चित्रकला जगत में जनप्रिय विनोद शर्मा : पेंटिंग

By Prabhat Khabar Digital Desk
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विनोद शर्मा भारतीय समकालीन चित्रकला में एक जाना-पहचाना नाम है. उनके चित्रों में एक विशेष प्रकार की स्वप्निल-धरा को महसूस किया जा सकता है. वे अपने चित्रों में क्षितिज की आभा को रचते हैं. वे अपने चित्रों से धरती के प्रति हमारे व्यक्तिगत विचार को गहरा करते हैं, उसके प्रति हमारी जिज्ञासा को जगाते हैं और इस प्रकार से व हमें अपने उस धरातल तक पहुंचने के लिए आमंत्रित करते हैं, जो काल्पनिक है. उनके चित्रों को देखते हुए दर्शक के भीतर एक गूढ़ यात्रा की स्वप्निल आकांक्षा जाग सकती है, यही उनका कमाल है.

वे अपने चित्रों से पृथ्वी के सुदूर या निकटवर्ती भू-भाग की नकल नहीं करते. वे उन चित्रों से अपनी इस पृथ्वी पर भ्रमण करने और उसके अनेकों अनदेखे रूपों को देखने की एक लालसा को हमारे भीतर बखूबी जगाते हैं. 'भ्रमण' विनोद शर्मा की तासीर के निकट का शब्द है.

वे भारतीय चित्रकला जगत में लोकप्रिय तो थे, लेकिन वे अब चित्रकला जगत के जनप्रिय हैं. एक बेहतरीन चित्रकार होने के साथ-साथ वे एक जिंदादिल इंसान तो हैं ही, लेकिन उनकी नायब छवि के पीछे एक प्रमुख कारण यह भी है कि कला-शिविरों के आयोजनों को मूर्त रूप देने में वे अपनी महारत रखते हैं. पिछले 20 वर्षों में उन्होंने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर अनेकों कला-शिविरों का आयोजन किया है.
विनोद शर्मा द्वारा संकल्पित इन शिविरों के कारण चित्रकारों को अपनी बिरादरी के साथ देश-विदेश में भ्रमण कर सकने के अनेकों मौके मिले हैं. इन शिविरों के कारण एक तरफ से विनोद का संवाद अपनी पीढ़ी के वरिष्ठ कलाकारों से बना रहता है और वहीं दूसरी ओर वे लगातार उन नये युवा कलाकारों को भी ढूंढते रहते हैं. इन कला-शिविरों के माध्यम से विनोद ने अपने वरिष्ठ, अपने समकालीन और युवा कलाकारों के बीच संवादों की उपजाऊ जमीन तैयार करने में गहरा योगदान दिया है.
भारतीय आधुनिक चित्रकला के प्रचार-प्रसार व उसकी एक पृथक पहचान बनने में सरकारी अकादमियों, निजी संग्रहालय और आर्ट गैलरी के साथ अनेकों संग्राहकों व आज के ऑक्शन हाउस जैसी संस्थाओं का योगदान रहा है. आज, इन सभी के संयुक्त योगदान व मीडिया के आंशिक बल से ही सही, लेकिन भारतीय आधुनिक व समकालीन चित्रकला के प्रति हमारे मध्यमवर्गीय समाज के मानस में एक प्रकार की स्वीकृति भी विकसित हुई है. समय के साथ आधुनिक चित्रकला व उसके व्यावसायिक विकास में नये उद्यमों का पदार्पण होता रहा है. लेकिन, इस संदर्भ में कला-शिविर की बात अलग है, जो फिलहाल सिर्फ भारत में ही प्रचलित है.
विनोद शर्मा के निमित्त से कला-शिविर का विचार अब हमारे यहां जिस प्रकार से स्थापित हो चुका है, वह अब अनेकों अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के लिए विस्मय का विषय है. उनके लिए यह अपने आप में अजूबे के समान है.
पहला कला-शिविर का आयोजन साठ के दशक में मूलतः जीआर संतोष ने एक प्रयोग के रूप में किया था. वे जाने-माने चित्रकार थे. उनके इस उपक्रम ने कलाकारों के बीच एक संवाद के लिए नयी संभावना को ढाल दिया था. उनके इस प्रयोग का भविष्य के चित्रकला संसार पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह संभवतः स्वयं उन्होंने भी नहीं सोचा होगा?
उनकी इस शुरुआत के बाद समकालीन चित्रकला के क्षेत्र में कला-शिविरों के आयोजन धीमे-धीमे कुछ इस प्रकार से परवान चढ़ा कि आज इन शिविरों की अपनी अलग महत्ता है. इन शिविरों में चित्रकार पूरे जोश के साथ शिरकत करते हैं. यह बात भी गौर करने योग्य है कि इस प्रकार से कला-शिविरों ने चित्र-निर्मिती की रहस्यमयी आभा को सार्वजनिक ओज दे दिया है.
भारत में या किसी भारतीय के द्वारा विदेशों में आयोजित कला-शिविरों में अब विदेशी कलाकारों की शिरकत भी होने लगी है. विनोद शर्मा इसे अपनी तरह का नायाब तरीका मानते हैं.
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