तीन जून को ही बनी थी भारत के बंटवारे की योजना

नयी दिल्ली : भारत के लोगों के लिए भले ही 15 अगस्त को मिली आजादी का विशेष महत्व हो लेकिन इतिहास की दृष्टि में 3 जून भी कम महत्वपूर्ण तिथि नहीं है. इसी दिन भारत को दो देशों में विभाजित करने की योजना का खाका पेश किया गया था. स्वतंत्रता संघर्ष के अंतिम चरण में […]

नयी दिल्ली : भारत के लोगों के लिए भले ही 15 अगस्त को मिली आजादी का विशेष महत्व हो लेकिन इतिहास की दृष्टि में 3 जून भी कम महत्वपूर्ण तिथि नहीं है. इसी दिन भारत को दो देशों में विभाजित करने की योजना का खाका पेश किया गया था. स्वतंत्रता संघर्ष के अंतिम चरण में भारत के विभाजन को लेकर तमाम तरह की बहस चल रही थी और राजनीतिक पटल पर तमाम विरोधाभासी दावों के कारण कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं उभर पा रही थी. ऐसे में 3 जून 1947 को भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने देश के बंटवारे से संबंधित योजना का खाका प्रस्तुत किया था. इसे ‘थर्ड जून प्लान’ और बाद में ‘माउंटबेटन योजना’ के नाम से जाना गया. अंत में इसी दस्तावेज को भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के रुप में ब्रिटेन के राजपरिवार ने मान्यता दी.

वर्ष 1947 तक आते-आते यह बात तो साफ हो चुकी थी कि विभाजन के बिना भारत को स्वतंत्रता नहीं मिल पायेगी. फिर भी महात्मा गांधी सहित सभी बडे कांग्रेस नेताओं ने आखिरी समय तक बंटवारे को रोकने के प्रयास किए. इस मामले का समाधान करने के लिए कैबिनेट मिशन भी भारत आया था, लेकिन वह भी कोई ठोस योजना बनाने में असफल रहा. इसके चलते उसी साल 12 फरवरी को माउंटबेटेन को इस जिम्मेदारी के साथ भारत का वॉयसराय बनाकर भेजा गया कि उन्हें देश को स्वतंत्र करने की योजना बनानी है.

ब्रितानी सरकार ने 20 फरवरी 1947 को यह घोषणा भी कर दी थी कि भारत को जून 1948 तक स्वतंत्र कर दिया जायेगा. ऐसे में माउंटबेटेन पर जल्द ही किसी निर्णय पर पहुंचने का दबाव था. मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेताओं के साथ लंबे विचार विमर्श के बाद माउंटबेटेन ने 3 जून 1947 को अपनी एक योजना पेश की. इसे भारतीय इतिहास में ‘थर्ड जून प्लान’ या ‘माउंटबेटेन योजना’ कहा गया. इस योजना में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के लिए तीन बातों को मुख्य तौर पर शामिल किया गया.

योजना का पहला बिन्दु था कि भारत के बंटवारे के सिद्धांत को ब्रिटेन की संसद द्वारा स्वीकार किया जाएगा. दूसरा, बनने वाली सरकारों को डोमिनियन :अर्ध स्वायत्त राज्य व्यवस्था: का दर्जा दिया जाएगा और तीसरा, उसे ब्रिटिश राष्ट्रमंडल से अलग होने या शामिल रहने का फैसला करने का अधिकार मिलेगा. दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु महाविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक नेत्रपाल सिंह ने इस योजना को वर्तमान में भारत के आंध्रप्रदेश के हुए बंटवारे की सहायता से समझाते हुए बताया कि, ‘‘ये बात उस समय तक स्थापित हो चुकी थी कि भारत के पंजाब और बंगाल प्रांत का बंटवारा होगा और एक नया देश पाकिस्तान बनेगा.

लेकिन यह विभाजन किस तरह से होगा किसे क्या मिलेगा? यही इस योजना का खाका था. जिसे माउंटबेटेन ने बनाया था, इसलिए इसे माउंटबेटेन योजना कहा गया.’’ नेत्रपाल ने कहा कि इसे वर्तमान समय में घटी आंध्रप्रदेश विभाजन की घटना से आसानी से समझ सकते हैं. जैसे राज्य की परिसंपत्तियों, कर्मचारियों का बंटवारा किया गया वैसे ही देश के निर्माण की प्रक्रिया में परिसंपत्ति, भूमि, क्षेत्र और सेना का बंटवारा कैसे होगा? सीमा का निर्धारण, राज्य के अधिकार और संविधान निर्माण की प्रक्रिया क्या होगी जैसे प्रश्नों के समाधान के साथ ये योजना मोटे तौर पर विभाजन को अमलीजामा कैसे पहनाएं का खाका प्रस्तुत करती थी.

उपरोक्त तीन मुख्य और इन सभी महत्वपूर्ण बिन्दुओं को शामिल करते हुए भारत की स्वतंत्रता और पाकिस्तान के निर्माण का खाका खींचा गया. यही योजना बाद में भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के रुप में विकसित हुई. जिसके आधार पर भारत को ब्रिटेन के शासन से मुक्ति मिली और स्वराज स्थापित हुआ और पाकिस्तान के रुप में भारत का एक बडा हिस्सा भी उससे अलग हुआ.

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