अंधेरे में भटकता शैशव

-हरिवंश- मध्य बिहार में हत्या करनेवाले उन्मादी गिरोह बच्चों-बूढ़ों और महिलाओं पर भी वार करने से नहीं चूकते. पिछले वर्ष गरमियों में ही दलेलचक-बधौरा में नरसंहार हुआ था, जिसमें अनेक बच्चे मारे गये. अपने स्वजनों की हत्या देख कुछ बच्चे भाग कर खेतों में छुप गये. उनमें से ही वीरेंद्र और मुखिया थे. दोनों की […]

-हरिवंश-

मध्य बिहार में हत्या करनेवाले उन्मादी गिरोह बच्चों-बूढ़ों और महिलाओं पर भी वार करने से नहीं चूकते. पिछले वर्ष गरमियों में ही दलेलचक-बधौरा में नरसंहार हुआ था, जिसमें अनेक बच्चे मारे गये. अपने स्वजनों की हत्या देख कुछ बच्चे भाग कर खेतों में छुप गये. उनमें से ही वीरेंद्र और मुखिया थे. दोनों की उम्र 8-10 वर्ष के बीच रही होगी. जब तक इस ‘राजनीतिक तीर्थ’ पर सभी दलों के नेता पहुंचते रहे. उनकी तसवीरें सुर्खियों में छपती रहीं. उन बच्चों का अब क्या हश्र हुआ? उनका विकास क्या नफरत की आग में झुलसते हुए होगा? इन सवालों से समाज के अभिरक्षक न तब चिंतित थे, न अब हैं.

नोन्हीं-नगवां हत्याकांड में अपराधियों ने लालदास के बच्चे उमेश (उम्र 7 वर्ष 6 महीने) और बच्ची पिंकी (छह माह) को मार डाला. अब लालदास के तीन अनाथ बच्चे बचे हुए हैं? ऐसे बच्चों के भविष्य के लिए कहीं कोई कार्यक्रम या चर्चा नहीं है.उमेश की तरह रविदास के दो बच्चों (एक 7 वर्ष, दूसरा नौ वर्ष) को भी हत्यारों ने भून दिया. देवचरण दास और उसके बेटे नगेंद्र दास (10 वर्ष) को भी हमलावरों ने मार डाला.

नगवां में आक्रमणकारियों ने हरकिशुन (उम्र 7 वर्ष) और श्रीकिशुन (उम्र 8 वर्ष) को मारने का प्रयास किया. दोनों गंभीर रूप से घायल जहानाबाद अस्पताल में भरती हैं. इस हादसे में मारे गये चंद्रदेव पासवान की आठ वर्ष की लड़की कांति ने अपने पिता को मुखाग्नि दी. अब उस अनाथ अकेली लड़की का मानसिक विकास किन परिस्थितियों में होगा? इसी गांव के टनक दास (उम्र 12 वर्ष) ने अपने पिता की हत्या होते देख पास के तालाब में कूद कर अपनी जान बचायी. अब वह हर बाहरी आगंतुक को देख कर सुबकता है.


इस अंचल में हुए अनगिनत नरसंहारों और हत्याओं के बाद जो अनाथ बच्चे-बच्चियां बच जाते हैं. उनकी शिक्षा का प्रबंध क्या सरकार नहीं कर सकती? क्या ऐसे बेकसूर बच्चों की पूरी पीढ़ी नफरत, हिंसा और घृणा के माहौल में नहीं पनपेगी?जहानाबाद अंचल में ऐसे अनाथ बच्चों की बड़ी तादाद अंधेरी सुरंग में भटक रही है. स्वाभाविक है उनके मन में घृणा, द्वेष और हिंसा के बीज पनप रहे होंगे. इनकी सुध न किसी अखबार को है और न ही विपक्षी या कांग्रेसी नेताओं को.

चूंकि ये अबोध-अनबोले बच्चे अपने लिए कोई मांग नहीं कर सकते. इस कारण इनके भविष्य को ले कर कहीं सुगबुगाहट नहीं होती. न ही कोई स्वयंसेवी संगठन या मानव सेवा के नारे लगानेवाले समाजसेवक इन बच्चों के लिए चिंतित हैं.क्या हम सब नफरत की आग में पगी एक नयी पीढ़ी पैदा करने का अपराध नहीं कर रहे हैं?

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