महागामा बाजार में स्थित यह प्राचीन दुर्गा मंदिर लगभग छह शताब्दी पुराना है, जिसे खैतोरी राजा मोल ब्रह्म ने कुलदेवी मां दुर्गा के लिए बनवाया था. सुर्खी-चूने की कलाकृतियां अत्यंत सुंदर एवं विशिष्ट हैं. मंदिर में मुख्य द्वार सहित 18 द्वार हैं और दीवारों पर जटिल नक्काशी देखने को मिलती है. मंदिर की पश्चिमी दीवार पर एक प्राचीन लिपि में मंदिर इतिहास से जुड़ी जानकारी अंकित है, जिसे आज तक कोई पूरी तरह नहीं पढ़ पाया है. नवरात्र के दौरान राजवंशीय परंपरानुसार तांत्रिक विधि से पूजा-अर्चना होती है. पूजा के दौरान अखंड दीप, कलश स्थापना, दुर्गा सप्तशती पाठ, तथा प्रत्येक दिन बकरे की बली दी जाती है. षष्ठी पूजन को राज परिवार वंशज, मंदिर से लगभग एक किलोमीटर दूर बेल वृक्ष के नीचे जुड़वा बेल की पूजा करके माता बेलभरनी का स्वागत करते हैं. सप्तमी को पारंपरिक ढोल-ताशों के साथ मंदिर लाया जाता है, जहां श्रद्धालु अरहर की डाली से बनी झाड़ू, फूल, बेलपत्र और दूध लेकर आते हैं. मंदिर प्रांगण में राजपुरोहित जयशंकर शुक्ला, अरविंद झा, सतीश झा द्वारा नव पत्रिका पूजन के बाद प्रतिमा को गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया जाता है. सप्तमी की रात्रि में विशेष निशा पूजा होती है एवं मां को ५६ प्रकार का भोग अर्पित किया जाता है. अष्टमी की मध्यरात्रि में फुलायस व तांत्रिक विधि से बली पूजा होती है. नवमी को मनोकामना पूर्ति पर हजारों बकरों की बलि दी जाती है. दशमी की शाम, प्रतिमा को भक्तजन कंधे पर उठाकर जयघोष के साथ पुराने पोखर में विसर्जित करते हैं. दुर्गा पूजा के अवसर पर मंदिर प्रांगण में भव्य मेला लग जाता है. इस वर्ष भी मंदिर में भव्य सजावट एवं प्रसाधन कार्य जारी है और दुर्गा सप्तशती पाठ से वातावरण भक्तिमय हो गया है. श्रद्धालुओं में उत्साह एवं आस्था का उल्लास बढ़ गया है.
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