श्वेत क्रांति ला रही है आधी आबादी

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date

सुजीत कुमार

मिथक होते ही हैं टूटने के लिए. जिसके पास जज्बा हो वह मिथक को जरूर तोड़ता है. बिहार के खगड़िया की महिलाएं घर की दहलीज से बाहर निकल कर मिथक को तोड़ रही हैं. खगड़िया जिले में कोशी नदी और बाढ़ की विभीषिका एक दूसरे की पहचान रही हैं, लेकिन इसी इलाके की महिलाएं इस जिले की पहचान को बदल रही हैं. अब यहां कोशी की धारा के अलावा एक और धारा बह रही है. वह धारा है दूध की. बड़े पैमाने पर हो रहे दूध के उत्पादन ने इस इलाके के महिलाओं की आर्थिक दशा और जीवन की दिशा दोनों में उल्लेखनीय परिवर्तन लाने में बहुत अहम स्थान हासिल किया है.

उद्योग की शक्ल ले रहा है

दूध का कारोबार

जिले के परबत्ता, चौथम और सदर ब्लॉक के कई गांवों में आधी आबादी अपने दम पर नयी इबारत लिख रही है. ये महिलाएं दूध का उत्पादन करने के बाद उसे स्थानीय बाजारों में बेचने के अलावा बड़ी कंपनियों को भी दूध की आपूर्ति कर रही हैं. ये महिलाएं इस काम में हर स्तर पर अपना योगदान दे रही हैं.

सब काम आधी आबादी के हवाले

दूध के कारोबार से जुड़े सारे काम को आधा आबादी खुद संभालती हैं. संस्था से द्वारा प्रेरित होकर इस काम को करने के बाद ये महिलाएं स्वावलंबन की राह पर काफी तेजी से आगे बढ़ रही हैं. इलाके में ‘श्वेत क्रांति’ के इस काम को कर रही हीरा देवी बताती हैं, हम यह काम करेंगे और इतने बड़े पैमाने पर करेंगे, यह नहीं सोचा था. पहले भी हमारे घरों में दूध होता था लेकिन बहुत कम मात्र में. घर की जरूरतें पूरी करने के बाद जो दूध बच जाता था, उसे हम स्थानीय बाजारों में बेच देते थे, लेकिन अब पूरी तसवीर ही दूसरी हो गयी है.

संस्था ने दिखायी राह
दूध के कारोबार में लगी इन महिलाओं के उन्नति के बारे में ‘विकासशील डेयरी कॉपरेटिव सोसायटी’ की तरफ से पहल कर रहे राजीव रंजन बताते हैं, क्षेत्र में सन् 2007 से इस काम में संस्था लगी हुई है. पहले ये महिलाएं बहुत छोटे स्तर पर काम करती थी. इस काम से इनका दूध तो बिक जाता था लेकिन उचित पैसे नहीं मिलते थे. हमने इनकी मेहनत को देखा और मदद करने का फैसला किया. ये महिलाएं बड़े स्तर पर दूध बेचना चाहती थी लेकिन यह कैसे होगा? ये बताने वाला कोई नहीं था. यद्यपि हमारे इस पहल का रातों रात असर नहीं हुआ. इसमें समय लगा लेकिन बाद में जब हमारी बातों को इन्होंने गंभीरता से समझा तो मुश्किल राहें आसान हो गयी.

डेयरी कंपनियों ने बढ़ाये हाथ
दूध की इतनी बड़ी मात्र में उत्पादन होने कारण संस्था ने इन महिलाओं की मेहनत का वाजिब दाम मिले, इसके लिए बड़ी पहल की. महज कुछ ही महिलाओं के द्वारा किये जा रहे इस काम को लेकर जब महिलाएं जागृत हुई तो उत्पादन में निरंतर सुधार आने लगा. बड़ी मात्र में एकत्र हो रहे दूध का दाम सही और निश्चित समय पर मिले. इसके लिए बरौनी स्थित ‘बिहार राज्य दूध सहकारी संघ’ से संपर्क किया गया. संघ ने इसे खरीदने को लेकर अपनी रुचि जाहिर की लेकिन वह तब उत्पादित हो रहे मात्र से और बड़ी मात्र में दूध चाहते थे. इस बात को लेकर इन महिलाओं को एकत्र सारी बातें बतायी गयी. अब तक इनकी सोच में काफी बदलाव आ चुका था. इनका साथ देने के लिए और बड़ी मात्र में पशुओं की जरूरत महसूस हुई, साथ ही उनके दाना-पानी को लेकर दिक्कत सामने आ रही थी. इस काम में भी इनका सहयोग किया गया. पशुओं के लिए ऋण की व्यवस्था से लेकर उनके दाना-पानी की जरूरतों को भी संस्था ने सुलझाया. जिसका काफी अपेक्षित परिणाम सामने आया.

