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aalekh

  • Apr 15 2014 4:20AM
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अज्ञान का आनंदलोक और मध्यवर्ग

अज्ञान का आनंदलोक और मध्यवर्ग

।। उर्मिलेश ।।

वरिष्ठ पत्रकार

नये मध्य वर्ग के सरोकार बिल्कुल सीमित हैं. आज यही ‘खुशहाल’ वर्ग ‘मनमोहन-सोनिया-राहुल एंड कंपनी’ को छोड़ कर मोदी के यशोगान में जुटा है. कुछ समय के लिए इस वर्ग के एक हिस्से ने दिल्ली में अन्ना-केजरी के अभियान का साथ दिया था.

अब तक के चुनाव प्रचार से जो तसवीर उभरी है, उसमें एक बात साफ झलक रही है, कि हिंदी पट्टी में सवर्ण-मध्यवर्ग के बड़े हिस्से, खासकर युवा-अधेड़ ने नरेंद्र मोदी को अपना ‘महानायक’ मान लिया है. उसे अपने महानायक की आलोचना बर्दाश्त नहीं. मोदी की कॉरपोरेट-पक्षी आर्थिक नीति, सांप्रदायिक सोच या ‘एक्सक्लूजन’ बढ़ानेवाले गवर्नेस मॉडल में इस वर्ग को कुछ भी खराबी नहीं दिखती. इस वर्ग ने मान लिया है कि सत्ता में उसके महानायक के आते ही देश की सारी समस्याएं फुर्र हो जायेंगी. 

देश इतना ताकतवर हो जायेगा कि पाकिस्तान-बांग्लादेश क्या, अमेरिका-चीन भी थर्राते नजर आयेंगे. 2014 के चुनाव की यह सबसे खास बात है कि उत्तर और मध्य भारत के हिंदीभाषी लोगों, खासकर सवर्ण-मध्यवर्ग के बीच अज्ञान का यह विराट आनंदलोक बुना गया है. इसमें मीडिया, खासकर टीवी चैनलों और मोदी के अपने प्रचार-तंत्र की अहम भूमिका है.

इसकी प्रतिक्रिया में दलित-पिछड़ों-आदिवासियों या अल्पसंख्यकों के बीच यूपीए-2, खासकर कांग्रेस के प्रति कोई हमदर्दी दिख रही हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है. इसके उलट, दलित-पिछड़ों के भी एक छोटे हिस्से का भगवाकरण हो रहा है. उन्हें समझाया जा रहा है कि कांग्रेस ने तुम्हारे साथ लगातार नाइंसाफी की है, भाजपा सत्ता में आयेगी तो इंसाफ करेगी. दलित-पिछड़ों के कांग्रेस से दुराव के ठोस और ऐतिहासिक कारण हैं. 

कांग्रेस ने उनके साथ हमेशा अन्याय किया. इतिहास की बात छोड़ भी दें, तो तात्कालिक कारण कम अन्यायपूर्ण नहीं हैं. यूपीए-2 में कांग्रेस नेतृत्व ने सौ फीसदी अपने मन की सरकार चलायी. इस दौरान भी दलित-पिछड़े-आदिवासी समुदायों की उपेक्षा हुई. अल्पसंख्यकों के लिए कुछ आंसू तो बहाये गये, पर उनके जीवन में गुणात्मक बदलाव लानेवाला कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया. केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी दलित-पिछड़ों की नुमाइंदगी नाममात्र की रही. 

राज्यपाल, आयोगों के पदाधिकारियों, राजदूतों, केंद्रीय नौकरशाही में सचिव स्तर की नियुक्तियों, अन्य उच्च पदों, कुलपतियों, पद्म-सम्मानों, साहित्य-कला या दूसरी अकदामियों के सम्मानों आदि में दलित-पिछड़ों-आदिवासियों की घोर उपेक्षा हुई. दलित-पिछड़े या आदिवासी समुदायों की नुमाइंदगी का दावा करनेवाले दलों के नेता भी यूपीए-2, खासकर कांग्रेस नेतृत्व पर अपने समुदायों की नुमाइंदगी को लेकर कोई दबाव नहीं बना सके. 

उनमें ज्यादातर अपने निजी या पारिवारिक हितों तक ही सीमित रहे. ‘एक्सक्लूजन’ की इस कांग्रेसी-नीति का नतीजा अब सामने है. कांग्रेस की दुर्दशा पर कोई आंसू बहानेवाला भी नहीं मिल रहा है. 

सवर्ण-मध्यवर्ग अधिक फायदा लेने के लिए अब भाजपा की तरफ मुखातिब हो चुका है और दलित-पिछड़े अपने समुदायों की नुमाइंदगी का दावा करनेवाले नेताओं और पार्टियों के बंटवारे और उनके बीच के तीखे अंतर्विरोधों के कारण खुद को हताश महसूस कर रहे हैं. इन समुदायों के सामने ऐसा बड़ा असमंजस पहले कभी नहीं सामने आया था. 

उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड सहित कई प्रदेशों में यह स्थिति साफ है. वाराणसी के चुनावी-परिदृश्य की खास स्थिति देखिये, जहां दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय अब तक समझ नहीं पा रहे हैं कि वे मोदी को शिकस्त देने के लिए सपा की तरफ जाये, या बसपा या ‘आप’ की तरफ! इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण की निर्णायक लड़ाई के दौरान दलित-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों के बीच ऐसा असमंजस नहीं था.

बीते पांच सालों के यूपीए-2 शासन का आकलन करें तो पायेंगे कि उसकी आर्थिक एवं सामाजिक नीतियों ने कॉरपोरेट के साथ-साथ खुशहाल सवर्ण-मध्यवर्ग को मजबूती से जोड़ा और ‘ये दिल मांगे मोर’ की तरफ मोड़ा.

इन नीतियों ने सवर्ण-मध्यवर्ग के बीच एक ऐसे ‘इंडिया’ का सपना बुना, जो ‘भारत’ से अलग था- वहां आलीशान मॉल्स थे, ऐशोआराम से सज्जित प्राइवेट बिल्डर्स के बहुमंजिले अपार्टमेंट, महंगी लक्जरी गाड़ियां, साथ में ऐसे उत्पादों की खरीद के लिए सस्ती दरों वाले बैंक-लोन. करप्शन और क्रोनी-पूंजीवादी रास्ते होनेवाले विकास से जुड़े नये-नये सर्विस सेक्टर, रियल एस्टेट और प्रबंधकीय क्षेत्र की तरह-तरह की नौकरियां. 

इन क्षेत्रों में सवर्ण-मध्यवर्ग को ही तरजीह मिली. निजी क्षेत्र में आरक्षण या ‘एफर्मेटिव एक्शन’ के अपने वायदे (यूपीए-1 का साझा कार्यक्रम) से यूपीए सरकार ने मुंह मोड़ लिया.

नये मध्य वर्ग के सरोकार सीमित हैं या यूं कहें कि सिर्फ निजी स्वार्थ हैं. समाज के उत्पीड़ित तबकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने और देश के सर्वागीण विकास की सोच के बजाय ‘मनमोहन-आर्थिकी’ ने इस वर्ग में वंचित तबकों के प्रति हिकारत पैदा की. आज यही ‘खुशहाल’ वर्ग ‘मनमोहन-सोनिया-राहुल एंड कंपनी’ को छोड़ कर मोदी के यशोगान में जुटा है.

 कुछ समय के लिए इस वर्ग के एक हिस्से ने दिल्ली में अन्ना-केजरी के भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान का साथ दिया था, पर अब यह वर्ग मोदी  के लिए मरने-मारने पर आमादा है. इस राजनीतिक परिघटना और विकासक्रम का श्रेय आरएसएस या भाजपा को नहीं, कांग्रेस को मिलना चाहिए. हिंदी पट्टी में मोदी के उभार के लिए सिर्फ कांग्रेस और उसकी दलित-पिछड़ा-अल्पसंख्यक विरोधी विकास-नीति जिम्मेवार है.

जहां तक नरेंद्र मोदी का सवाल है, उनके एजेंडे में क्रोनी-पूंजीवाद और सांप्रदायिकता, दोनों का बराबर का महत्व है. पहले से संघ-शिक्षित मोदी की सियासी शख्सीयत का निर्माण 2002 के बाद कॉरपोरेट और कट्टर हिंदुत्व के मिश्रित रसायन से हुआ है. ऐसा रसायन, जिसे नवउदारवादी सुधारों के दौर की संघ परिवारी-प्रयोगशाला में विकसित किया गया. बांग्लादेशी शरणार्थियों के खिलाफ बवाल मचानेवाले मोदी ने बाड़मेर की रैली में फरमाया कि पाकिस्तान के हिंदू अगर सरहद पार कर यहां आना चाहें तो उनकी सरकार बनने पर भारत में उनका स्वागत होगा. 

इसके साथ उनका मानना है कि कार्य-व्यापार कॉरपोरेट का क्षेत्र है, सरकार का काम तो सिर्फ निगरानी और सहूलियत मुहैया कराने का है. यानी उनकी सरकार देश के बचे खुचे सार्वजनिक उपक्रमों को भी निजी हाथों में सौंपेगी! हमें नहीं भूलना चाहिए कि एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही देश को विनिवेश के नाम पर नया मंत्रलय मिला था.

अब भाजपा को मोदी के रूप में एक ‘आदर्श नेता’ मिला है. कॉरपोरेट क्रूरता और सांप्रदायिक कट्टरता के नायाब रसायन में ढली है उनकी शख्सीयत! 21वीं सदी में अमेरिका जैसा ‘इंडिया’ बनाने का सपना देख रहे ‘खुशहाल सवर्ण-मध्यवर्ग’ के बड़े हिस्से को उनकी यही सब बातें पसंद आ रही हैं.

 
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