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36 Farmhouse Review: इस फिल्म का मनोरंजन से है 36 का आंकड़ा

एक समय बॉलीवुड के शोमैन के नाम से प्रसिद्ध सुभाष घई के प्रोडक्शन हाउस मुक्ता आर्ट्स ने फ़िल्म 36 फार्महाउस से ओटीटी पर अपनी शुरुआत की है.सुभाष घई ने निर्देशक राम रमेश शर्मा को निर्देशन की जिम्मेदारी दी है

By उर्मिला कोरी
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36 Farmhouse Review
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36 Farmhouse Review

फ़िल्म 36 फार्महाउस

निर्माता- मुक्ता आर्ट्स

निर्देशक- राम रमेश शर्मा

कलाकार- संजय मिश्रा, विजय राज,अश्विनी कलसेकर,बरखा सिंह,अमोल पराशर,फ़्लोरा सैनी और अन्य

रेटिंग- एक

एक समय बॉलीवुड के शोमैन के नाम से प्रसिद्ध सुभाष घई के प्रोडक्शन हाउस मुक्ता आर्ट्स ने फ़िल्म 36 फार्महाउस से ओटीटी पर अपनी शुरुआत की है.सुभाष घई ने निर्देशक राम रमेश शर्मा को निर्देशन की जिम्मेदारी दी है और फ़िल्म की कहानी और संगीत पक्ष की जिम्मा खुद लिया है लेकिन दोयम दर्जे की लेखनी और निर्देशन की वजह से कई जॉनर के घालमेल वाली इस को देखकर ना तो रोमांच महसूस होता है और ना ही हंसी आती है बस अफसोस होता है कि आपने अपना समय बर्बाद कर दिया है.

फ़िल्म की शुरुआत एक वकील की हत्या से होती है.जिसे रौनक सिंह( विजय राज) अंजाम देता है क्योंकि वो अपनी माँ (माधुरी भाटिया) की पूरी जायदाद खुद लेना चाहता है.अपने दोनों भाइयों को वह उनका हिस्सा देने को तैयार नहीं है इसलिए उनके वकील की हत्या कर देता है.कहानी में पेंडेमिक का भी जिक्र हुआ है.जिससे एक रसोइए जय प्रकाश( संजय मिश्रा) की फार्महाउस में एंट्री हो जाती है.वो खुद को बैचलर बताता है क्योंकि इसी शर्त में उसे नौकरी मिलती है.उसके बाद हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि जय प्रकाश का बेटा हैरी( अमोल पराशर) भी फार्म हाउस में आ धमकता है.

बाप बेटे का अपना लालच है.क्या रौनक और उसके भाइयों में सुलह होगी.वकील की हत्या के लिए रौनक का क्या अंजाम होगा. जय प्रकाश और उसके बेटे का लालच उन्हें कहां ले जाएगा . यह आगे की कहानी है. फ़िल्म हर 15 मिनट में एक नए जॉनर के साथ जुड़ती जाती है.मर्डर मिस्ट्री तो कभी कॉमेडी तो कई बार फैमिली ड्रामा और रोमांस का भी एंगल .

यह अजीबोगरीब घालमेल जिसे कुछ भी कहा जा सकता है लेकिन एक एंटरटेनिंग और एंगेजिंग कहानी तो नहीं कही जा सकती है.फ़िल्म को 2020 में सेट किया गया है लेकिन उसका ट्रीटमेंट 90 के दशक की फिल्मों की तरह है.जहां किरदारों को ओवर द टॉप काम करवा कर हंसी लाने की कोशिश की गयी है. गीत संगीत के मामले में भी यह फ़िल्म बीते दौर की लगती है.

अभिनय की बात करें तो कई खास नाम इस फ़िल्म का चेहरा है लेकिन उनका अभिनय परदे पर बेअसर रहा है फिर चाहे संजय मिश्रा हो या विजय राज. माधुरी भाटिया , बरखा सिंह और फ़्लोरा सैनी का काम औसत है.

फ़िल्म के तकनीकी पक्ष में एडिटिंग भी बहुत कमजोर रह गयी है. फ़िल्म के कई दृश्यों में यह बात साफ तौर पर सामने आ जाती है.

कुलमिलाकर 36 फार्महाउस का मनोरंजन से 36 का आंकड़ा वाला मामला बनकर रह गयी है.

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