राहुल गांधी के Smash the Patriarchy नारे के बीच क्यों ट्रेंड कर रहीं शाहबानो? जानिए पूरा मामला

राहुल गांधी ने महिलाओं से अपनी पहचान और अधिकारों को समझने की अपील करते हुए कहा कि कोई भी रिश्ता उनकी व्यक्तिगत पहचान से बड़ा नहीं होना चाहिए. उनके इस बयान के बाद Smash the Patriarchy सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया, लेकिन इसी के साथ करीब चार दशक पुराना एक नाम भी फिर चर्चा में आ गया वह है -शाहबानो.

Smash the Patriarchy का अर्थ है पितृसत्ता को तोड़ो या नष्ट करो. पुणे में राहुल गांधी ने छात्रों की गूंज कार्यक्रम में लड़कियों का आह्वान किया है कि वे अपने हक के लिए लड़ें और पितृसत्ता को नष्ट कर दें, जो उनके अस्तित्व को नकारती है. राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि देश में महिलाओं को कंट्रोल किया जा रहा है, जबकि वे समाज की आधार हैं. आज स्थिति यह है कि 60% महिलाएं घर से अकेले बाहर नहीं जा सकती. 45% महिलाएं शादी/घर की जिम्मेदारी के चलते पढ़ाई-करियर छोड़ देती है और उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि मात्र 8% महिलाओं के पास ही जमीन का मालिकाना हक है.


Smash the Patriarchy के साथ ही ट्रेंड कर रहा है शाहबानो

राहुल गांधी ने छात्रों की गूंज कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी सरकार पर यह आरोप लगाया है कि वे लड़कियों को दबाना चाहते हैं और उनकी सोच पित्तृसत्तामक समाज को बढ़ावा देती है. राहुल गांधी ने महिलाओं को समाज की आधारशिला बताते हुए बहुत ही आक्रामक अंदाज में उनका आह्वान किया है कि वे अपनी अहमियत को समझें और कोई भी रिश्ता कितना भी महत्वपूर्ण हो, उनकी आइडेंटिटी से ऊपर नहीं हैं. राहुल गांधी के इस आह्वान के साथ ही एक ओर जहां उन्हें जेन जी लड़कियों का समर्थन मिल रहा है, वहीं कांग्रेस के पुराने फैसलों की वजह से उन्हें सोशल मीडिया पर शाहबानो के मुद्दे को लेकर ट्रोल किया जा रहा है. इसी वजह से सोशल मीडिया पर शाहबानो ट्रेंड भी कर रही हैं.

कौन है शाहबानो?

शाह बानो बेगम मध्य प्रदेश की एक मुस्लिम महिला थी. जिन्हें उनके पति ने शादी के 43 वर्ष बाद लगभग 62 वर्ष की उम्र में तलाक दिया था. उस वक्त शाहबानों के पांच बच्चे थे और उन्होंने तलाकशुदा महिलाओं के गुजारा भत्ता (एलिमनी) के अधिकार के लिए ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई लड़ी थी. सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया और उसके पति को गुजारा भत्ता देने को कहा था, लेकिन उस वक्त की राजीव गांधी की सरकार ने संसद से एक ऐसा कानून पास किया, जिसने कोर्ट के फैसले को कमजोर कर दिया और मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता के अधिकार से वंचित कर दिया था. उस कानून के अनुसार मुस्लिम महिलाएं महज तलाक के बाद महज 90 दिन तक यानी इद्दत की अवधि तक ही गुजारा भत्ता की हकदार हैं.

ट्रिपल तलाक और बुर्के को लेकर भी ट्रोल हो रहे हैं राहुल गांधी

Smash the Patriarchy के आह्वान के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें इस बात के लिए ट्रोल किया जा रहा है कि जिन लोगों ने शाहबानो का साथ नहीं दिया, जो लोग ट्रिपल तलाक और बुर्के के पक्ष में खड़े नजर आते हैं, वे किस तरह महिला अधिकारों की बात कर रहे हैं. दरअसल संसद में कांग्रेस और राहुल गांधी का रुख ट्रिपल तलाक के पक्ष में रहा है. साथ ही वे बुर्के का भी समर्थन करते नजर आएं हैं. छात्रों की गूंज कार्यक्रम में भी राहुल गांधी मनुस्मृति की तो निंदा करते हैं, लेकिन इस्लाम में महिला अधिकारों के हनन पर एक शब्द नहीं कहते हैं. इसी वजह से उनकी आलोचना हो रही है. एक व्यक्ति ने लिखा है कि सुप्रिया श्रीनेत को राज्यसभा का टिकट नहीं मिलता है, लेकिन पवन खेड़ा को मिल जाता है. एक व्यक्ति ने लिखा है कि मेनका गांधी, शाहबानो और सुकन्या देवी याद है ना राहुल गांधी. ये सभी भी महिलाएं थीं, स्ट्रेंथ ऑफ इंडिया. इनके लिए आप कुछ नहीं कह रहे हैं.

प्रियंका गांधी भी कर रही हैं ट्रेंड

राहुल गांधी के Smash the Patriarchy अभियान के बाद सोशल मीडिया पर राहुल गांधी भी ट्रेंड कर रही है. यूजर्स यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर ज्यादा क्षमताओं के बावजूद प्रियंका गांधी को कांग्रेस की कमान क्यों नहीं सौंपी गई है. राहुल गांधी नारी अधिकारों का हनन अपने घर में खुद कर रहे हैं और बात Smash the Patriarchy की कर रहे हैं.


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लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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