-हरिवंश-
सातवें दशक में विंध्यप्रदेश की राजनीति में दो नाम तेजी से उभरे थे. गोविंद नारायण सिंह और अर्जुन सिंह. इन दोनों के पिता परम मित्र थे. गोविंद नारायण सिंह के पिता कैप्टन अवधेश प्रताप सिंह प्रसिद्ध स्वतंत्रा सेनानी और कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता थे. वे अकसर कहते थे, ‘मेरे लिए अर्जुन और गोविंद में कोई फर्क नहीं है. अगर गोविंद और अर्जुन में मतभेद होगा, तो मैं अर्जुन के साथ रहूंगा.’ अर्जुन सिंह के पिता शिव बहादुर सिंह भी गोविंद नारायण सिंह को अपने बेटे की तरह मानते थे. इसीलिए उन्होंने पढ़ाई-लिखाई का सारा खर्चा उठा कर युवा गोविंद नारायण सिंह को हिंदू विश्वविद्यालय भेजा था. जहां दोनों बुजुर्ग सगे भाइयों की तरह थे, वहीं दोनों के बेटों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक लंबा इतिहास है.
गोविंद नारायण सिंह ने अर्जुन सिंह को कभी पसंद नहीं किया. 1957 में जब अर्जुन सिंह निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से निर्वाचित होने के बाद कैलाशनाथ काटजू के आशीर्वाद से कांग्रेस में प्रवेश कर रहे थे, तब गोविंद नारायण सिंह दिल्ली दरबार तक दौड़े. लगातार पुरजोर कोशिश की कि अर्जुन सिंह का कांग्रेस में प्रवेश न हो पाये. वे असफल रहे. 1963 में अर्जुन सिंह को राज्य मंत्रिमंडल में जगह भी मिल गयी. इन्हीं दिनों कैप्टन अवधेश प्रताप सिंह ने अपने बेटे को बुला कर डांटा था. 1967 में गोविंद नारायण सिंह ने कांग्रेस में रहते हुए जनसंघ और समाजवादियों की मदद कर के अर्जुन सिंह को विधानसभा चुनाव में पराजित करा दिया.
तब तक गोविंद नारायण सिंह ने ग्वालियर राजघराने की जेब में अपनी जगह बना ली थी. वे परेशान अभी भी थे, क्योंकि अर्जुन सिंह के चुनाव हारते ही करीब 15 कांग्रेसी विधायकों ने पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र से पेशकश की कि वे विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे कर अर्जुन सिंह के लिए जगह खाली करने को तैयार हैं. ऐसा हुआ भी. अर्जुन सिंह उपचुनाव जीत कर आये और जून ’67 में पुन: मंत्री बनाये गये. गोविंद नारायण सिंह ने तब तक मिश्र मंत्रिमंडल को अपदस्थ करने का फैसला कर लिया था.
जुलाई 1967 में रीवा-नरेश के गोविंदगढ़ महल में इस क्षेत्र के विधायकों की बैठक हुई. गोविंद नारायण सिंह ने वहां उपस्थित 16 विधायकों को कांग्रेस क्यों छोड़नी चाहिए. इस पर अनेक तर्क दिये. अर्जुन सिंह ने तर्क दिया कि कांग्रेस छोड़ना अविवेकपूर्ण और आत्मघाती होगा. वे इंदिरा गांधी का साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे. बैठक दो दिनों तक चली. अंतत: विधायकों ने गोविंद नारायण सिंह की बात मानने से इनकार कर दिया. इसी बीच अर्जुन सिंह ने मिश्र जी को 36 विधायकों की लिस्ट दी, जो गोविंद नारायण सिंह के साथ राजमाता ग्वालियर के खेमे में जा रहे थे. सरकार टूटी.
यही विधायक कांग्रेस छोड़ कर गये. गोविंद नारायण सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने. दस महीनों के कार्यकाल में गोविंद नारायण सिंह ने हास्यास्पद हरकतों से नये कीर्तिमान स्थापित किये. वे अक्सर अज्ञातवास में भी चले जाते थे. वे एक राजमाता के एक सच्चे सामंत की तरह व्यवहार कर रहे थे. पर संविद सरकार जल्दी ही लड़खड़ाने लगी. अब मुख्यमंत्री ने कांग्रेस में वासी की रणनीति बनायी. इसके लिए उन्हें अपने ‘भाई’ अर्जुन सिंह की याद आयी.
