पिद्दी साबित हुए भागवत झा आजाद

-हरिवंश- अंतत: कांग्रेस आलाकमान भागवत झा आजाद को हटाने पर सहमत हो गया. आलाकमान के प्रतिनिधि के रूप में आये केंद्रीय गृहमंत्री बूटा सिंह और इस्पात खान मंत्री माखनलाल फोतेदार, राज्य कांग्रेस अध्यक्ष तारिक अनवर, श्रम मंत्री बिंदेश्वरी दुबे, जगन्नाथ मिश्र, एलपी शाही की तीन-चार दिनों की मशक्कत और असंतुष्टों के साथ लंबी बातचीत के […]

-हरिवंश-

अंतत: कांग्रेस आलाकमान भागवत झा आजाद को हटाने पर सहमत हो गया. आलाकमान के प्रतिनिधि के रूप में आये केंद्रीय गृहमंत्री बूटा सिंह और इस्पात खान मंत्री माखनलाल फोतेदार, राज्य कांग्रेस अध्यक्ष तारिक अनवर, श्रम मंत्री बिंदेश्वरी दुबे, जगन्नाथ मिश्र, एलपी शाही की तीन-चार दिनों की मशक्कत और असंतुष्टों के साथ लंबी बातचीत के बाद ही इस संकट का हल निकल सका. इस समझौते के तहत असंतुष्टों ने मुख्यमंत्री बदलने का अंतिम फैसला राजीव गांधी पर छोड़ दिया और एक फरवरी को विधानसभा में बैठने के लिए राजी हो गये. बदले में राजीव गांधी के फैसले तक यानी राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पास करने के बाद लेखा अनुदान पास किये बिना ही विधानसभा को अनिश्चितकाल तक स्थगित करने पर सहमति हुई. इस पूरे संकट के दौरान कांग्रेस के करीब 125 असंतुष्ट विधायक पूरी तरह एकजुट रहे और बूटा सिंह और फोतेदार की धमकियों के आगे नहीं झुके.

भागवत झा आजाद को बचाने के हर संभव प्रयास किये गये. दिल्ली में बूटा सिंह और शीला दीक्षित जैसे कुछ आजाद समर्थक नेता प्रधानमंत्री को समझाते रहे कि यदि ऐसी स्थिति में आजाद को हटाया गया, तो इससे राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली में प्रधानमंत्री के खिलाफ सक्रिय असंतुष्टों को बल मिलेगा. शायद इसी कारण आलाकमान असंतुष्टों के आगे झुकने को तैयार नहीं था. लेकिन करीब 125 असंतुष्ट विधायकों के बागी रुख और दिल्ली में बिहार के नेताओं की राय को देखते हुए अंतत: आलाकमान इस बात पर सहमत हुआ कि एक मुख्यमंत्री को बचाने के लिए पार्टी के 125 विधायकों को बलि नहीं दी जा सकती.

कांग्रेस आलाकमान ने एक फरवरी तक श्री आजाद को बचाने के लिए साम-दाम, दंड-भेद के सारे तरीके अपनाये, लेकिन इस दौरान श्री आजाद लगातार पिद्दी ही साबित होते रहे. आलाकमान ने उन्हें लंबा समय दिया और उनके कहने पर उनकी राह की दोनों बाधाओं – राज्यपाल गोविंद नारायण सिंह और विधानसभा अध्यक्ष शिवचंद्र झा हटा दिये गये. लेकिन श्री आजाद इसका लाभ उठाने में विफल रहे. इस दौरान असंतुष्टों के बीच से एक भी विधायक वह अपने पक्ष में नहीं ला सके. कांग्रेस सांसद किंग महेंद्र की समर्थक जहानाबाद ‘लॉबी’ के तीन-चार विधायकों को असंतुष्टों के साथ जाने से उन्होंने रोक लिया, पर इस दौरान हरिजन विधायक ज्योति, पूर्व राज्यमंत्री सुशीला केरकेट्टा, राजेंद्र यादव, रामेश्वर यादव, करण मरांडी और उसमान अली असंतुष्टों के खेमे में जा मिले. अंतिम समय में उन्होंने कुछ विधायकों को पटाने की कोशिश की, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. कुछ विधायकों का कहना था कि यही काम यदि उन्होंने कुछ महीने पहले किया होता, तो यह नौबत ही नहीं आती. दरअसल आजाद की तुनकमिजाजी ही उनके पराभव का कारण बनी.