सब काम महिलाओं के हवाले
अहले सुबह दूध दूहना हो या फिर शाम के समय. महिलाएं ही इसे करती हैं. इसके अलावा दूध की ‘फैट टेस्टिंग’ भी इनके ही जिम्मे होता है. इसके लिए संस्था और ‘कम्फेड’ ने इन्हें प्रशिक्षण दिया है. इस जांच के बाद ही दूध की गुणवत्ता तय होती है. जिसके आधार पर दूध का मूल्य तय होता है. यह प्रक्रिया कलेक्शन सेंटर पर पूरी होती है. इसके बाद बीस रुपये से लेकर तीस रुपये तक दूध का दर तय होता है. जिसे दर्ज कर लिया जाता है. एकत्र हुए दूध को गांव, कस्बों से मुख्य सड़क तक लाने का जिम्मा भी इनके ही हाथों में होता है. जहां से ‘कम्फेड’ की गाड़ी से इसे बरौनी भेज दिया जाता है.

मिल रहा है हर सहयोग

दूध के उत्पादन के लिए पशुओं, उनके चारे की व्यवस्था हो या फिर दूध एकत्र करने के लिए कंटेनर की. इसमें महिलाओं का सहयोग हर स्तर पर किया जा रहा है. पहले यह काम संस्था करती थी लेकिन अब इसे ‘कम्फेड’ के द्वारा किया जा रहा है. इसके लिए इन्हे जरूरी सामान खरीदने के लिए 15 हजार रुपये प्रदान किये जाते हैं. जिसे एक निश्चित समय अंतराल पर वापस करना होता है. एक कंटेनर की क्षमता 40 लीटर दूध एकत्र करने की है. माह में एक बार संस्था द्वारा इन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाता है. इसके अलावा प्रखंड स्तर पर एक बार मीटिंग बुला कर उनकी समस्याओं को सुलझाने या नयी जानकारी देने की पहल की जाती है. इस काम में पूरी पारदर्शिता बरती जाती है. प्रतिदिन खाता बही को दुरुस्त किया जाता है. महीने के अंत में जिस महिला के जिम्मे जितना दूध का पैसा होता है, उसे ‘कम्फेड’ के द्वारा चेक के जरिये संस्था के खाते में भुगतान कर दिया जाता है. जहां से इनको पैसे मिल जाते हैं. साथ ही पशुओं की देखरेख, उनकी बीमारियों और समाधान के बारे में भी जानकारी दी जाती है.

लगातार बढ़ रही है संख्या

महज ऊंगली पर गिनने लायक महिलाओं ने इस काम को शुरू किया, लेकिन आज उनकी मेहनत को मिल रहे उचित दाम से इनकी संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है. संस्था के मुताबिक, जिले के चार प्रखंडों अलौली, परबत्ता, चौथम और सदर प्रखंड के रामपुर, नारंगा, बेल्दौर, बेला, कुरवल, चाचर जैसे कई और गांवों में हो रहे इस कारोबार में महिलाओं की सहभागिता लगातार बढ़ती जा रही है. कुछ महिलाओं से शुरू हुआ यह काम अब करीब 15 सौ तक पहुंच चुका है. इससे रोज करीब 15 हजार लीटर दूध का उत्पादन कर के ‘शीत गृह’ में भेजा जा रहा है.

बदल रही है इलाके की तसवीर

इतनी बड़ी मात्र में दूध का उत्पादन होने से क्षेत्र के स्थानीय बाजारों में भी काफी बदलाव देखा जा रहा है. इलाके के कई क्षेत्रों में इन खालिस दूध से बने पेड़े भी अपनी पहचान बना रहे हैं. साथ ही किसी भी प्रयोजन पर लोग अब पनीर की सब्जी को ही प्राथमिकता दे रहे हैं. क्योंकि स्थानीय बाजारों में बड़ी मात्र में इन दूध से बने पनीर की बिक्री हो रही है. एक और महिला प्रमिला देवी का कहना है, इस काम में मनरेगा जैसी धांधली नहीं होती है. जिसके कारण हम इसे करते हैं. साथ ही लाने-ले जाने में सहयोग मिलता है. हमारे मेहनत का उचित सम्मान मिल जाता है. हमने यह मांग की है कि ‘जांच’ के लिए ‘स्वचालित मशीन’ उपलब्ध कराया जाये.

कुछ अलग करने की तैयारी

इस काम में सहयोग कर रही संस्था के राजीव कहते हैं, अभी तक सब कुछ बढ़िया हो रहा है. मात्र और गुणवत्ता में और वृद्धि होगी तो खुद के नाम पर ब्रांड लांच करने की भी तैयारी हो रही है.

सुधी पाठकगण ज्यादा जानकारी के लिए

निम्‍न पते पर संपर्क कर सकते हैं :

हीरा देवी

विकासशील डेयरी कॉपरेटिव सोसायटी

ग्राम-रामपुर, प्रखंड -अलौली

जिला -खगड़िया

मोबाइल नंबर - 07544000703

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