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जानिये, ''चाचा चौधरी'' की कहानियों में कैसे आया साबू

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date

।। प्रकाश मनु ।।

बाल कथाकार

मशहूर कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा सिर्फ एक कार्टूनिस्ट नहीं थे, बल्कि वे एक संपूर्ण कलाकार थे. मौजूदा दौर में जितने भी कार्टून आप देख रहे हैं, ये सब ऐसे लगते हैं, जैसे प्राण के कार्टूनों की ही नकल हों.एक कार्टूनिस्ट के लिए यह बहुत बड़ी बात है कि उसकी कृतियां उसके बाद के सभी कलाकारों में कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में नजर आये. इस ऐतबार से प्राण जी के जाने के बाद जो जगह खाली हुई है, वह अब कोई दूसरा नहीं भर पायेगा.

हालांकि अब कॉमिक्स पढ़ने-पढ़ाने का वह दौर नहीं रहा. आज के इलेक्ट्रॉनिक दौर में बहुत सारी मौलिकताएं खत्म हो रही हैं. आज कॉमिक्स की जगह 24 घंटे वाले कार्टून चैनल आ गये हैं और उनमें भी तरह-तरह के फंतासी से भरे किरदार हावी हो गये हैं, जिनसे हमारे बच्चे प्रभावित हो रहे हैं. अब लोग कार्टून बनाना नहीं सीख रहे हैं, बल्कि एनीमेशन सीख रहे हैं.

जाहिर है, जैसा दौर होगा, हमारी रचनाशीलता भी वैसी ही होगी. ऐसे में प्राण शर्मा का जाना सचमुच हमें उदास करता है कि अब कागजों पर सत्य और सादामिजाजी वाले कार्टून हमें देखने को नहीं मिलेंगे.

कार्टून से गढ़े गये कॉमिक्स की दुनिया एक फंतासी की दुनिया होती है, उसमें आम इनसानों से अलग प्रकृति वाले जीवों की अद्भुत कहानियां हुआ करती हैं. ऐसी कहानियों के दौर में प्राण ने अपने लिए एक अलग जगह बनायीं और उन्होंने कार्टूनों को ऐसा हिंदुस्तानी मिजाज बख्शा, जिसकी बदौलत कॉमिक्स की दुनिया का एक नया रूप उभर कर लोगों के सामने आया. यह ऐसा देसज रूप था, जो फंतासी से कहीं ज्यादा दूर था और हर आयु वर्ग के आम हिंदुस्तानियों के दिलों के बेहद करीब था. लोगों को यकीन नहीं हो रहा था कि हमारा सत्य भी देसीपन की शक्ल में उनके हाथों में होगा और उन्हें इससे प्यार भी हो जायेगा.

ऐसा इसलिए क्योंकि उस जमाने में हमारे समाज में देसीपन वाले कार्टूनों को लेकर दुर्दिन वाला भाव था और लोग फंतासियों को मजे लेकर पढ़ा करते थे. लेकिन प्राण जी ने इस बात को साबित कर दिया कि हमारी मौलिकता, हमारा देसीपन ही हमारी वास्तविक पहचान है और इससे गहरे जुड़े बगैर हमारे बच्चों का मानसिक विकास नहीं हो पायेगा.

मुझे याद है दिल्ली प्रेस से छपनेवाली सरिता पत्रिका में उनका ‘श्रीमती’ वाला कार्टून कॉलम बहुत पसंद किया जाता था. उस कॉलम ने उस दौर में लोकप्रियता के सारे कीर्तिमान स्थापित किये थे. यही नहीं, सरिता के पाठकों का कहना था कि सबसे पहले वे उसी कॉलम से उस पत्रिका को पढ़ना शुरू करते थे.

प्राण सिर्फ नाम के प्राण नहीं थे, बल्कि कार्टूनों में प्राण डाल देनेवाले प्राण थे. इसके बावजूद भी उन्हें उतना सम्मान नहीं मिला, जितना कि मिलना चाहिए था. हृदय से उनका नमन करते हुए मैं तो यही कहूंगा कि उनके साथ ही भारत का देसीपन भी चला गया, जिसमें बब्लू, पिंकी, रमन जैसे किरदार अब अनाथ से लगने लगे हैं.

