरकार की नीतियां नरेंद्र मोदी को चुनाव जीतने में मदद कर सकती हैं लेकिन वही नीतियां देश के लिए 'राजनीतिक ज़हर' हो सकती हैं.

साथ ही यह भी कहा गया है कि संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को कमतर करने की प्रधानमंत्री मोदी की नई कोशिशें भारत के लोकतंत्र को नुक़सान पहुंचाएंगी जो दशकों तक चल सकता है.

'द इकोनॉमिस्ट' के लेख में कहा गया है कि धर्म और राष्ट्रीयता के आधार पर विभाजन पैदा करके बीजेपी ने अपने वोट बैंक को मज़बूत किया है और गिरती अर्थव्यवस्था से ध्यान हटाया है. इसके साथ ही पत्रिका में अनुमान लगाया गया है कि एनआरसी के ज़रिए भगवा पार्टी के एजेंडे में मदद होगी और यह अभियान सालों तक चल सकता है.

इसमें कहा गया है कि एनआरसी लंबी प्रक्रिया है जिसमें लिस्ट बनाई जाएगी, बदलेगी और फिर बनाई जाएगी और इस प्रक्रिया के ज़रिए मोदी ख़ुद को देश के 80 फ़ीसदी हिंदुओं के रक्षक के तौर पर पेश करेंगे.

2015 में भी मोदी पर स्टोरी

ऐसा नहीं है जब 'द इकोनॉमिस्ट' पत्रिका ने भारत पर पहली बार कोई स्टोरी की है. यह पत्रिका भारत की तारीफ़ करते हुए कई स्टोरी कर चुका है. साल 2015 में इसी पत्रिका ने 'इंडियाज़ वन-मेन बैंड' शीर्षक से कवर स्टोरी की थी.

पत्रिका का यह लेख भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आधारित था. इस लेख में कहा गया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने 'अच्छे दिनों' का वादा किया जिसके बाद वो सत्ता में आए. उन्होंने नौकरी, भाईचारे और अंतरराष्ट्रीय ख्याति का वादा किया लेकिन उनकी प्रगति निराशाजनक रूप से धीमी है.

इस लेख में कहा गया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अधिकतर ताक़त अपने हाथों में रखी है और एक अकेले आदमी के लिए बदलाव लाना बड़ी चुनौती है. एक तरह से उस आलेख में मोदी को लेकर उम्मीद जताई गई थी, उन पर भरोसा जताया गया था.

पत्रिका के मई 2015 के इस अंक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा भी की गई थी. इसमें कहा गया था कि मोदी के दृढ़ विश्वास पर शक नहीं किया जा सकता क्योंकि भारत में बहुत सी क्षमताएं हैं. यह देश दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने की ओर है साथ ही यह विश्व की तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन सकता है.

भारत की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ इस लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी प्रशंसा की गई थी. साथ ही उम्मीद जताई गई थी कि वो मार्केट में बदलाव लाएंगे. साथ ही इसमें सलाह दी गई थी कि मोदी को विश्व के मज़दूर क़ानूनों को आसान करने के लिए राष्ट्रीय अभियान चलाना चाहिए.

2010 में भारत की अर्थव्यवस्था की तारीफ़

2015 की कवर स्टोरी से पहले अक्तूबर 2010 के अंक में 'द इकोनॉमिस्ट' का अंक भारत की अर्थव्यवस्था पर था.

उस समय की कवर स्टोरी का शीर्षक था 'हाउ इंडियाज़ ग्रोथ विल आउटपेस चाइनास' (कैसे भारत की वृद्धि दर चीन से आगे निकल रही है). उस लेख में भारत की अर्थव्यवस्था की तारीफ़ की गई थी. लेख में कहा गया था कि भारत के राज्य ज़रूर कमज़ोर हों लेकिन उसकी निजी कंपनियां बेहद मज़बूत हैं और उससे देश की अर्थव्यवस्था में मज़बूती है.

2010 और 2020 की कवर स्टोरी को लेकर सोशल मीडिया पर ख़ासी चर्चाएं हैं. दोनों कवर स्टोरी की तुलना करते हुए लोग ट्वीट कर रहे हैं.

2010 में यूपीए सरकार थी और उस समय देश की जीडीपी वृद्धि दर अच्छी स्थिति में थी. उसकी तुलना में आज देश की अर्थव्यवस्था में ख़ासी सुस्ती है.

पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने दोनों समय की पत्रिकाओं के कवर ट्वीट करते हुए लिखा है, "दो कवरों की कहानी, 2010 और 2020, ज़्यादा कुछ नहीं कहना या 'राष्ट्रद्रोही' सुनने के ख़तरे के लिए तैयार रहना है. अच्छा शुक्रवार हो दोस्तों."

वहीं, इस स्टोरी की आलोचना करने वाले भी ट्विटर पर कम नहीं हैं. पंकज मिश्रा नामक एक ट्विटर हैंडल ने ट्वीट किया कि इकोनॉमिस्ट के लोग चाहते हैं कि मोदी अगला चुनाव हार जाएं, इनकी मोदी को लेकर नफ़रत स्पष्ट है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2013 के चुनाव प्रचार के दौरान भी 'द इकोनॉमिस्ट' ने स्टोरी की थी. उस वक़्त की कवर स्टोरी का शीर्षक था 'वुड मोदी सेव इंडिया ऑर रेक इट?' (क्या मोदी भारत को बचा पाएंगे या तबाह कर देंगे).

इसमें भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को लेकर अनुमान लगाए गए थे कि वो क्या प्रधानमंत्री से डरेंगे या उनके नेतृत्व में आगे बढ़ेंगे. इसमें उम्मीद जताई गई थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अल्पसंख्यकों तक पहुंचें.

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