नरेंद्र मोदी को विधानसभा चुनाव में लोग दरकिनार क्यों करते हैं

By Prabhat Khabar Digital Desk
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साल 2019 के लोकसभा चुनाव में धमाकेदार जीत के बाद झारखंड और महाराष्ट्र के चुनाव में बीजेपी के प्रदर्शन देखने के बाद लग रहा है कि बीजेपी का विजयरथ रुक सा गया है.

बीजेपी ने हरियाणा में बहुमत हासिल करने में विफल होने के बाद चुनाव उपरांत गठबंधन बनाकर सरकार बना ली है.

लेकिन महाराष्ट्र में बीजेपी शिवसेना के साथ चुनाव से पहले ही बने गठबंधन को बरकरार रखने में नाकाम रही.

अब झारखंड में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है.

इन सभी चुनावी नतीजों का अलग-अलग विश्लेषण किया जा सकता है.

लेकिन इन सभी चुनाव परिणामों में एक ट्रेंड नज़र आता है. और इसे अलग-अलग विश्लेषण से समझना संभव नहीं है.

केंद्र से लेकर राज्य तक प्रचंड जीत

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत के बाद बीजेपी को इन राज्यों में भी बढ़त मिली थी.

इससे पता चलता है कि लोकसभा चुनाव में जीत के बाद बीजेपी पूरे देश का माहौल बदलने में कामयाब रही थी. और मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व ने इसमें बड़ी भूमिका अदा की थी.

लेकिन इसके बाद 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पहले से भी ज़्यादा सीटें मिलीं. जीत पहले से भी ज़्यादा प्रचंड थी.

ऐसे में बीजेपी इस जीत के मात्र छह महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव जैसा बेहतरीन प्रदर्शन करने में सफल क्यों नहीं हुई? मोदी की लोकप्रियता बीजेपी के काम क्यों नहीं आई?

क्या इसके लिए बीजेपी शासित प्रदेशों की सरकारों का ख़राब काम ज़िम्मेदार है? आख़िर क्यों इन सभी राज्यों के चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन ख़राब रहा?

अगर ऐसा हुआ है तो ये कहना चाहिए कि एक पार्टी जो पूरी ताक़त से चुनाव लड़ और जीत सकती है, वो सरकारें चलाने के काबिल नहीं है.

लेकिन महाराष्ट्र में हुए सर्वे बताते हैं कि लोग फडणवीस सरकार से असंतुष्ट नहीं थे.

हालांकि, हरियाणा और झारखंड में बीजेपी की सरकारों ने बेहद ख़राब काम किया था.

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मतदाताओं के मन में क्या चलता है?

अगर इन विधानसभा चुनावों से पहले हुए चुनावों पर नज़र डालें तो एक दिलचस्प बात सामने आती है.

लोकसभा में शानदार जीत दर्ज करने से पहले बीजेपी को राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हार का स्वाद चखना पड़ा था. ये चुनाव दिसंबर 2018 में हुए थे.

2018 में ही बीजेपी को कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल नहीं हुआ था.

ऐसे में ये लग सकता है कि बीजेपी केंद्रीय स्तर पर चुनाव जीतने में सफल रही लेकिन विधानसभा चुनाव में उसके लिए ये करना मुश्किल साबित हुआ.

इस ट्रेंड को स्प्लिट टिकट वोटिंग कहा जाता है.

लोकतंत्र में जब मतदाताओं के बीच ये मानसिकता नज़र आती है तो मतदाता विधानसभा चुनाव में किसी ख़ास पार्टी को सिर्फ़ इसलिए अपना मत नहीं देते हैं क्योंकि उन्होंने लोकसभा चुनाव में उस पार्टी को वोट दिया था.

ऐसे में मतदाता चुनावी दलों के नेताओं, कार्यक्रमों और वादों के आधार पर अपना फ़ैसला करते हैं.