दरअसल, भागवत झा आजाद का लगातार यही मानना था कि वह आलाकमान द्वारा भेजे गये हैं, वह भूल गये कि पार्टी के विधायकों-सांसदों और नेताओं को साथ लेने की जिम्मेदारी भी उनकी थी. लेकिन यह न करके उन्होंने सबके खिलाफ एक साथ मोरचा खोल लिया. उनका तकिया कलाम रहा, ‘मैं कोई इन विधायकों के चाहने से यहां आया हूं, जो इनकी परवाह करूं. मुझे तो आलाकमान ने यहां सबको ठीक करने के लिए भेजा है.’ एक-एक कर नाराज होते गये विधायकों की गतिविधियों के जवाब में उनका कहना था – ‘विषधर मत डोल मेरा आसन बहुत कड़ा है.’ लेकिन कांग्रेस के जिन तत्वों के खिलाफ वह जिहाद छेड़ रहे हैं, असल में वह उनके खिलाफ कुछ ठोस नहीं कर सके.

नतीजतन ये सारे तत्व एक साथ जुट कर उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए तन, मन और धन से जुट गये. इन लोगों ने आलाकमान को यह समझाना शुरू किया कि श्री आजाद चुनाव से ठीक पहले राज्य में विकास कार्यों के बजाय निजी लोकप्रियता हासिल करने और वाहवाही लूटने के लिए जो कुछ कर रहे हैं, उससे कांग्रेस की साख खत्म हो रही है. वह अपने को छोड़ कर प्राय: सबको भ्रष्ट और माफिया घोषित करते हैं. इससे यह जाहिर है कि उन्हें छोड़ राज्य में पूरी कांग्रेस भ्रष्ट है. फिर ऐसी कांग्रेस को अगले चुनाव में जनता कैसे समर्थन देगी. मुख्यमंत्री का मानना था कि वह जो कुछ कर रहे हैं, उससे आम लोगों में कांग्रेस की छवि निखरेगी और लोग समर्थन देंगे. जबकि असंतुष्टों का आरोप था कि श्री आजाद और उनके सहयोगी वह सब कुछ कर रहे हैं जिनके लिए वह अन्य कांग्रेसियों को खुलेआम गाली देते हैं. उनके साले बच्चा झा लगातार राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों में दखल देते हैं. श्री आजाद ने अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री श्री दुबे से कोई सीख नहीं ली. जिनके दामाद उनके पतन का कारण बने. श्री आजाद लगातार अपने साले को संरक्षण देते रहे.

भागवत झा आजाद ने कांग्रेस विधायक दल के अंदर अपने खिलाफ पनप रहे विरोध को कभी तरजीह नहीं दी. लगातार पांच दिनों तक पटना में आलाकमान के प्रतिनिधि इस संकट को आजाद के पक्ष में सलटाने की कोशिश करते रहे, लेकिन दूसरी तरफ आजाद समर्थक विधायकों की संख्या निरंतर घटती गयी. उनके पक्ष से विधायक विक्षुब्धों के साथ मिलते गये. सही तथ्य तो यह है कि भागवत झा आजाद में सामूहिक नेतृत्व की क्षमता ही नहीं है. अपने मंत्रिमंडल के राजेंद्र प्रसाद सिंह, सिद्धेश्वर प्रसाद, रामानंद यादव जैसे कुशल और सक्षम लोगों के अनुभव और निष्ठा का लाभ आजाद जी नहीं उठा सके. दूसरी तरफ वह लगातार कांग्रेस में डॉ जगन्नाथ मिश्र, रामाश्रय प्रसाद सिंह, शिवचंद्र झा के खिलाफ षडयंत्र करते रहे.