उन्होंने बालमन को साहसिक बनाया

।। संजय गुप्ता ।।

स्टूडियो हेड, राज कॉमिक्स

सन् 1960 के पहले के दौर में कार्टून खालिस राजनीतिक हुआ करते थे और अखबारों में रोज ही राजनीति से जुड़े मुद्दों को लेकर होते थे, क्योंकि तकरीबन डेढ़ दशक की आजादी के उस दौर में देश को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक उथल-पुथल ज्यादा थी. साथ ही उस दौर के कॉमिक्स के हीरो भी काफी ताकतवर और विदेशी लुक वाले होते थे.

लेकिन 60 के दशक में जब प्राण कुमार शर्मा ने कार्टून बनाना शुरू किया, तो उन्होंने भारत में कार्टून की दुनिया ही बदल डाली. उनके कार्टूनों की मौलिकता इतनी उम्दा थी कि क्या बच्चा, क्या युवा और क्या वृद्ध, सभी के जेहन में देसी किरदार रच-बस से जाते थे. हम रोज एक कार्टून बनायें, लेकिन जब तक हमारे कार्टून में ऐसी मौलिकता नहीं होगी, जो समाज के सभी आयु वर्ग में एक किरदार का रूप ले ले, तब तक हमारा कार्टून बनाना निर्थक ही साबित होगा.

कार्टून बनाना और किरदार गढ़ना- दोनों अलग बातें हैं. राजनीतिक कार्टूनिस्ट किसी मुद्दे को लेकर रोज एक कार्टून बनाते थे, लेकिन वे कार्टून किरदार नहीं बन पाते थे. लेकिन प्राण साहब ने जो कार्टून बनाये, वे महज कार्टून न होकर कार्टून की शक्ल में हमारे सामाजिक किरदार हो जाया करते थे. मिसाल के तौर पर ‘चाचा चौधरी और साबू’, ‘बिल्लू’, ‘पिंकी’, ‘रमन’ आदि ऐसे देशज किरदार थे, जो हमारे देश के हर आयु वर्ग को पसंद आते थे.

हम चाहे जितना भी आधुनिक क्यों न हो जायें, लेकिन हमें हमारी देशज मौलिकता अपनी ओर आकर्षित करती है. इस बात को प्राण ने अच्छी तरह समझा. यही वजह है कि उन्होंने विदेशों से आयातित ‘यंग हीरोज’ की जगह एक ‘अक्लमंद बुड्ढे’ को अपने किरदार का आधार बनाया, जिससे बूढ़े-युवा-बच्चे सब जुड़ते चले गये.

यही देशज मौलिकता थी, जो बिल्लू, पिंकी, रमन के किरदारों ने हमारे देश के बालमन में एक साहसिक और सत्यनिष्ठा वाली मानसिकता का विकास किया. प्राण के इन किरदारों को देख कर उनके बाद की पीढ़ी ने उनसे काफी सीख ली और कई बेहतरीन कार्टूनिस्ट उभर कर सामने आये. इससे कॉमिक्स इंडस्ट्री को बहुत फायदा हुआ और दिन-प्रतिदिन कॉमिक्स की मांग बढ़ती चली गयी.

अब जब से डिजिटल युग शुरू हुआ है, बच्चों में कॉमिक्स पढ़ने की ललक थोड़ी कम हुई है. और युवाओं व बुजुर्गो के पास अब वक्त नहीं है कि वे कॉमिक्स पढ़ सकें. ऐसे में प्राण साहब का जाना सचमुच कार्टून-कॉमिक्स की एक सदी का जाना सा लगता है.

