क्यों भारत में कम हो रहा है कोयले का इम्पोर्ट? रिपोर्ट आयी सामने

Coal Imports : इस वित्त वर्ष (Financial Year) के अप्रैल से जनवरी तक देश का कोयला इम्पोर्ट 4.2% घटकर 21.31 करोड़ टन रह गया है. समुद्री रास्ते से ढुलाई महंगी होने की वजह से आगे भी कोयला इम्पोर्ट कमजोर रहने की उम्मीद है.

Coal Imports : इम्पोर्ट में कमी से साफ है कि देश कोयला उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है. घरेलू उत्पादन भी बढ़ रहा है. हालांकि, जियो पॉलिटिकल टेंशन के कारण सप्लाई में रुकावट आई है, जिससे ग्लोबल लेवल पर तापीय कोयले (बिजली बनाने वाला कोयला) की कीमतें बढ़ रही हैं.

बी2बी ई-कॉमर्स मंच एमजंक्शन सर्विसेज लि. के आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में अप्रैल-जनवरी के दौरान, गैर-कोकिंग कोयले (यह मुख्य तौर पर बिजली बनाने या जलाने के काम आता है) का इम्पोर्ट 12.78 करोड़ था, जो पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि के 14.11 करोड़ टन के आंकड़े से कम है. एमजंक्शन सर्विसेज सेल और टाटा स्टील का ज्वाइंट वेंचर है.

कोयले के इम्पोर्ट पर एक नजर

अप्रैल-जनवरी, 2025-26 के दौरान कोकिंग कोयले (इसका उपयोग स्टील उद्योग में होता है) का इम्पोर्ट 5.03 करोड़ टन रहा, जो एक साल पहले इसी अवधि में 4.58 करोड़ टन था. जनवरी में देश का कोयला इम्पोर्ट 22.1 प्रतिशत घटकर 1.66 करोड़ टन रह गया, जो पिछले वित्त वर्ष के इसी महीने में 2.13 करोड़ टन रहा था. जनवरी में हुए टोटल इम्पोर्ट में से, गैर-कोकिंग कोयले का हिस्सा 94.5 लाख था, जो पिछले साल जनवरी के आंकड़े 1.23 करोड़ टन से कम है. कोकिंग कोयले का इम्पोर्ट 42.3 लाख था, जबकि पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह 52.3 लाख टन रहा था.

इम्पोर्ट और कम रहने की संभावना

एमजंक्शन के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) विनय वर्मा ने कहा कि डोमेस्टिक मार्केट में ज्यादा स्टॉक होने की वजह से तापीय कोयले के इम्पोर्ट में (सालाना आधार पर) काफी गिरावट आई है. समुद्री मार्ग से ढुलाई की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ इम्पोर्ट और कम रहने की संभावना है. अगले कुछ साल में डोमेस्टिक कोल प्रोडक्शन सालाना 6-7 प्रतिशत की दर से बढ़कर 2029-30 तक लगभग 1.5 अरब टन तक पहुंचने की उम्मीद है.

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By Amitabh Kumar

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अमिताभ 1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है.

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