शिलापट्ट में यह बताया गया है कि सर्वप्रथम यहां पर बाबूराम रतन सिंह ने इलाके में अमन-चैन व खुशहाली के लिए वर्ष 1597 में दुर्गापूजा की शुरुआत की थी, जो कि अब तक पीढ़ी पर दर पीढ़ी अनवरत रूप से जारी है. वर्तमान समय में बाबू रामरतन सिंह की 19वीं पीढ़ी के सदस्य टिकैत कामाख्या नारायण सिंह के नेतृत्व में दुर्गापूजा का आयोजन किया जा रहा है.
1973 में रोक दी गयी
भैंसे की बलि
बताया जाता है, कि पूर्व में यहां बकरे के साथ-साथ भैंसे की बलि देने का प्रचलन था, लेकिन वर्ष 1973 से भैंसे की बलि रोक दी गयी. हालांकि, बकरे की बलि देने की प्रथा अभी भी कायम है. महानवमी व विजयादशमी के अवसर पर बकरे की बलि दी जाती है. वर्तमान में आचार्य डॉ रामानंद पांडेय के नेतृत्व में प्रत्येक दिन में दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा रहा है. साथ ही मंदिर प्रांगण में आकर्षक साज-सज्जा की जा रही है.
आस्था का प्रतीक है दुर्गा मंदिर
किसगो स्थित दुर्गा मंदिर के प्रति लोगों में गहरी आस्था है. लोगों का कहना है कि इस मंदिर में मांगी गयी सभी मनोकामना मन्नत पूरी होती है. मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मां दुर्गा का अनुष्ठान, प्रतिमा निर्माण से लेकर प्रतिमा की साज सज्जा, डाक का खर्च वहन करते हैं. इस बार डाक का खर्च किसगो गांव के भरत व पिंकू हाड़ी वहन कर रहे हैं. पूजा के दौरान यहां काफी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. आयोजन को सफल बनाने में अध्यक्ष टिकैत कामाख्या नारायण सिंह, नकुल सिंह, रामकृष्ण सिंह, जितेंद्र शर्मा, मदन मोहन सिंह, निजामुद्दीन खान, संतोष पांडेय, शंकर यादव, विपिन सिंह, विकास पांडेय आदि सक्रिय हैं.
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