वैकल्पिक नीतियों को अपनाने का वादा

By Prabhat Khabar Digital Desk
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विनय तिवारी

कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी

नयी दिल्ली : अगली सरकार तीसरे मोरचे की होगी. भाकपा, कांग्रेस और भाजपा नीत सरकार का समर्थन नहीं करेगी. नवउदारवादी नीतियों के कारण देश में महंगाई और आर्थिक असमानता बढ़ने की बात भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने अपने घोषणा पत्र में कही है. यह चुनाव ऐसे समय हो रहा है जब देश के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और आर्थिक संप्रभुता को खतरा है.

केंद्र में गंठबंधन सरकारों का दौर चल रहा है और अगली सरकार भी गंठबंधन की ही होगी. पार्टी ने अपने घोषणापत्र में नवउदारवादी नीतियों के समीक्षा करने के साथ ही रिटेल क्षेत्र में एफडीआइ का विरोध करने की बात कही है. तकनीकी और रोजगार सृजन के क्षेत्र में ही पार्टी ने एफडीआइ को मंजूरी देने की बात कही है.

देश के प्राकृतिक संसाधनों को सरकार के कब्जे में रहने और पीपीपी मॉडल को खारिज करने की बात भी घोषणा पत्र में शामिल है. पार्टी ने चुनाव सुधार, न्यायिक सुधार और केंद्र-राज्यों के बीच बेहतर संबंध बनाने पर जोर देते हुए घोषणापत्र में मौजूदा चुनाव प्रणाली के बदले समानुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था को लागू करने की बात कही गयी है. घोषणापत्र में किसानों, मजदूरों, अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों के हितों के लिए योजना चलाने का वादा किया गया है.

अल्पसंख्यकों के लिए सच्चर आयोग और रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को लागू करने पर जोर दिया है. आतंकवाद पर मौजूदा नीति की समीक्षा करने और बिना चाजर्शीट के वर्षो से जेल में बंद युवाओं के रिहाई पर जोर दिया गया है. शिक्षा पर खर्च को जीडीपी का 10 फीसदी करने और स्वतंत्र विदेश नीति के साथ पड़ोसी देशों के साथ बेहतर तालमेल अपनाने की बात घोषणापत्र में शामिल है. घोषणापत्र जारी करते हुए माकपा नेता सुधाकर रेड्डी ने कहा कि विदेशों में जमा काले धन और देशी बैंकों का बढ़ता एनपीए चिंता का विषय है. मौजूदा चुनाव प्रणाली में पैसे का महत्व काफी बढ़ गया है. इसे बदलने की जरूरत है.

इस मौके पर वरिष्ठ भाकपा नेता गुरुदास दासगुप्ता ने कहा कि मौजूदा भ्रष्ट सरकार को सत्ता से बेदखल करना, सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से दूर रखना हमारा मुख्य नारा है. कांग्रेस और भाजपा की नीतियों में कोई फर्क नहीं है. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी क्रोनी कैपिटलिज्म के समर्थक हैं. देश के मौजूदा माहौल को देखते हुए वामपंथी ताकतों का मजबूत होना बेहद जरूरी है.

क्या हैं वादे

1. नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की समीक्षा. रिटेल क्षेत्र में एफडीआइ की मंजूरी नहीं.

2. खनिज, तेल, गैस जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर राज्यों का अधिकार सुनिश्चित करना.

3. आयकर छूट की सीमा को बढ़ाना. कर चोरी पर प्रभावी रोक लगाना.

4. आवास, शिक्षा के लिए कम ब्याज पर आसान ऋण. पहले लिये गये कर्ज पर रेपो रेट का इएमआइ पर असर को खत्म करना.

5. कॉरपोरेट द्वारा लिये गये कर्ज को एनपीए करार दिये गये ऋण की वसूली करना और डिफाल्टरों की संपत्ति जब्त करना.

6. विदेशी बैंकों में जमा काले धन का वापस लाना.

7. मनरेगा स्कीम की तर्ज पर शहरी बेरोजगारों के लिए काम का अधिकार सुनिश्चित करना.

8. बड़ी कंपनियों के ऑडिट और कैग को संवैधानिक प्राधिकार बनाने का वादा.

9. सानुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था को लागू करने की वकालत.

10. पिछड़े राज्यों को विशेष दरजा.

11. नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष पैकेज के लिए शांति बहाली की कोशिश.

12. हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में लागू आफ्सा कानून को निरस्त करना.

13. भूमि सुधार कानून का सख्ती से पालन. छोटे और सीमांत किसानों को ब्याज मुक्त कजर्. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना.

14. किसानों, खेत, मजदूरों और ग्रामीण दस्तकारों के लिए 3000 रुपये मासिक पेंशन. केंद्र और राज्यों में कृषि के लिए अलग से बजट का प्रावधान.

15.स्वतंत्र विदेश नीति. पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबंध. श्रीलंका में तमिलों के लिए मानवाधिकार उल्लंघन की जांच. गुट निरपेक्ष आंदोलन को मजबूत करना.