उन्होंने कांग्रेस के इन नेताओं के खिलाफ इन लोगों के चुनाव क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी लोगों को बढ़ावा दिया. उनकी रणनीति रही कि वह डॉ जगन्नाथ मिश्र के मुकाबले नागेंद्र झा को मिथिलांचल में खड़ा करें, रामाश्रय प्रसाद सिंह के मुकाबले उन्होंने विवादास्पद रामजतन सिन्हा को प्रमुखता दी. इस तरह अपने दल के ही उन नेताओं के खिलाफ उन्होंने समानांतर शक्ति केंद्र पैदा करने की कोशिश की. इस प्रयास में उनसे एक आधारभूत चूक हुई. उन्होंने ऐसे लोगों को इनके मुकाबले खड़ा किया, जिनका जनाधार पुख्ता नहीं था. दूसरी तरफ उन्होंने माफिया तत्वों पर हल्ला बोलने का स्वांग किया, लेकिन हकीकत यह है कि उन्हें इस अभियान में सफलता नहीं मिली. एक तरफ उन्होंने राजो सिंह पर प्रहार किया, दूसरी ओर राजो सिंह को कांग्रेस में शरीक किया गया. मुख्यमंत्री के कार्यकाल में महिलाओं पर पुलिस अत्याचार की घटना में काफी वृद्धि हुई. उन पर यह भी आरोप लगा कि भागलपुर में वह समानांतर माफिया ताकतों को प्रश्रय दे रहे हैं. पापरी बोस कांड पर उनकी चुप्पी रहस्यमय रही. भागलपुर में इस घटना के विरोध में अद्भुत जन प्रतिक्रिया हुई. पूरा शहर तीन दिनों तक बंद रहा, लेकिन आजाद जी ने दोषी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आदेश नहीं दिया.

भागवत झा आजाद के बिहार आने के समय उनके खिलाफ बहुत कम विधायक थे, लेकिन उनकी कार्यशैली और अपने कार्यकर्ताओं, विधायकों को फटकारने के कारण विक्षुब्धों की संख्या निरंतर बढ़ती गयी. जो लोग उनकी मदद करते थे, उनकी भी उन्हें परवाह नहीं थी. आरंभ में सीताराम केसरी, जगन्नाथ मिश्र, सत्येंद्रनारायण सिंह, अब्दुल गफूर, रामाश्रय प्रसाद सिंह, तारिक अनवर उनके साथ थे, लेकिन कभी भी मुख्यमंत्री ने इन्हें विश्वास में नहीं लिया.

बिहार की राजनीति में ‘जाति’ की भूमिका छुपा तथ्य नहीं है. यह सही है कि इस बुराई के खिलाफ संघर्ष होना चाहिए, लेकिन इसके लिए भी राजनीतिक रणनीति आवश्यक है. आजाद ने बगैर रणनीति अपनाये इन लोगों की जड़ों पर प्रहार किया. गद्दी संभालने के बाद रविवार (6-12 मार्च ’88) को दिये इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया था कि ‘रामाश्रय बाबू मेरी पार्टी के बहुत योग्य सदस्य हैं. इसमें संदेह नहीं है’, लेकिन कुछ ही दिनों बाद मुख्यमंत्री के कारनामों से नाराज होकर, रामाश्रय बाबू ने विक्षुब्धों का झंडा उठा लिया. वस्तुत: आजाद जी ने अपने विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए ओछी हरकतें कीं.

दिल्ली स्थित बिहार भवन को मुख्यमंत्री सचिवालय से हिदायत दी गयी कि राज्य के विरोधी कांग्रेसी नेताओं के ठहरने का अग्रिम आरक्षण न किया जाये. उन्हें वाहन की सुविधा मुहैया न करायी जाये. जिन सुविधाओं के ये लोग हकदार थे, उनसे भी इन्हें वंचित कर इन्हें जलील करने की कोशिश की गयी.

दूसरी तरफ राज्य के विपक्षी नेताओं से मिल कर मुख्यमंत्री खुलेआम अपनी पार्टी के नेताओं-विधायकों को भद्दी-भद्दी गालियां देते थे. उनकी ऐसी उक्तियां विक्षुब्धों के लिए आग में घी का काम करती थीं. एक बार उन्होंने विपक्षी दल के विधायकों से कहा कि बिहार में ‘नेशनल गवर्नमेंट’ की जरूरत है. कांग्रेस की अकेली सरकार यहां स्वार्थी तत्वों से नहीं लड़ सकती.

