रोशनी का अद्भुत नजारा

By Prabhat Khabar Digital Desk
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ऑरोरा ऐसी प्राकृतिक प्रकाशीय घटना है, जो मुख्य रूप से ध्रुवीय क्षेत्रों जैसे-आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्र के आकाश में दिखती हैं. यह नजारा इतना रंग-बिरंगा और अद्भुत होता है कि लोग इसे देखने के लिए खिंचे चले आते हैं.

ज्यादातर ऑरोरा एक बैंड में पायी जाती हैं, जिसे औरोरल जोन कहते हैं. इसका फैलाव 3 से 6 डिग्री अक्षांश तक होता है और इसे जियोमैग्नेटिक पोल से 10 से 20 डिग्री दूर तक देखा जा सकता है. शरद और वसंत के समय में जब रात और दिन बराबर होते हैं, तब यानी 21 मार्च और 23 सितंबर को इसे आसानी से देखा जा सकता है. इस समय में सौर हवाओं के साथ भारी मात्र में आयन पृथ्वी के वायुमंडल की तरफ आते हैं और एक जियोमैग्नेटिक तूफान औरोरल जोन को नीचे के अक्षांशों की तरफ फैलाता है.

आकाश में बनाती है आकृतियां
ऑरोरा को दो वर्गों में विभाजित किया गया है- डिफ्यूज या फैलाववाली और अनिरंतर या डिस्क्रीट. डिफ्यूज ऑरोरा एक तेज प्रकाशीय चमक होती है. यह किसी तरह की कोई आकृति नहीं बनाती. इसे अंधेरी रातों में भी नंगी आंखों से पहचानना मुश्किल है. इसके विपरीत डिस्क्रीट ऑरोरा आकाश में तरह-तरह की स्पष्ट आकृतियां उत्पन्न करती हैं. इसकी चमक इतनी तेज होती है कि इसकी रोशनी में आसानी से न्यूजपेपर भी पढ़ा जा सकता है. मगर इनकी चमक सूर्य के प्रकाश से ज्यादा तेज नहीं होती है. अत: ये सिर्फ रात में ही दिखती हैं. दिन में इनका कुछ पता नहीं चलता. यह नजारा इतना अद्भुत होता है कि इसे देखने और इन दृश्यों को अपने कैमरे में कैद करने के लिए दुनिया भर से लोग हर साल बड़ी तादाद में ध्रुवीय क्षेत्रों में पहुंचते हैं. उत्तरी ध्रुव में इसे ऑरोरा बोरेलिस या नोरदर्न लाइट के नाम से जाना जाता है. दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र में उत्पन्न होनेवाले इसके प्रतिरूप को ऑरोरा ऑस्ट्रैलिस या साउदर्न लाइट के नाम से जाना जाता है. साउदर्न लाइट को दक्षिणी अक्षांशीय क्षेत्रों जैसे अंटार्कटिका, साउथ अमेरिका, न्यूजीलैंड, और ऑस्ट्रेलिया में देखा जा सकता है.

दूसरे ग्रहों पर भी बनते हैं ऑरोरा

पृथ्वी की ही तरह दूसरे ग्रहों पर भी ऑरोरा उत्पन्न होती हैं. वहां भी इन्हें ध्रुवीय क्षेत्रों में देखा जा सकता है.

कैसे उत्पन्न होती हैं ऑरोरा : सूर्य से उत्पन्न होनेवाली सौर हवाओं के साथ लगातार आयनों का प्रवाह होता रहता है. जैसे ही ये आयन पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में प्रवेश करते हैं इनमें से ज्यादातर ध्रुवीय क्षेत्रों की तरफ आकर्षित होते हैं और पृथ्वी के साथ-साथ गति करने लगते हैं. इससे वातावरण में मौजूद कणों और इन आयनों के बीच टक्कर होने से काफी मात्र में ऊर्जा उत्पन्न होती है और यही ऊर्जा हमें ऑरोरा के रूप में ध्रुव के आस-पास के एक विशाल क्षेत्र में देखने को मिलती है. जब सौर हवाओं की गति बढ़ जाती है तब ऑरोरा और भी ज्यादा चमकीले रूप में दिखती है. अलग-अलग अक्षांशीय क्षेत्रों में इसके अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं. ये अनेक रंगों जैसे लाल, पीले, नीले, गुलाबी और हरे रंगों में दिखते हैं.