16. प्राथमिक से लेकर माध्यमिक स्तर पर मुफ्त और सर्वसुलभ शिक्षा की गारंटी. शिक्षा पर जीडीपी का 10 फीसदी खर्च करने का लक्ष्य. शिक्षा के व्यवसायीकरण पर रोक.

17. काम के अधिकार की गारंटी

18. सभी बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता. रोजगार सघन विकास पर जोर.

19. सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार हो. सभी परिवारों को 2 रुपये प्रति किलो पर 35 किलो खाद्यान्न का प्रावधान. जमाखोरी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई.

21. स्वास्थ्य पर जीडीपी का 5 फीसदी खर्च करना. स्वास्थ्य सेवा को बुनियादी अधिकार बनाना.

22. जांच की स्वतंत्र शक्ति के साथ मजबूत लोकपाल. सरकारी कामकाज में पारदर्शिता. शिकायत निवारण कानून बनाना.

23. न्यायिक व्यवस्था का विस्तार. राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन. जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता.

24. पुलिस सुधार की दिशा में कदम उठाना. पुलिस सुधार आयोग की रिपोर्ट लागू करना.

25. सभी क्षेत्रों में महिलाओं को समान अधिकार. महिला सुरक्षा के लिए एक मजबूत तंत्र. हिंसा से पीड़ित महिला के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन. संसद और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी और स्थानीय निकायों में 50 फीसदी आरक्षण.

26. सेज और आइटी क्षेत्र में ट्रेड यूनियन कानून लागू करना. उचित न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा कानून लागू करना. ठेके पर काम कराने, आउटसोर्सिग को खत्म करना.

27. अनुसूचति जाति और जनजाति के लिए केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सब-प्लान के लिए कानून. वनसंपदा पर आदिवासियों को अधिकार. एससी-एसटी कोटे के रिक्त सभी पदों को तत्काल भरा जायेगा.

28. सच्चर कमिटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह लागू करना. एससी-एसटी सब-प्लान की तर्ज पर अल्पसंख्यकों के लिए सब-प्लान का प्रावधान. सांप्रदायिक हिंसा पर रोक के लिए कठोर कानून. अल्पसंख्यक आयोग को संवैधानिक दरजा देना.

29. आतंकवाद संबंधी नीति में बदलाव. एफआइआर और बिना चाजर्शीट के सालों से हिरासत में कैद युवाओं की रिहाई.

30. संघीय ढ़ांचे को मजबूत करना. केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व और वित्तीय संसाधनों के उचित हिस्सेदारी तय हो.

31. पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यापक नीति. जल संसाधनों का व्यावसायिक प्रयोग न हो.

32. प्रतिभा पलायन पर रो़क़. शोध और विकास के लिए अधिक फंड़

नीतियों पर अमल मुश्किल
इम्तियाज अहमद,
राजनीतिक विश्‍लेषक

देश की सबसे पुरानी पार्टियों में से एक भाकपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में मौजूदा आर्थिक नीतियों को खारिज करने के साथ ही कई जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की बात कही है. वामपंथी पार्टियों का आर्थिक एजेंडा जगजाहिर है. लेकिन आज भाकपा की ताकत इतनी नहीं है कि वह अपनी नीतियों को लागू कर सके. घोषणापत्र में कही गयी कई बातें पहले भी शामिल रही हैं. घोषणापत्र की अहमियत अब पहले जैसी नहीं रही. गंठबंधन सरकारों के इस दौर में पार्टियां सत्ता में आने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाती है.

इसमें किसी एक दल की नीतियां हावी नहीं होती है. एक बात साफ है कि आज वामपंथी दलों की ताकत पहले जैसी नहीं है. पश्चिम बंगाल से लेकर केरल में वामपंथी दलों की ताकत में कमी आयी है.

यही नहीं आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के बाद देश में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक बदलाव आये हैं. ऐसे में अब आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को पूरी तरह बदलना संभव नहीं है. भाकपा के घोषणापत्र में अल्पसंख्यकों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं को लेकर कई बातें कही गयी है. इनमें से कई बातों को व्यावहारिक तौर पर लागू करने में काफी मुश्किल होगी. पार्टी के लिए अपने समर्थकों के साथ ही अन्य वर्ग को लुभाने के लिए कई घोषणाएं की है. देखना होगा कि इस घोषणापत्र का पार्टी को कितना फायदा होता है. एक समय कई राज्यों में प्रभावी रही भाकपा का जनाधार समय के साथ काफी कम हो गया है.

पार्टी को अपने आधार को बढ़ाने के लिए घोषणापत्र में आर्थिक विकास के साथ ही रोजगार के अवसरों को बढ़ाने वाले उपायों पर ध्यान देना चाहिए. अब कंपनियों में ट्रेड यूनियनों के प्रभाव और हड़ताल का दौर खत्म हो गया है. भाकपा का घोषणापत्र में इस सच्चई की अनदेखी की गयी है. हालांकि पार्टी ने चुनाव सुधार और भ्रष्टाचार को लेकर सुधारों की बात कही है, लेकिन इंफ्रास्ट्रर विकास, शहरी विकास को लेकर पार्टी के एजेंडे का पता नहीं चल रहा है.

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