(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)

सामाजिक किरदारों की उम्र कभी खत्म नहीं होती : प्राण

कंप्यूटर से भी तेज दिमाग वाले ‘चाचा चौधरी’ और दूसरे ग्रह के ‘सुपरमैन’ साबू के अलावा बिन्नी, डगडग, बंदूक सिंह, राकेट, श्रीमतीजी, बिल्लू, पिंकी, रमन, डब्बू, चन्नी चाची जैसे अविस्मरणीय कार्टून चरित्रों से कई दशकों तक भारतीय बचपन को एक नये अंदाज में संवारनेवाले प्राण अब हमारे बीच नहीं हैं. बालमन को साहस और सत्यनिष्ठा की सीख देनेवाले प्राण साहब को श्रद्धांजलि.

बच्चों के लिए लोकप्रिय व मनोरंजक कार्टून बनाने और उसे सहज भाषा में प्रस्तुत करनेवाले मशहूर कार्टूनिस्ट प्राण ने कार्टून बनाने की शुरुआत 1960 में की थी. उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले एक अखबार के लिए कार्टून बनाना शुरू किया था. उनके बनाये गये कार्टून चरित्र चाचा चौधरी और साबू घर-घर में लोकप्रिय किरदार बन गये.

चाचा चौधरी का किरदार उन्होंने सबसे पहले हिंदी बाल पत्रिका ‘लोटपोट’ के लिए गढ़ा था. बाद में यह स्वतंत्र कॉमिक्स के तौर पर बेहद मशहूर हुआ. समय बीतने के साथ प्राण भारतीय कॉमिक जगत के सबसे सफल कार्टूनिस्टों में से एक गिने जाने लगे. इसके अलावा डायमंड कॉमिक्स के लिए प्राण ने कई अन्य कामयाब किरदारों को जन्म दिया.

इनमें रमन, बिल्लू और श्रीमतीजी जैसे कॉमिक चरित्र शामिल थे. उनका पूरा नाम प्राण कुमार शर्मा था, लेकिन वो प्राण के नाम से ही मशहूर हुए. वैसे उन्हें ‘भारत का वाल्ट डिजनी’ (वॉल्ट डिजनी ऑफ इंडिया) भी कहा जाता था.

बीबीसी के साथ आखिरी इंटरव्यू

बीबीसी संवाददाता स्वाति बक्शी की दिल्ली में प्राण के घर पर मुलाकात हुई तो बातचीत की शुरुआत इस बात से हुई थी कि राजनीति विज्ञान के स्नातक और फाइन आर्ट्स के छात्र ने कार्टूनिस्ट बनने का फैसला क्यों किया? जवाब में प्राण ने कहा था, ‘ऐसा नहीं है कि कार्टूनिस्ट नहीं थे.

मुझसे बेहतर थे मेरे सीनियर जैसे शंकर, कुट्टी और अहमद, लेकिन वे राजनीतिक कार्टून बनाते थे. मुझे लगा कि राजनीति तो वक्त के साथ पुरानी पड़ जायेगी, क्यों न ऐसे सामाजिक किरदार बनाऊं, जो हमारी तरह हों. मेरी समझ से कार्टून पत्रकारिता की एक शाखा है.’

चाचा चौधरी के जनक

चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है. और साबू को गुस्सा आता है तो ज्वालामुखी फटता है. मासूम बचपन में ये बातें न तो कभी नामुमकिन लगीं, न गलत, बल्कि उस शख्स से मिलने की ख्वाहिश जरूर हमेशा रही, जिसने इन किरदारों को जिंदगी दी.

1960 के दशक में कार्टूनिस्ट प्राण ने जब कॉमिक स्ट्रिप बनाना शुरू किया वह वक्त भारत में इस लिहाज से बिल्कुल नया था, कि कोई देसी किरदार मौजूद नहीं थे. प्राण ने कहा था, ‘उस वक्त जितनी भी कॉमिक्स बाजार में मौजूद थीं, उन सब में विदेशी चरित्र थे. जैसे मेंड्रेक, ब्लॉन्डी वगैरह. जब मैंने माता-पिता को बताया तो सबने कहा कि क्या मिलेगा तुम्हें, कोई लड़की तुमसे शादी नहीं करेगी. लेकिन मैंने कहा कि मैं तय कर चुका हूं. अब तो यही करना है.’ राजनीतिक भाषा से परहेज रखने पर प्राण ने कहा था, ‘सामाजिक किरदारों की उम्र कभी खत्म नहीं होती. मैंने उस वक्त जो कहानी कही वह आज भी पुरानी नहीं लगेगी.’