राज्य अलग, देश अलग

लेकिन अगर मतदाताओं को लगता है कि राज्य स्तर पर सरकार चलाने के लिए किसी ख़ास दल के मुद्दों, वादों और नेताओं की ज़रूरत नहीं है. तो ऐसे में वे चुनाव मैदान में मौजूद दूसरे दलों में से उन दलों का चुनाव कर सकते हैं जिनकी घोषणाएं उन्हें ज़्यादा पसंद आती हैं.

इसका मतलब ये है कि बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर भले ही मतदाताओं का ध्यान खींचने में सफल रही हो लेकिन राज्य स्तर पर ऐसा करने में सफल नहीं रही.

बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर आक्रामक राष्ट्रवाद, मुसलमानों को लेकर संदेह पैदा करना और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों की दम पर मतदाताओं का दिल जीतने में यक़ीन करती है.

लेकिन विधानसभा चुनावों में मतदाता ये सोच सकते हैं कि इन सभी मुद्दों की उनके राज्य की सरकारों को चलाने में क्या भूमिका है.

ये बात इस तरह से भी पूछी जा सकती है कि जब मतदाता विधानसभा चुनावों में अलग-अलग क्षेत्रीय दलों के प्रति अपना भरोसा जताते हैं तो वे लोकसभा चुनाव में बीजेपी को वोट क्यों देते हैं.

इस सवाल के दो जवाब हैं.

पहला जवाब ये है कि बीजेपी का राष्ट्रवादी चुनावी एजेंडा विधानसभा चुनावों में काम नहीं करता है.

वहीं, मतदाताओं को क्षेत्रीय दलों का राज्य केंद्रित नज़रिया लोकसभा चुनावों में उन्हें वोट नहीं देने के लिए प्रेरित करता है.

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लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता था

नब्बे के दशक के बाद भारत की राजनीति ने एक ऐसा मोड़ लिया जिसकी वजह से भारतीय राजनीति में ये ट्रेंड देखने को मिल रहा है.

नब्बे के दशक में मतदाताओं के बीच अपने मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बनते हुए देखने की चाहत होती है.

ये वो दौर था जब कांग्रेस की राजनीतिक हैसियत कम हो रही थी. और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय पटल पर अपनी जगह बना रहे थे. ऐसे में मतदाता क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति में फर्क करने में दिलचस्पी नहीं लेते थे.

इसकी जगह वे अपनी क्षेत्रीय पहचान और उससे जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दों में शुमार किए जाने में रुचि लेते थे.

कुछ राज्यों को छोड़ दिया जाए तो पूरे देश में ऐसा ही माहौल था.

लेकिन नब्बे का दशक ख़त्म होते होते मतदाताओं को क्षेत्रीय पार्टियों की काबिलियत पर शक होने लगा.

और इसके लिए क्षेत्रीय दल ही ज़िम्मेदार थे.

लेकिन इसके लिए एनडीए और यूपीए भी ज़िम्मेदार थे.

इन गठबंधनों की बदौलत क्षेत्रीय दलों को केंद्र की सत्ता में अपनी जगह बनाए रखने में मदद मिली. लेकिन राष्ट्रीय राजनीति का रुख तय करने में उनकी भूमिका कम हो गई.

इसलिए, पिछले दो दशकों से, क्षेत्रीय दल क्षेत्रीयता के खांचे में फंस कर रहे गए हैं.

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इससे एक दूसरी प्रक्रिया शुरू हुई.

क्षेत्रीय दलों को यह महसूस होने लगा कि उनके लिए अपने क्षेत्रीय हितों के बारे में सोचना ही पर्याप्त है.

भारतीय राजनीतिक में यह मानसिकता पहले भी मौजूद थी. लेकिन, 2000 के दशक में क्षेत्रीय दलों के बीच ये बात गहरे से बैठ गई.

क्षेत्रीय दलों के बड़े नेता मुख्यमंत्री के पद से आगे जाने को तैयार नहीं थे.

ऐसे में क्षेत्रीय दलों ने अपने फायदे और नुकसान के आधार पर केंद्र में सत्तारूढ़ दलों का विरोध या समर्थन किया.

