408 साल पुराना मथुरा विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट में टली सुनवाई, समझें कैसे शुरू हुआ कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह का मसला

कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद पर सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 13 अक्टूबर तक के लिए स्थगित कर दी गई है. जानिए इस 408 साल पुराने मामले की जड़ें और हिंदू-मुस्लिम पक्ष के दावे.

Krishna Janmabhoomi Dispute : कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह विवाद पर सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा स्थगित कर दी गई है. न्यूज एजेंसी एएनआई के अनुसार अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी. विवाद से जुड़े कई मुकदमें दर्ज हैं जिनमें से किसे मुख्य मामला माना जाए, इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट फंस गई थी. अगस्त में ही सुप्रीम कोर्ट की ओर से संकेत दिया गया था कि इस उलझन को इलाहाबाद हाईकोर्ट ही सुलझाएगी. ये तो वर्तमान में हुए डेवलपमेंट हैं, आइए जान लें कि राम जन्मभूमि विवाद सुलझने के बाद तेजी से सुर्खियों में आया कृष्ण जन्मभूमि विवाद क्या है.

क्या है कृष्ण जन्मभूमि विवाद?

मथुरा का कृष्ण जन्मभूमि विवाद मुख्य रूप से 13.37 एकड़ जमीन के मालिकाना हक को लेकर है. जिस पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर (करीब 11 एकड़ जमीन पर) और शाही ईदगाह मस्जिद दोनों बने हुए हैं. हिंदू पक्ष का दावा है कि मुगल शासक औरंगजेब ने 1670 में यहां स्थित प्राचीन केशवदेव मंदिर को तुड़वाकर उसके ऊपर मस्जिद का निर्माण करवाया था. हिंदू पक्ष का मानना है कि मस्जिद का मुख्य हिस्सा (गर्भ गृह) वही सटीक स्थान है जहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था.

हिंदू पक्ष का दावा

हिंदू पक्ष का कहना है कि विवादित जमीन पर पूरा हक हिंदुओं का है. उनका कहना है कि मस्जिद की दीवारों और खंभों पर आज भी हिंदू धार्मिक चिन्ह, जैसे कमल के फूल और शेषनाग की आकृतियां मौजूद हैं. उनकी मांग है कि मस्जिद को वहां से हटाकर जमीन मंदिर ट्रस्ट को सौंपी जाए.

मुस्लिम पक्ष का तर्क

मुस्लिम पक्ष यानी शाही ईदगाह कमेटी का कहना है कि यह मस्जिद सदियों पुरानी है और 1968 में दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हो चुका था. जिसके तहत मस्जिद की जगह पर उनका अधिकार माना गया था.

हाईकोर्ट के 2025 के आदेश को दूसरे हिंदू पक्ष ने दी थी चुनौती

यह पूरा मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के 18 जुलाई, 2025 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें एक वादी की अर्जी मंजूर करते हुए उसके मुकदमे को अन्य सभी मुकदमों के लिए 'प्रतिनिधि मुकदमा' (Representative Action) मान लिया गया था और तय किया गया था कि इस पर फैसला पहले होगा. हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ एक अन्य हिंदू वादी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. याचिकाकर्ता की दलील है कि जब मथुरा जिला अदालत से सभी मुकदमे हाईकोर्ट ट्रांसफर हुए थे, तब उनका मुकदमा मुख्य था, ऐसे में बिना बाकी पक्षों को सुने किसी दूसरे वादी को सभी कृष्ण भक्तों का प्रतिनिधि दर्जा देना पूरी तरह गलत है.

शाही ईदगाह परिसर को लेकर लंबित हैं 20 से अधिक मुकदमे

मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद परिसर के मालिकाना हक को लेकर 20 से ज्यादा दीवानी मुकदमे चल रहे हैं. हिंदू पक्ष का दावा है कि मुगल शासक औरंगजेब ने जन्मभूमि पर बने प्राचीन मंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद बनवाई थी, जिसके निशान आज भी परिसर में मौजूद हैं. शुरुआत में ये सभी मामले मथुरा की निचली अदालत में दाखिल हुए थे, जिन्हें बाद में हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में भी मस्जिद कमेटी और हिंदू पक्षों की कई अर्जियां लंबित हैं, जिनमें से एक याचिका पर शीर्ष अदालत ने जनवरी 2024 में विवादित परिसर के कोर्ट कमिश्नर सर्वे कराने के हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी.

समझिए विवाद का इतिहास और कानूनी मोड़

श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ और शाही ईदगाह मस्जिद कमेटी के बीच 1968 में एक समझौता हुआ था, जिसमें मस्जिद के वजूद को स्वीकारा गया था. हालांकि मौजूदा याचिकाओं में हिंदू पक्ष इस समझौते को अवैध और धोखाधड़ी बताकर खारिज करने की मांग कर रहा है.

इसके बाद साल 1991 में प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट लाया जाता है. मुस्लिम पक्ष इस कानून का हवाला देते हैं. जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, उसे बदला नहीं जा सकता. वहीं हिंदू पक्ष का तर्क है कि यह कानून इस मामले पर लागू नहीं होता है क्योंकि जमीन के मालिकाना हक पर विवाद बहुत पहले से चलता आ रहा है.

1618 या 1670 कब से हुई विवाद की शुरुआत

ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने 1618 में भव्य केशवदेव मंदिर का निर्माण कराया था. जिसकी भव्यता को देखने दूर-दूर से लोग आते थे. जहांगीर और बाद के मुगल शासकों को भी केशवदेव मंदिर का इतनी ऊंचाई पर और भव्य निर्माण किया जाना पसंद नहीं आया. फिर बाद में 1670 में जाकर मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर को तुड़वा दिया था. जिसका जिक्र शाही इतिहासकार साकी मुस्तैद खान की पुस्तक मासिर-ए-आलमगीरी में मिलता है.

1618 से सुलगता आ रहा विवाद 408 साल पुराना हो चुका है. हालांकि 1670 के दशक में मंदिर गिराए जाने के बाद खून-खराबे का जिक्र इतिहास में मिलता है, लेकिन अयोध्या में 1992 के घटनाक्रम जैसी कोई भी हिंसक घटना या ढांचा गिराने जैसी स्थिति मथुरा में नहीं देखी गई. दोनों पक्षों के श्रद्धालु और नमाजी अपने-अपने निर्धारित हिस्सों में बिना किसी टकराव के आते-जाते हैं.

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By आलोक पाठक

आलोक पाठक वर्ष 2019 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अपने पत्रकारिता सफर के दौरान वे खबर मंत्र, गांडीव और नक्षत्र न्यूज़ जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं। वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। हिंदी भाषा और लेखन के प्रति उनका विशेष लगाव है। उन्हें भू-राजनीति (Geopolitics) और राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विषयों पर लिखना पसंद है। निजी जीवन में कहानियां और कविताएं लिखना तथा कालजयी साहित्य का अध्ययन उनकी प्रमुख रुचियों में शामिल है। उनका प्रयास तथ्यों पर आधारित, सरल और प्रभावी लेखन के माध्यम से पाठकों तक सार्थक जानकारी पहुंचाना है।

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