जहाजों पर काम करने वाले कर्मचारियों के यूनियन का दावा–होर्मुज स्ट्रेट में फंसे हैं 23 हजार भारतीय

US-Israel vs Iran war : ईरान युद्ध छिड़ने के बाद से खाड़ी क्षेत्र में रहने वाले हजारों भारतीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से अपने देश लौट आए हैं. जो लोग जहाजों पर हैं और होर्मुज स्ट्रेट से गुजर कर भारत आने वाले हैं, उनके सामने युद्ध की वजह से गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है. सरकार उनकी सुरक्षित वापसी की कोशिश कर रही है, लेकिन अभी सबकुछ सामान्य नहीं है. फाॅरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया का दावा है कि खाड़ी क्षेत्र में सऊदी अरब से लेकर होर्मुज स्ट्रेट तक लगभग 23 हजार लोग फंसे हैं.

US-Israel vs Iran war : ईरान युद्ध के बीच खाड़ी क्षेत्र में फंसे भारतीयों के बारे में जानकारी देते हुए फाॅरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया के जनरल सेक्रेटरी मनोज यादव ने मीडिया को बताया कि जब युद्ध शुरू हुआ था, तो यह उम्मीद थी कि सऊदी अरब से लेकर होर्मुज स्ट्रेट तक लगभग 23, 000 भारतीय नाविक फंसे हुए हैं, लेकिन युद्ध के 23 दिन बीत जाने के बाद यह स्पष्ट रूप से बता पान मुश्किल हो रहा है कि इस क्षेत्र में कितने भारतीय फंसे हैं.

मुश्किलों का सामना कर रहे हैं भारतीय

होर्मुज स्ट्रेट से भारतीय जहाजों को बाहर तो निकाला जा रहा है, लेकिन अभी भी वहां कई जहाज फंसे हुए हैं. युद्ध की स्थिति गंभीर है और यह बता पाना मुश्किल है कि अभी कितने भारतीय इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं. युद्ध कितने दिन चलेगा, इसकी कोई जानकारी नहीं है, जिसकी वजह से भारतीय नाविकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. उन्हें सेफ वाटर की समस्या हो रही है और उन्हें जहाज से बाहर भी नहीं जाने दिया जाता है.

परिवार से टूटा कनेक्शन, सही- सलामत घर वापसी चाहते हैं भारतीय

युद्ध की परेशानियों के बीच हर भारतीय यह चाहता है कि वह सही–सलामत अपने घर पहुंच जाए. वे सभी सही समय का इंतजार कर रहे हैं. पहले इन लोगों का फोन और व्हाट्‌सएप के जरिए अपने परिवार वालों से बात होता था, लेकिन अब इनका कनेक्शन टूट गया है. ऐसे में इन नाविकों की सुरक्षित वापसी बहुत जरूरी है. यह तो बात हुई सीमेन यूनियन की बात, लेकिन सरकार की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आंकड़ा जारी नहीं किया गया है, जिसमें यह बताया गया हो कि कुल कितने नाविक खाड़ी क्षेत्र में फंसे हैं. हां, सरकार ने यह जरूर माना है कि खाड़ी क्षेत्र में भारतीय नाव और नाविक फंसे हुए हैं.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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