रघोत्तम शुक्ल
Magh Purnima 2026: जिस मास की पूर्णिमा तिथि को चंद्रदेव मघा नक्षत्र का भोग करते हैं, वही माघ मास कहलाता है। इस समय सूर्य उत्तरायण में होते हैं, जिससे उत्तरी गोलार्द्ध में ऊर्जा और ताप का संचार होता है. शिशिर ऋतु का यह काल न अधिक ठंडा होता है, न गर्म—इसलिए इसे जीवों के लिए सुखद और स्वास्थ्यवर्धक माना गया है.
माघ मास का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है. इस पूरे महीने श्रद्धालु पवित्र नदियों, विशेषकर तीर्थराज प्रयाग के संगम पर निवास कर स्नान, ध्यान, जप और दान करके पुण्य अर्जित करते हैं. गंगा स्नान का महत्व तो शास्त्रों में बार-बार बताया गया है.
पंडितराज जगन्नाथ ने गंगा लहरी में गंगा माता की महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है—
श्लोक
प्रभाते स्नांतीनां नृपति रमणीनां कुचतटी
गतो यावन्मातर्मिलति तव तोयैर्मृगमदः।
मृगास्तावद्वैमानिक शत सहसैः परिवृता
विशति स्वच्छंदं विमल वपुषो नंदनवनम्॥
अर्थ: हे मां गंगे! प्रभात काल में जब राजाओं की रानियां आपके जल में स्नान करती हैं, तब उनके शरीर से घुला कस्तूरी जल में मिल जाता है. उस कस्तूरी के प्रभाव से जिन मृगों से वह उत्पन्न हुई थी, उन्हें स्वर्ग से सहस्रों विमान लेने आते हैं और वे नंदनवन में विहार करते हैं.
माघ पूर्णिमा का विशेष महत्व
पूर्णिमा तिथि स्वयं में ही अत्यंत पुण्यदायी मानी गई है। वराह पुराण (अध्याय 35) के अनुसार इस तिथि का स्वामित्व ब्रह्मा जी ने औषधियों के धारक चंद्रदेव को दिया है. एक कथा के अनुसार, दक्ष प्रजापति के शाप से चंद्रदेव क्षीण हो गए थे. तब भगवान विष्णु के निर्देश पर समुद्र मंथन हुआ, जिससे चंद्रदेव पुनः निर्मल और तेजस्वी बने.
भगवान शिव ने उनकी अमृतमयी द्वितीया कला को अपने मस्तक पर धारण किया और ब्रह्मा जी ने उन्हें पूर्णिमा तिथि का स्वामी बनाया। चूंकि इस कार्य की पूर्णता भगवान विष्णु द्वारा कराई गई, इसलिए माघ पूर्णिमा के दिन विष्णु और लक्ष्मी जी के पूजन तथा व्रत का विधान है.
स्नान, दान और व्रत की महिमा
पद्म पुराण (अध्याय 219–250) में माघ पूर्णिमा का विस्तार से वर्णन है. इस दिन किया गया स्नान, दान और उपवास भोग और मोक्ष—दोनों देने वाला बताया गया है। विशेष रूप से तिल दान की महिमा अत्यधिक है, क्योंकि तिल को भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न माना गया है। यज्ञ, श्राद्ध और दान में तिल का प्रयोग अनिवार्य है.
दान की अन्य श्रेष्ठ वस्तुएं हैं—फल, अन्न, कपास, कंबल, घी, गुड़, मोदक आदि. शास्त्र कहते हैं कि बिना दान के स्नान का फल नहीं मिलता, वह केवल औपचारिक रह जाता है. दान सात्विक होना चाहिए। गीता में कहा गया है—
श्लोक (गीता 17.20)
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्विकं स्मृतम्॥
अर्थ: जो दान कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रतिफल की इच्छा के, उचित देश, काल और पात्र को दिया जाता है, वही सात्विक दान कहलाता है.
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पूजा विधि और कथा
माघ पूर्णिमा के दिन प्रातः स्नान के बाद लक्ष्मी-विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। पहले गणेश पूजन करें, फिर विष्णु-लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करें। सत्यनारायण कथा का श्रवण करें, यथाशक्ति दान दें और सायंकाल उदित चंद्रमा को अर्घ्य देकर चंद्रदेव की आराधना करें. पद्म पुराण में सुव्रत नामक ब्राह्मण की कथा आती है, जो जीवन में लोभी था. उसका सारा धन नष्ट हो गया. उसने माघ मास में प्रयाग में स्नान किया और कुछ दिनों बाद वहीं देह त्याग दी। उसे स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति हुई.
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं—
श्लोक
कासी विधि वस तनु तजे, हठि तनु तजे प्रयाग।
तुलसी जो फल सो सुलभ राम नाम अनुराग॥
इस प्रकार माघ मास और विशेषकर माघ पूर्णिमा का दिन स्नान, दान, पूजन और व्रत के लिए अत्यंत पुण्यदायी है. श्रद्धा और सात्विक भाव से किया गया यह कर्म जीवन को शुद्ध, सुखी और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है.