एक दिन मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह अपने ‘भाई’ के घर जा धमके और ड्राइंग रूम में जा कर लेट गये. अर्जुन सिंह ने आ कर पूछा कि क्या हुआ, तो बोले, ‘गलती हो गयी, तुम निजलिंगप्पा जी से बात करो. मैं वापस आना चाहता हूं.’ अर्जुन सिंह का कहना था कि वे इंदिरा गांधी से पूछे बिना किसी से बात नहीं कर सकते. हताश गोविंद नारायण सिंह ने कहा कि किसी से भी बात करो, मुझे कोई एतराज नहीं है. बहरहाल इंदिरा गांधी और निजलिंगप्पा से बातचीत के बाद अर्जुन सिंह भोपाल वापस आये. गोविंद नारायण सिंह को वापस लेने की शर्त थी कि वे स्वयं सरकार नष्ट करें. पहले स्वयं हटें. फिर सरकार गिरायें. पर मुख्यमंत्री भोपाल से नदारद थे. वे एक जंगल में अज्ञातवास कर रहे थे. वहीं उन्हें शर्ते बतायी गयीं. उन्होंने वैसा किया भी. बाकी इतिहास है. पर यह उनका विधानसभा में आज तक का अंतिम कार्यकाल था. वे 1969 में कांग्रेस में वापस आ गये थे.
1977 में इंदिरा गांधी चुनाव हार गयी थीं. ब्रह्मानंद रेड्डी कांग्रेस अध्यक्ष बने थे. इंदिरा गांधी की कांग्रेस में अवहेलना शुरू हो गयी थी. उन्होंने इंदिरा गांधी को चिढ़ाने के लिए गोविंद नारायण सिंह को राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया. 1977 जून में विधानसभा चुनाव हुए, गोविंद नारायण जी ने अध्यक्ष की हैसियत से मनमर्जी से टिकट आवंटित किये. तब भी 80 कांग्रेसी विधायक चुने गये. चुनाव के फौरन बाद गोविंद नारायण सिंह, श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल ने एकजुट हो कर बसंतराव उइके को विधानसभा पार्टी का नेता बनाने का प्रस्ताव किया.
अर्जुन सिंह ने श्रीमती गांधी से दिल्ली आ कर नेता पद का चुनाव लड़ने की अनुमति मांगी. श्रीमती गांधी काफी दबी-दबी और खिन्न थीं. उनका कहना था कि मैं तुम्हें सिर्फ आशीर्वाद दे सकती हूं. पर सहायता नहीं. अर्जुन सिंह ने भोपाल जा कर उइके के विरुद्ध चुनाव लड़ा. 80 विधायकों में से 61 विधायक छत्तीसगढ़-महाकौशल के थे. इसलिए किसी को उम्मीद न थी कि अर्जुन सिंह को 15-16 से ज्यादा वोट मिलेंगे. किंतु वे जीत गये. इस तरह गोविंद नारायण सिंह की नाराजगी और बढ़ी.
गोविंद नारायण सिंह हर साल रक्षाबंधन पर एक थाली में राखी, फूल और मिठाई लेकर इंदिरा गांधी के पास राखी बंधवाने जाते थे. पर उन्होंने 1977, 78 और ’79 में ऐसा नहीं किया. जब वे 1980 में फिर राखी बंधवाने गये, तब श्रीमती गांधी ने राखी बांधने से इनकार कर दिया. 1987-88 में जब मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा जोरों पर थी, तब गोविंद नारायण सिंह अत्यधिक गदगद थे. उन्हें अपने दिन बहुरने की उम्मीद थी. ऐसा नहीं हुआ. बाजी फिर ‘भाई’ अर्जुन के पक्ष में रही. इसीलिए मुख्यमंत्री पद के लिए छटपटाये गोविंद नारायण सिंह राज्यपाल पद पर भी इतने आकुल और व्याकुल दीखते है.
