ब्लॉग: क्या ज़ैनब की हत्या से बदल जाएगा पाकिस्तान?

By Prabhat Khabar Digital Desk
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ब्लॉग: क्या ज़ैनब की हत्या से बदल जाएगा पाकिस्तान?
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मैं आज वैसा ही डर महसूस कर रही हूं जैसा आज से पांच साल पहले किया था, जब दिल्ली की सड़कों पर चलती बस में निर्भया का गैंगरेप हुआ था.

मुझे अच्छी तरह याद है कि उस समय मैं किस हद तक डर गई थी, बीमार हो गई थी, मेरे भीतर असुरक्षा की भावना घर कर गई थी. ऐसे मौकों पर दो देशों के दरमियां जो दूरियां होती हैं वे मायने नहीं रखती.

ऐसा ही वाकया अब पाकिस्तान में हुआ है. लगभग हफ़्ते भर से ज़्यादा का वक्त गुज़र चुका है इस घटना को हुए, कसूर की रहने वाली सात साल की मासूम ज़ैनब के साथ पहले रेप किया गया और फ़िर उसकी निर्मम हत्या कर दी गई.

मैं एक बार फ़िर दुखी हूं, निराश हूं, परेशान हूं.

हर रोज होते हैं 11 यौन शोषण के मामले दर्ज़

इस घटना के बाद से ही पूरे मुल्क में एक तरह का गुस्सा फ़ैल चुका है. पिछले कुछ ही दिनों में यौन शोषण के दर्जनों मामले दर्ज़ किए गए हैं.

ऐसा नहीं है कि इस तरह की घटना से गुज़रने वाली ज़ैनब पहली लड़की है. इस्लमाबाद स्थित बाल अधिकार संगठन 'साहिल' के अनुसार पाकिस्तान में रोज़ाना बाल यौन शोषण के औसतन 11 मामले दर्ज़ किए जाते हैं. कई लोगों का मानना है कि ज़ैनब की घटना ने पानी सिर से ऊपर पहुंचा दिया.

साल 2016 में पंजाब (पाकिस्तान) पुलिस के प्रमुख ने कोर्ट ने जो आंकड़े पेश किए थे उनके अनुसार पंजाब प्रांत में 10 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ रेप के 107 मामले दर्ज़ किए गए. पिछले साल यही आंकड़ा बढ़कर 128 हो गया.

इन मामलों दोषियों के पकड़े जाने की दर को देखें तो हमारा सिर शर्म से झुक जाएगा. साल 2017 में एक भी व्यक्ति इन मामलों गिरफ्तार नहीं हुआ.

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ज़ैनब अंसारी के पिता

दोषियों को नहीं मिलती सज़ा

साहिल एनजीओ की कार्यकारी निदेशक मनीज़ बानो कहती हैं, 'कई दफ़ा पुलिस के पास पुख्ता सबूत नहीं होते, कई मौकों पर कानूनी पेचीदगियों की वजह से रेप के ये मामले अनसुलझे ही रह जाते हैं.'

'लेकिन फ़िर भी मेरा मानना है कि यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह आरोपियों को हिरासत में ले और पीड़ितों तक न्याय पहुंचाए, यह प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह समाज को सुरक्षित महसूस करवाए.'

दिल्ली में निर्भया कोई पहली लड़की नहीं थी जिसके साथ रेप हुआ था. लेकिन उस घटना ने लोगों के दिलों को झकझोर दिया था, पूरा देश जैसे इस वीभत्स घटना से खुद को पीड़ित महसूस करने लगा और उन्होंने इसी गुस्से के उबार में सड़कों पर कब्जा कर लिया.

निर्भया के आरोपियों को सज़ा हुई और निर्भया की मौत हिंदुस्तान के लिए एक ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज हो गई.

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पाकिस्तान की सड़कों पर गुस्सा

कुछ ऐसा ही गुस्सा पाकिस्तान की सड़कों पर भी दिख रहा है. ज़ैनब के साथ रेप और फ़िर उसकी हत्या ने यहां की आम जनता को हिला कर रख दिया है. लोग इसे भूल नहीं पा रहे. पाकिस्तान के लोग ठीक वैसा ही महसूस कर रहे हैं जैसा कुछ साल पहले भारत के लोगों ने किया था.

इस गुस्से और नाराज़गी की वजह भी बहुत साफ़ है. कसूर में पिछले एक साल में 12 लड़कियों का रेप हो चुका है. कानून प्रवर्तन एजेंसियां के मुताबिक इन 12 में से 9 लड़कियों के साथ कम से कम एक आदमी ने रेप किया है.

ज़ैनब के साथ रेप और हत्या ने साल 2015 की यादों को ताज़ा कर दिया है. उस वक्त कसूर में एक सेक्स स्कैंडल का पता चला था जिसमें हुसैन ख़ान वाला गांव में सैकड़ों बच्चों का यौन शोषण किया जाता और फ़िर मोबाइल फोन से उनकी फिल्म बनाई जाती. इस घटना ने पूरे देश को हैरान कर दिया था.