छोटानागपुर में उन्होंने आधारहीन नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की. मुख्यमंत्री के रूप में जब वह पहली बार रांची गये, तो हवाई अड्डे पर आये उत्साहित कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को उन्होंने फटकार लगायी और उनसे बिना मिले चले गये. पिछले दिनों प्रधानमंत्री जब छोटानागपुर के दौरे पर आये, तो उनकी यात्रा में जो इनके विरोधी कांग्रेसी शामिल थे, उन्हें प्रधानमंत्री से साथ न लेने का आग्रह किया. लेकिन प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री की यह सलाह अनसुनी कर दी.

आजाद के समर्थकों ने उन्हें बताया कि राज्य में उनकी एक अलग छवि बन रही है. उनकी चर्चा सख्त प्रशासक और स्वच्छ मुख्यमंत्री के रूप में हो रही है. आजाद जी ने इस मुगालते में अपने ही दल के वरिष्ठ नेताओं पर खुला प्रहार कर अपनी इस छवि को और निखारने की विफल कोशिश की, वह जहां जाते थे, उनके समर्थक, उन्हें ‘बिहार का सरदार पटेल’ कह कर नारे लगाते थे. इस मानसिकता में श्री आजाद ने कभी भी कांग्रेस संगठन की जड़ें सींचने का काम नहीं किया.

उल्लेखनीय है कि जब आजाद मुख्ममंत्री के रूप में बिहार आये, उस समय राज्य कांग्रेस संगठन का कार्यभार तारिक अनवर को सौंपा गया. श्री अनवर ने जड़ संस्था को जीवंत बनाने की गंभीर कोशिश की, लेकिन इस प्रक्रिया में मुख्यमंत्री ही आड़े आ गये. उन्होंने अपना समानांतर संगठन बनाने की पेशकश की. अपने साले बच्चा झा को वह महामंत्री बनाने के लिए उतावले थे. अनवर ने इसका विरोध किया. इस कारण अब तक कांग्रेस संगठन के पदाधिकारियों की नियुक्ति नहीं हो सकी.

अंतत: आजिज आ कर तारिक अनवर ने 20 सूत्री कार्यक्रम के कार्यकारी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. सीताराम केसरी और दूसरे वरिष्ठ हितैषियों के सुझावों को दरकिनार कर मुख्यमंत्री आजाद ने अपने मंत्रिपरिषद में अनुभवी व वरिष्ठ लोगों को शामिल नहीं किया. इससे विक्षुब्ध एक मंच पर इकट्ठे होते गये. विक्षुब्ध विधायकों के बीच एकता का एकमात्र कारण था, आजाद जी का अमर्यादित व्यवहार. इन लोगों में आपसी कटुता होने पर भी, आजाद जी ने इन्हें अपने खिलाफ एकजुट होने के लिए मजबूर किया. आजाद जी के सौजन्य से बिहार के इस संकट में ऐसे नेता उभर आये, जिनका कोई जनाधार नहीं है. शिवचंद्र झा और संजीव टोनी की गणना ऐसे ही आधारहीन नेताओं में होती थी. संजीव टोनी की छवि बिहार में कभी प्रखर नेताओं की नहीं रही, लेकिन आजाद ने इन्हें अवसर दे कर पूरे बिहार में चर्चित बना दिया.

ऑस्कर फर्नांडिस जब शिवचंद्र झा का इस्तीफा लेने पटना आये, तब तक विक्षुब्धों ने अपनी रणनीति तय कर ली थी. उन्होंने आजाद को हटाने का प्रश्न अपने अस्तित्व से जोड़ लिया था. पांच दिनों तक विक्षुब्धों ने जो अड़ियल रवैया अपनाया और हर कोशिश के बावजूद अपनी एकता बनाये रखी, वह हाल के वर्षों में एक अलग मिसाल है. किसी भी राज्य में आलाकमान को ऐसी कठिन समस्या का सामना नहीं करना पड़ा.

