-हरिवंश-
ऋग्वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल की तुलना में मौर्य व गुप्तकाल के भारत की संस्कृति में व्यापक परिवर्तन हुए. मध्यकाल आते-आते इसमें और भी बदलाव आया. अंगरेजों के आने के दबाव भी इस पर पड़े. धर्म-कर्मकांड का संस्कृति से दूर का रिश्ता है. संस्कृति मूल है, धर्म-कर्मकांड उससे जुड़ी बाह्य चीजें. उत्तर वैदिक काल के गोभिल गृह्य सूत्र में उल्लेख है कि जब कोई कुमारी विवाह मंडप में आती थी, तो यज्ञोपवीत धारण किये रहती. आपस्तंब सूत्र में जिक्र है कि अगर कोई पति गलत रूप से पत्नी को त्यागता हो, तो उसे गधे का चमड़ा ओढ़ कर छह माह तक भिक्षावृत्ति करनी होगी.
उत्तर वैदिक काल में प्रकृति-पशुओं का पूजन हुआ. क्योंकि ये जीवन के आधार थे. लेकिन उत्तर वैदिक काल से ही छुआछूत-अस्पश्यता जाति-व्यवस्था का विकृत रूप भी दिखना हुआ. जिस उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों ने समाज में पुरुष के साथ कंधा-से कंधा मिला कर जीवन आरंभ किया था, वे स्त्रियां मध्यकाल आते-आते पुरुष-समाज की संपत्ति और दासी बन गयीं. कहते हैं ऋषि बादरायण वेद व्यास ने वेदों पुराणों का संकलन किया था. वेद व्यास अपनी माता के अवैध पुत्र थे. उनकी माता केवट जाति की कृष्ण वर्ण की शूद्र स्त्री थीं. लेकिन समाज में वेद व्यास की स्वीकृति महान ऋषि के रूप में थी.
भारत के प्राचीन ग्रंथों में कर्म के आधार पर सामाजिक स्वीकृति-मान्यता की अनेक मिसालें हैं. समाज में जन्मना उच्च जाति का ही एकाधिकार रहा हो, ऐसा नहीं लगता, लेकिन साथ ही इस देश के प्राचीन साहित्य में शूद्रों के साथ जघन्य अमानुषिक कृत्यों के भी उल्लेख हैं. इस विसंगति के मूल कारणों में से एक है, देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप संस्कृति धर्म और कर्मकांड में बदलाव न आना. इस असंतुलन की जड़ में ही सामाजिक विकृतियों का मूल उद्गम है. हमारी संस्कृति, धर्म-कर्मकांड में ठहराव आ गया है और देश-काल और परिस्थिति में क्रांतिकारी तब्दीली. इस खाई को पाटने का प्रयास संकट का आवश्यक इलाज है.
हिंदुस्तान के इतिहास में हम जिसे पुनर्जागरण काल कहते है, वह वस्तुत: इसी खाई को पाटने का एक गंभीर प्रयास था. इस आंदोलन की अगुवाई की थी. राजा राममोहन राय ने. सती प्रथा, मूर्ति पूजा, जातिवाद और निरर्थक धार्मिक कृत्यों का उन्होंने जोरदार विरोध किया. राममोहन राय को आजीवन अपने निडर दृष्टिकोण के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी. यहां तक कि उनकी मां ने भी उनका बहिष्कार करनेवालों का साथ दिया.
1947 के बाद से भारत में समाज सुधारक पैदा नहीं हो रहे. राजनेताओं की तादाद बरसाती मेढ़कों की तरह बढ़ती जा रही है. एकाध बाबा आमटे का उदाहरण अपवाद है. कुरीतियों के खिलाफ लड़ने के लिए दुस्साहस चाहिए. यह रास्ता कठिन और दुष्कर है. संकट और कांटों भरा है. दूसरा रास्ता सुविधावादी रास्ता है. इस देश की मौजूदा व्यवस्था में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन सत्ता में है. और कौन विरोधी है! सत्ता के अंदर-बाहर के राजनेता कमोबेश समान लाभ इस व्यवस्था से पा रहे हैं. बौने और संकुचित दृष्टि के विरोधी राजनेता भी अधिक लाभ पाने की होड़ में हैं. वस्तुत: इस देश के पुराने सांस्कृतिक मूल्यों के बल हम 21वीं शताब्दी में नहीं जा सकते. औद्योगिकरण और आधुनिकीकरण के अनुरूप हमें नयी संस्कृति का विकास करना पड़ेगा.
छुआछूत, भेदभाव, मंदिर-मसजिद और तांत्रिकों ज्योतिषियों आदि के साथ हम 21वीं शताब्दी में छलांग लगाने को तैयार हैं. 21वीं शताब्दी में कंप्यूटर, रोबोट और सभी अत्याधुनिक चीजों की कल्पना कर लीजिए, दूसरी ओर हरिजनों को जलानेवाले, पैसाखोर राजनेता और काहिल नौकरशाह भी होंगे. एक तरफ बंबई, दिल्ली, बंगलूर आदि जैसे शहर 21वीं शताब्दी में प्रवेश करेंगे, वहीं बिहार जैसा राज्य भी होगा. कार्यक्षमता बढ़ाने-तेजी से काम निबटाने के लिए सुपर कंप्यूटर और रोबोट होंगे, बाकी हमारे साथ मंदिर-मसजिद-गिरजाघर के नाम पर सिर कटानेवाले निठल्ले लोग होंगे.
मनुष्य की बलि देनेवाले और सती प्रथा की वकालत करनेवाले तत्व भी हमारे बीच मौजूद हैं. ये लोग भी 21वीं शताब्दी की यात्रा में हमारे सहयात्री हैं. पंडित-पंडे और मौलवी भी होंगे और इन सबको नकारनेवाले औद्योगिकरण के पेट से जन्मा एक वर्ग भी होगा. ट्रेड यूनियन के नाम पर दादागीरी करनेवाले माफिया गिरोह के नेता, साथ में कंपनियों को आधुनिक तकनीक से चलानेवाला प्रबंधकीय वर्ग भी होगा.
शंखनाद, अजान, घंटे-घड़ियाल की आवाजें होंगी और इनके लिए मारकाट पर हमेशा उतारू रहनेवाले लोग भी होंगे. वस्तुत: बहुत पहले ही कबीर ने नयी संस्कृति-समाज की कल्पना की थी. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में ‘जहां वेद नहीं, शास्त्र नहीं, कुरान नहीं, जप नहीं, माला, नहीं, तसबीह नहीं, मंदिर नहीं, मसजिद नहीं, अवतार नहीं, नबी नहीं, पीर नही, पैगंबर नहीं, बल्कि मानव प्रेम ही सब कुछ है.’ कबीर का यही समाज 21वीं शताब्दी का समाज हो सकता है.