एक समय ऐसा था जब चंद्रबाबू नायडू को इस देश के भावी प्रधान मंत्री के रूप में देखा जा रहा था.

लेकिन जब उन्होंने वाजपेयी के केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री के पद से इनकार कर दिया और इसके बजाय आंध्र प्रदेश के लिए अधिक धनराशि हासिल करने का फ़ैसला किया तो उनके राजनीतिक चातुर्य का लोहा माना गया.

लेकिन उनके इस फ़ैसले ने उन्हें राज्य की राजनीति तक ही सीमित कर दिया.

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बीजेपी का नया दौर

इस वजह से जब बीजेपी ने चुनाव दर चुनाव जीते और पूरे देश में हिंदू राष्ट्रवादी नीति का प्रसार किया तो कोई भी क्षेत्रीय दल उनके विरोध में खड़ा नहीं हो सका.

हालांकि, बीजेपी का विरोध करते हुए कुछ गठबंधन बनाए गए लेकिन ये क्षेत्रीय दल इन गठबंधनों में वैचारिक रूप से कुछ भी योगदान करने में सक्षम नहीं थे.

वे केवल यह कह सके कि भाजपा उनके राज्यों के हितों के खिलाफ़ है. इसका एकमात्र अपवाद DMK रही.

यह आज भी देखा जा सकता है. मई में हो चुके लोकसभा चुनाव के दौरान क्षेत्रीय या राज्य स्तरीय पार्टियां क्या कर रही थीं?

वे अपने-अपने राज्यों में भाजपा के ख़तरे का अनुमान लगा रही थीं. किसी ने बीजेपी की सहायक पार्टी (शिवसेना) बनना स्वीकार कर लिया.

ये कुछ दलों ने (ADMK) को अपने आपको बदली हुई परिस्थितियों में ढाल लिया. कुछ दल चुप रहे (बीजू जनता दल या तेलंगाना राष्ट्र समिति) या वे भाजपा के साथ चले गए.

ऐसे में मतदाताओं के सामने लोकसभा चुनाव में बीजेपी या कांग्रेस में से किसी एक को चुनने का विकल्प था. और राज्य स्तर पर बीजेपी या क्षेत्रीय दलों को चुनने का विकल्प था.

यह एक फिल्म में दो समानांतर चलती हुई कहानियों की तरह है. ऐसी कहानियों में पात्र कुछ समय के लिए एक-दूसरे के साथ बातचीत करते हैं, लेकिन उनकी ज़िंदगी की कहानियां अलग-अलग होती हैं.

उनकी प्रेम-कहानियाँ अलग हैं; और खलनायक का फैसला संदर्भ के आधार पर किया जाता है. वर्तमान राजनीति ऐसी ही आपस में गुथी दो अलग-अलग कहानियों जैसी फिल्म बन गई है.

एक तरफ, क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के राष्ट्रव्यापी तर्कों का खंडन करने में असमर्थ हैं. ऐेसे में एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसमें 'इस देश के लोग' मोदी और उनके तर्क का समर्थन करते हुए प्रतीत होते हैं.

दूसरी ओर, मतदाता मोदी और उनके राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े तर्कों को नकारते हुए राज्य स्तर पर अलग-अलग विकल्पों को पसंद करते हैं.

वही मतदाता जो मोदी को पसंद करते हुए बीजेपी को वोट देते हैं, वे राज्य चुनावों में अपनी पसंद को किनारे रखते हुए अपनी क्षेत्रीय अपेक्षाओं के अनुसार राजनीतिक विकल्प चुनते हैं.

ऐसे में जब तक मोदी और बीजेपी अपनी राजनीति से भ्रामक धार्मिकता और राष्ट्रवादी मुद्दों का तिरस्कार करते हैं (जैसा होना मुश्किल लगता है.) , या गैर-बीजेपी दल एक नई सोच पैदा नहीं करते हैं, जो क्षेत्रीय और राष्ट्रीय चिंताओं का संगम होगी, तब तक मतदाता इसी ट्रेंड पर राज्य में अलग और केंद्र में अलग पार्टियों को वोट देते रहेंगे.

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