चाचा चौधरी, साबू, पिंकी, बिल्लू, रमन जैसे बेहद सफल किरदार क्या उनके आस-पास के लोगों पर आधारित थे? यह पूछने पर प्राण ने कहा था, ‘चाचा चौधरी की जहां तक बात है, तो मेरी प्रेरणा थे भारतीय इतिहास के प्रचलित व्यक्तित्व चाणक्य. मैं चाहता था कि मेरा हीरो उनके जैसा अक्ल वाला हो.’ प्राण ने आगे बताया था, ‘मेरी अवधारणा पश्चिम से बिल्कुल भिन्न थी.

वहां हीरो का शारीरिक तौर पर शक्तिशाली होना, लंबा-चौड़ा, खूबसूरत, बांका जवान होना जरूरी है. लेकिन मेरा हीरो तो गंजा, बुड्ढा है. गंजा मतलब बदसूरत, लेकिन उसकी ताकत है उसका दिमाग. इसलिए मेरे चरित्र महज बाहरी खूबसूरती के मोहताज नहीं हैं.’

चाचा चौधरी की कहानियों में साबू कैसे आया?

यह पूछने पर प्राण ने बताया था, ‘शुरुआत में चाचा चौधरी अकेला था, क्योंकि उस वक्त थीम साधारण से थे- जैसे चोरी, पॉकेटमारी वगैरह पर धीरे-धीरे समस्याएं बदलने लगीं. फिर मुझे लगा कि इस अक्ल को शारीरिक ताकत देनी होगी और इस तरह साबू का जन्म हुआ.’

साबू का ग्रह ज्यूपिटर कैसे निर्धारित हुआ? इस पर प्राण ने कहा था, ‘सिर्फ सोच की बात है. मुझे ज्यूपिटर काफी दिलचस्प नाम लगा. मंगल जैसे नाम उस वक्त इतनी दिलचस्पी पैदा नहीं कर रहे थे.’

महिला किरदार पर शिकायत

प्राण साहब से एक शिकायत दर्ज करा दी कि उनके महिला किरदार जैसे चाचा चौधरी की बीवी बिन्नी, चन्नी चाची, श्रीमती जी इतने परंपरागत क्यों हैं? उन्होंने लीक से हटकर थोड़ी बोल्ड महिलाएं क्यों नहीं गढ़ीं? प्राण ने अपना बचाव करते कहा था, ‘देखिए, अगर आप हास्य पैदा नहीं करेंगे, तो कौन खरीदेगा. अपनी बीवी से तो चाचा चौधरी भी डरता है, जो किसी से नहीं डरती. क्या ये ताकत नहीं है. कितनी बार बिन्नी चाचा चौधरी को बेलन फेंक मार चुकी है.’

राजनीतिक कार्टून और एक तात्कालिक कार्टूनिस्ट विवाद का जिक्र छिड़ा तो प्राण का कहना था, ‘कार्टून हास्य के साथ कटाक्ष करने की कला जरूर है, लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब किसी की बेइज्जती कभी नहीं हो सकता. भारतीय संविधान ने ये आजादी दी है तो उसका सम्मान होना चाहिए. ऐसा कोई भी कार्टून जो संविधान का सम्मान न करे, अच्छा कार्टून नहीं हो सकता.’

कार्टूनकला का वर्तमान

भारत में कार्टूनकला की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हुए प्राण ने कहा था, ‘पहले की बात और थी. आज तो भारत में जर्नलिज्म का पूरा तरीका ही बदल चुका है. पहले शंकर और कुट्टी इतने प्रख्यात थे कि पहले पन्ने पर उनके कार्टूनों का इंतजार होता था, लेकिन आज तो अगर माधुरी दीक्षित और ऐश्वर्या राय की तस्वीर हो तो कार्टून को धकेल कर पिछले पन्ने पर भी भेजा जा सकता है.

