पूसा . डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय स्थित संचार केंद्र के पंचतंत्र सभागार में बेहतर उत्पादन के लिए समेकित मत्स्यपालन विषय पर जारी प्रशिक्षण प्रमाण पत्र वितरण के साथ सम्पन्न हो गया. अध्यक्षता करते हुए प्रसार शिक्षा उप निदेशक प्रशिक्षण डॉ बिनीता सतपथी ने कहा कि फिश फार्मिंग शुरू करने के लिए अच्छी दोमट मिट्टी वाला तालाब बनाने की जरूरत है. पूरे साल तालाब में पानी की उपलब्धता बरकरार रहे. तालाब को तैयार करने करने के दौरान वैज्ञानिकी विधि को अपनाते हुए चूने व गोबर की खाद का प्रयोग करना जरूरी होता है. सही आकार की मछली के बीज डालें. समय-समय पर चारा और पानी की व्यवस्था सुनिश्चित करें. उन्होंने कहा कि मछली के बीमार होने पर विशेषज्ञ से जांच कराना चाहिए. धान के खेतों में भी मछली पालन किया जा सकता है, जिसे एकीकृत मत्स्यपालन कहते हैं. इससे मत्स्यपालकों को दोहरा लाभ होता है. बायोफ्लॉक मछलीपालन से होने वाला लाभ कई कारकों पर निर्भर करता है. जिनमें टैंक का आकार, मछलियों की प्रजाति, मछलियों का आहार, बिजली की खपत आदि शामिल है. डा सतपथी ने कहा कि मत्स्यपालन को जल कृषि भी कहा जाता है. नियंत्रित वातावरण में जलीय जीवों का नियंत्रित पालन-पोषण करता है. मछलियों का वजन तेजी से बढ़ाने के लिए उनके आहार का विशेष ध्यान देना जरूरी होता है. उन्हें आहार के रूप में प्रोटीनयुक्त चारा उपलब्ध कराने की दिशा में पहल करने की आवश्यकता जतायी. मौके कृषि विज्ञान केंद्र परसौनी के हेड सह वरिष्ठ वैज्ञानिक पर डॉ अभय, एसएमएस फीसरीज डा उदय, डा फूलचंद, डा संजीव आदि ने प्रतिभागियों के साथ अपने विचार साझा किये. टेक्निकल टीम के सुरेश कुमार, सूरज कुमार, विक्की आदि मौजूद थे.
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