इस घटना के एक साल बाद पाकिस्तानी संसद में एक कानून पास किया गया जिसमें नाबालिगों के साथ यौन शोषण को अपराध घोषित कर दिया गया, और इस अपराध के लिए सात साल तक की सज़ा तय की गई. इससे पहले के कानून में रेप को अपराध घोषित किया गया था.

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क़सूर में विरोध स्वरूप हुई हिंसा

लोगों की समझ बदलने की ज़रूरत

लेकिन क्या कानून बनने के बाद कूसर के बच्चों को न्याय मिल पाया? इस सवाल का जवाब है 'नहीं'. बच्चों के साथ यौन शोषण के मामले में सिर्फ दो लोगों पर ही आरोप साबित हो सके, दर्जनों आरोपी या तो बरी हो गए या फ़िर उन्हें बेल मिल गई.

यही वजह है कि लोग ज़ैनब के मामले को खत्म नहीं होने देना चाहते, वे मीडिया पर इस मुद्दे पर लगातार बहस ज़ारी रखना चाहते हैं. कुछ लोगों का मानना है कि यह सरकार की नाकमी है वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ज़ैनब के साथ हुई घटना के लिए उसके माता-पिता और समाज को दोषी ठहरा रहे हैं.

हालांकि हर गुज़रते दिन के साथ जनता के बीच मायूसी बढ़ती जा रही है. कोर्ट पुलिस के लिए डेडलाइन आगे खिसकाती जा रही है और पुलिस अपनी जांच के दायरे को विस्तार दे रही है, लेकिन अभी तक इसका नतीज़ा सिफ़र ही रहा है.

बहुत से कार्यकर्ता दोषियों को पकड़ने के लिए रैलियां कर रहे हैं, वे मांग कर रहे हैं कि जिम्मेदार पेरेंटिंग के लिए पाठ्यक्रम में बदलाव की ज़रूरत है, वे चाहते हैं कि बच्चों को उन विषयों के बारे में बताया जाए जिन पर बात करने से अक्सर झिझक महसूस होती है.

इन आवाज़ों को बुलंद करने वालों में एक हैं अभिनेता एहसान ख़ान. कुछ साल पहले उन्होंने बाल यौन शोषण के मुद्दे पर बनी फ़िल्म 'उदारी' में अभिनय किया था, उस समय उन्हें और उनकी टीम को बहुत ज़्यादा आलोचना सहनी पड़ी थी.

दर्शकों का कहना था कि इस फिल्म में असामाजित सामग्री दिखाई गई है और तब पाकिस्तान की मीडिया रेगुलेटरी ऑथोरिटी ने चैनल से उस फ़िल्म को कुछ वक्त के लिए बंद कर देने का आदेश सुनाया था.

बीबीसी से बात करते हुए एहसान ख़ान ने कहा, 'हम इस तरह की घटनाओं को हमेशा छिपाने की कोशिश करते हैं, यौन शोषण के पीड़ितों के साथ हम गरिमा और सम्मान से पेश नहीं आते.'

क्या पाकिस्तान की 'निर्भया' साबित हो पाएगी ज़ैनब?

इस समय समाज में बदलाव की एक लहर सी नज़र आ रही है. सोशल मीडिया के ज़रिए लोग अपने दिल की बात सामने रख रहे हैं, इनमें कई सेलिब्रिटी भी शामिल हैं. वे बता रहे हैं कि उनके साथ भी यौन शोषण की घटनाएं हो चुकी हैं.

जिस तरह ज़ैनब के दोषियों की तलाश ज़ारी है, क्या पाकिस्तान का समाज अपनी आत्मा के भीतर इस बात की तलाश कर पाएगा कि उन्हें यौन शोषण के प्रति अपने नज़रिए में भी बदलाव लाना होगा?

भारत में निर्भया की हत्या की बाद कई चीज़ें बदली. युवाओं के बीच इस बात पर रज़ामंदी बढ़ी है कि वे किस तरह का जीवन जीना चाहते हैं, 'जेंडर सेंसिटाइजेशन' पर भारत में अब चर्चा होती है, महिलाओं के प्रति समाज की सोच बदलने के लिए बहुत से अभियान चलाए गए, महिलाओं को अलग-अलग तरह का काम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, स्कूलों के पाठ्यक्रम में बदलाव किया गया, महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाली हिंसा को आपराधिक श्रेणी में शामिल किया गया, और इन तमाम कोशिशों से महिला सशक्तिकरण को नई ताकत मिली.

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AFP

लेकिन क्या इसे पाकिस्तान के लिए 'निर्भया' जैसा वाकया समझा जाए?

ज़ैनब की हत्या के बाद जिस तरह से लोगों के भीतर गुस्सा उतर आया है वह किसी निश्चित परिणाम तक पहुंच पाएगा?

क्या अब बाकी ज़ैनबों का भविष्य सुरक्षित रह पाएगा?

और क्या यह गुस्सा भी कुछ वक्त बाद ठंडा हो जाएगा इस इंतज़ार में कि अगली दफ़ा किसी दूसरी ज़ैनब के साथ भी रेप होगा फिर हत्या होगी और दोबारा जनता अपना गुस्सा दिखाएगी?

इतिहास तो यही कहता है कि एक मुल्क के तौर पर हम 'शॉर्ट टर्म मैमोरी सिंड्रोम' से पीड़ित हैं.

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