दूसरी बात यह है कि आज कार्टूनिस्ट हैं भी बहुत कम. आप को ही पांच नाम गिनाने को कहूं तो याद नहीं आयेंगे.’

(बीबीसी हिंदी से साभार)

प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट प्राण का जन्म कसूर नामक कस्बे में (जो अब पाकिस्तान में है) 15 अगस्त, 1938 को हुआ था. आजादी के बाद देश के बंटवारे के समय उनका परिवार भारत आ गया. उन्होंने राजनीति शास्त्र से एमए किया और मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री ली. उनका कार्टूनिंग कैरियर 1960 में दैनिक ‘मिलाप’ अखबार के साथ शुरू हुआ. उनका पूरा नाम प्राण कुमार शर्मा था, लेकिन वे प्राण नाम से मशहूर हुए.

प्राण ने भारतीय पात्रों की रचना करके स्थानीय विषयों पर कॉमिक्स की शुरुआत की. लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने उन्हें 1995 में ‘पीपुल ऑफ द इयर’ अवार्ड से पुरस्कृत किया था. उनकी चाचा चौधरी स्ट्रिप्स को इंटरनेशनल म्यूजियम ऑफ कार्टून आर्ट, अमेरिका में स्थायी रूप से रखा गया है.

1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इनकी राष्ट्रीय एकता पर बनी कॉमिक्स ‘रमन-हम एक हैं’ का विमोचन किया था. मॉरिस हॉर्न, वर्ल्ड एनसायक्लोपीडिया ऑफ कॉमिक्स के संपादक ने प्राण को ‘वाल्ट डिजनी ऑफ इंडिया’ कहा है. उनकी कॉमिक्स पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ते हुए नौजवानों की हमेशा साथी रही हैं. उनके 500 से ज्यादा टाइल्स बिक रहे हैं और अनेक अखबारों में स्ट्रिप्स छपते हैं. चाचा चौधरी पर आधारित एक टीवी सीरियल लगातार 600 एपिसोड तक एक प्रमुख चैनल पर दिखायी गयी.

प्राण ने कार्टून में पश्चिमी आधिपत्य को तोड़ा

प्राण साहब अकेले ऐसे कार्टूनिस्ट थे, जिन्होंने कार्टून की दुनिया के पश्चिमी आधिपत्य को तोड़ा था. उन्होंने कॉमिक कार्टूनिंग की दुनिया में अपने हिंदुस्तानी कैरेक्टरों के साथ अलग पहचान कायम की थी.

भारत में बेहतरीन राजनीतिक कार्टूनिस्ट तो कई हुए हैं, लेकिन कॉमिक की दुनिया में प्राण जितनी कामयाबी और शोहरत किसी को नहीं मिली. प्राण की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने अपने चरित्रों को बाजार की दुनिया में भी कामयाब बनाया. इस लिहाज से वे वर्सेटाइल साबित हुए.

- सुधीर तैलंग, प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट

गुदगुदी पैदा करते हैं प्राण साहब के कार्टून

प्राण साहब बेहद सादगीपूर्ण इनसान थे. कार्टून बनाना उनका मिशन था. उनके कार्टून लोगों के होठों पर मुसकान लाने वाले होते थे. डायमंड बुक्स के साथ वे 40 वर्षो तक जुड़े रहे. अपने कार्य के प्रति वे समर्पित और प्रतिबद्धता को पूरा करने वाले इनसान थे. आज के दौर में तनाव बढ़ता जा रहा है.

ऐसे में उनके कॉमिक्स लोगों के चेहरों पर मुसकुराहट लाने में बेहद कारगर साबित हुए हैं. उनके देसी कार्टून हमारे तनाव को खत्म कर दिलोदिमाग में गुदगुदी पैदा करते हैं. हमें उनके कॉमिक्स को जिंदा रखने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ी उन्हें और उनके कार्टून किरदारों को जान-समझ सके.

- एनके वर्मा, चेयरमैन, डायमंड पब्लिकेशन

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