इस आपाधापी में आलाकमान के प्रतिनिधियों ने विक्षुब्धों को धमकी दे कर डराने की कोशिश की, लेकिन इन विधायकों ने स्पष्ट कर दिया कि वे राष्ट्रपति शासन या विधानसभा भंग करने की धमकी से नहीं डरते. इन पांच दिनों में विक्षुब्धों और आलाकमान के प्रतिनिधियों के बीच कई बार बातचीत भंग होती नजर आयी. बीच में एक दिन सुबह फोतेदार प्रधानमंत्री से राय-मशविरा करने दिल्ली गये और शाम में पटना लौट आये. बूटा सिंह राजभवन में ही पड़ाव डाले रहे. उस शाम पटना में यह अफवाह उड़ी कि कुछ वरिष्ठ नेता दल से निष्कासित किये जायेंगे. वस्तुत: इस मामले में बूटा सिंह ने आरंभ से ही अड़ियल रवैया अपना रखा था. उनकी सलाह थी कि विधानसभा को भंग कर देना चाहिए.

ऑस्कर फर्नांडिस का तर्क था कि अभी विक्षुब्धों के दबाव में आजाद को नहीं हटाना चाहिए, वरना इससे दूसरे राज्यों के विक्षुब्ध सक्रिय हो जायेंगे. अंतत: माखनलाल फोतेदार की रणनीति से ही बिहार का यह अभूतपूर्व संकट टला. 31 जनवरी को पूरी रात वह अलग-अलग लोगों से मिलते रहे. विक्षुब्धों को समझाया कि वे नये विधानसभाध्यक्ष के चुनाव के लिए अभी दबाव न डालें. इस बीच विधानसभा स्थगित कर नये नेता का चुनाव किया जायेगा.

31 जनवरी को विक्षुब्धों ने विधानसभा का बहिष्कार किया और आलाकमान के प्रतिनिधियों से बात करने से इनकार कर दिया. इन लोगों ने खास तौर से बूटा सिंह की बदलती राय और उनके व्यवहार की कटु आलोचना की. इन लोगों ने कहा कि गृहमंत्री जानबूझ कर स्थिति बिगाड़ रहे हैं. फोतेदार ने अपनी आकस्मिक दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री को वस्तुस्थिति की जानकारी दी और कहा कि विक्षुब्ध आजाद सरकार को गिरा सकते हैं. विधानसभा सत्र के दौरान कभी भी कांग्रेस के 60 (मंत्री समेत) से अधिक सदस्य विधानसभा में मौजूद नहीं रहे. प्रधानमंत्री से राय मशविरा के बाद जब फोतेदार पटना लौटे, तो उन्होंने तुरंत जगन्नाथ मिश्र, राधानंदन झा, बलिराम भगत और तारिक अनवर से लंबी बातचीत की.

इस बातचीत के बाद ही इस संकट का हल निकला. इस समझौते के तहत आलाकमान आजाद को हटाने के लिए सहमत हो गया. प्रधानमंत्री ने शिवचंद्र झा को बातचीत के लिए दिल्ली आमंत्रित किया है. इसके बाद विक्षुब्ध विधायकों ने विधानसभा की बैठक में हिस्सा लिया. विक्षुब्धों ने इस संकट को निबटाने के लिए चार लोगों की एक समिति भी गठित की. इस समिति में बिंदेश्वरी दूबे, एलपी शाही, तारिक अनवर और जगन्नाथ मिश्र हैं. इस समझौते के तहत ही 2 फरवरी को विधानमंडल में राज्यपाल के अभिभाषण के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया गया.

इस समझौते के बाद आजाद के खेमे के एक प्रवक्ता का कहना था कि मुख्यमंत्री को अभी हटाया नहीं जा रहा है. बूटा सिंह ने दिल्ली रवाना होने से पूर्व पत्रकारों से कहा कि शीघ्र ही इस समस्या का राजनीतिक निर्णय लिया जायेगा. लेकिन दिल्ली से प्राप्त विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार आलाकमान अब आजाद का उत्तराधिकारी तलाश रहा है. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक संभव है आलाकमान आजाद के उत्तराधिकारी को तलाश लें.

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