प्रेग्नेंसी में प्रोटेनुरिया का इलाज 300 एमजी से अधिक एल्बुमीन का उत्सर्जन चिंताजनक

प्रतिदिन गुर्दा यानी किडनी से 20-30 एमजी से कम एल्बुमीन पेशाब के साथ निकलता है. यदि यह 150 एमजी से ज्यादा मात्रा में निकले, तो इसे ऐबनॉर्मल माना जाता है. प्रेग्नेंसी में इसका उत्सर्जन ज्यादा मात्रा में होता है, पर यदि यह 24 घंटे में 300 एमजी से ज्यादा उत्सर्जित हो, तो इसे प्रोटेनुरिया कहा […]

प्रतिदिन गुर्दा यानी किडनी से 20-30 एमजी से कम एल्बुमीन पेशाब के साथ निकलता है. यदि यह 150 एमजी से ज्यादा मात्रा में निकले, तो इसे ऐबनॉर्मल माना जाता है. प्रेग्नेंसी में इसका उत्सर्जन ज्यादा मात्रा में होता है, पर यदि यह 24 घंटे में 300 एमजी से ज्यादा उत्सर्जित हो, तो इसे प्रोटेनुरिया कहा जाता है.
प्री क्लैम्पसिया हो सकता है कारण
प्री क्लैम्पसिया प्रेग्नेंसी की जटिल समस्या है. इसमें रक्तचाप उच्च हो जाता है, जिससे पेशाब में प्रोटीन की मात्रा बढ़ने लगती है, जब इसकी मात्रा 200 एमजी से अधिक होने लगती है, तो शरीर में सूजन आने लगता है. लिवर की कोशिकाएं भी प्रभावित होती हैं और उसमें भी सूजन देखा जाता है. खून के जमने की क्षमता कम हो जाती है.
पेशाब में झाग देखा जा सकता है. वजन बढ़ने लगता है. चेहरा खास कर आंखों के आस-पास सूजन या फैलाव देखा जा सकता है. बांह, हाथ, पैर, एंड़ियां और पेट फूलने लगते हैं. इसमें एक चीज जो सबसे जरूरी है, वह है गर्भवती का ख्याल रखना और उन्हें किसी भी प्रकार के मानसिक दबाव से दूर रखना.
प्रेग्नेंसी में पेशाब का टेस्ट हर माह जरूरी
प्रेग्नेंसी के समय में पेशाब की जांच हर माह में जरूरी है, ताकि प्रोटेनुरिया की स्थिति का पता लग सके. इसमें रक्तचाप को कंट्रोल करने के लिए दवा दी जाती है, जिससे कि प्री क्लैम्पसिया के सिचुएशन को कंट्रोल किया जा सके और पेशाब में प्रोटीन नियंत्रित स्तर में निकले.
डायबिटीज का भी पड़ता है असर
मधुमेह या डायबिटीज का असर भी प्रेग्नेंसी में देखा जाता है. जिन महिलाओं को पूर्व में ही लंबे समय से डायबिटीज हो, उन्हें भी प्रोटेनुरिया की समस्या आती है. इस अवस्था में ace inhibitors दवा दी जाती है, पर इसके कई साइड इफेक्ट हैं, इसलिए यह दवाई सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर ही खानी चाहिए.
क्रॉनिक हाइपरटेंशन या गुर्दे की बीमारी जैसे रेनल फेल्योर में भी पेशाब से प्रोटीन की मात्रा अधिक स्रावित होने लगती है. रेनल फेल्योर के कारण किडनी अनावश्यक तत्वों को फिल्टर करने में असमर्थ हो जाता है. हेपेटाइटिस बी, सी और एचआइवी के कंडीशन में भी गुर्दा इन्फेक्टेड हो जाता है और फिल्टर का काम सही से नहीं कर पाता है.
केस स्टडी
एक 32 वर्ष की महिला, जिन्हें जुड़वा बच्चे की प्रेग्नेंसी आइवीएफ (टेस्ट ट्यूब बेबी) द्वारा करायी गयी थी. वे नियमित रूप से अपनी जांच करा रही थीं. छठे माह में उन्हें मधुमेह की शिकायत देखी गयी.
सातवें महीने में रक्तचाप भी बढ़ने लगा था. रक्तचाप कम करने की दवाई तो दी ही गयी साथ में इंसुलिन देना पड़ा. महिला को प्रोटीनमेह या प्रोटेनुरिया हो गया था. यूरिन में प्रोटीन की मात्रा चार से अधिक हो गयी थी. शरीर में सूजन आ गया था. सर्जरी से डिलेवरी करायी गयी. दोनों बच्चे क्रमश: 1.5 किलोग्राम और 1.8 किलाग्राम के हुए. डिलेवरी के एक सप्ताह के बाद बीपी और प्रोटीन का लेवल नॉर्मल हो गया था.
पेशाब में प्रोटीन की जांच
इसके लिए dipstick टेस्ट किया जाता है. यदि टेस्ट में 1+ रिजल्ट आये, तो 24 घंटे के पेशाब को जमा कर उसमें प्रोटीन की मात्रा चेक की जाती है और उसी के हिसाब से ट्रीटमेंट किया जाता है.

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