ऐसे बनते हैं रंग
जब आयनीकृत नाइट्रोजन के कण इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के परमाणु उत्तेजित से शांत अवस्था में आते हैं, तब फोटोंस (प्रकाश कणों) के ऊपरी वातावरण में प्रवेश करने के साथ रंग-बिरंगी छटा उत्पन्न होती है. ये कण सौर हवाओं और वातावरण में मौजूद कणों के आपस में टकराने और पृथ्वी के साथ गति करने के कारण आयनीकृत होते हैं. इस दौरान मुक्त होनेवाली ऊर्जा जब ऑक्सीजन के संपर्क में आती है, तो हरे या भूरे और लाल रंग की प्रकाशीय चमक उत्पन्न होती है. नाइट्रोजन के प्रवाह से नीले या लाल रंग की चमक उत्पन्न होती है. इस दौरान हरा रंग बनने में एक सेकेंड के तिहाई हिस्से से भी कम वक्त लगता है जबकि लाल रंग बनने में कम से कम 2 मिनट का समय लगता है. यही वजह है कि ऑरोरा में हरा रंग सबसे ज्यादा देखने को मिलता है. ध्रुव के सबसे नजदीक के क्षेत्रों में लाल रंग सबसे ज्यादा दिखता है. लाल रंग हलके हरे रंग के साथ मिल कर गुलाबी और गहरे हरे रंग के साथ मिल कर पीला रंग देता है. इसी कारण रंग-बिरंगी छटा उत्पन्न होती है.

आवाजें भी उत्पन्न करती हैं ऑरोरा
लोक कथाओं और प्रत्यक्षदर्शियों की मानें, तो ऑरोरा कई तरह की आवाजें जैसे-तालियों की आवाज, पटाखों की आवाज आदि भी उत्पन्न करती हैं. 2012 में फिनलैंड की आल्टो यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने इन आवाजों को रिकॉर्ड किया और साबित किया कि वास्तव में ये आवाजें उत्पन्न कर सकती हैं. ये आवाजें धरती से कम-से-कम 80 मीटर की ऊंचाई पर उत्पन्न होती हैं. इसी कारण इन्हें सुनना मुश्किल है. इसे 100 में से एक मामलों में ही सुना जा सकता है वो भी तब जब ऑरोरा बहुत अधिक मात्र में हों और हवा का बहाव न के बराबर हो.

कई लोक-कथाएं भी हैं प्रचलित
अमेरिकन इंडियन, साइबेरिया की जनजातियों, बाल्टिक देशों, रूस और मंगोलिया के लोगों के बीच ऑरोरा की कई लोक कथाएं प्रचलित हैं. इनमें से एक के मुताबिक एक आर्कटिक लोमड़ी उत्तर की ओर अनंत तक दौड़ती हुए चली गयी और अपने फरों से पर्वतों को छूने लगी. उसी के फर ऑरोरा के रूप में आकाश में दिखते हैं. एक दूसरी कहानी के अनुसार लोमड़ी अपनी पूंछ से आकाश में बर्फ फेंकती है. इससे ऑरोरा उत्पन्न होती है. लोमड़ी अपनी पूंछ से जो बर्फ आकाश में फेंकती है, उससे चांद की रोशनी रिफ्लेक्ट होकर ऑरोरा के रूप में दिखती है. एक और किस्सा व्हेल के शरीर से निकलनेवाली पानी की तेज धारा से संबंधित है. ध्रुवीय क्षेत्र के निवासियों की धारणा रही है कि जब उनके पूर्वजों की आत्माएं नृत्य करती हैं, तब ये किरणों उत्पन्न होती हैं. यूरोप में इसे ईश्वरीय संकेत माना जाता था. प्रस्तुति : पूजा कुमारी

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