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Exclusive: विक्की कौशल की फ़िल्म उरी नहीं देखी है...सिर्फ एक ही फ़िल्म देखी है- शूजित सरकार

महान क्रांतिकारी सरदार उधम सिंह की कहानी अमेज़न प्राइम वीडियो पर 16 अक्टूबर को दस्तक देने जा रही है. विक्की कौशल अभिनीत इस फ़िल्म के निर्देशक शूजित सरकार हैं जो सिनेमा में अलग अलग मानवीय रिश्ते और संवेदनाओं को उकेरने के लिए जाने जाते हैं.

By उर्मिला कोरी
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Shoojit Sircar
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महान क्रांतिकारी सरदार उधम सिंह की कहानी अमेज़न प्राइम वीडियो पर 16 अक्टूबर को दस्तक देने जा रही है. विक्की कौशल अभिनीत इस फ़िल्म के निर्देशक शूजित सरकार हैं जो सिनेमा में अलग अलग मानवीय रिश्ते और संवेदनाओं को उकेरने के लिए जाने जाते हैं. सरदार उधम सिंह उनकी पहली पीरियड फ़िल्म है. इस फ़िल्म को बनाने का उनका सपना 21 सालों का रहा है. उर्मिला कोरी से हुई बातचीत...

सरदार उधम सिंह आपकी पहली पीरियड फ़िल्म है क्या चुनौतियां रही?

मैंने ज़िन्दगी में इतनी महंगी फ़िल्म नहीं बनायी तो मैं डर गया था जब इतना बजट देखा तो. वैसे हमारी फिल्मों में बेवफिजुल का बजट बहुत जाया होता है लेकिन मेरे सेट पर ऐसा कभी नहीं होता है. हम लग्जरी के लिए पैसे नहीं खर्चते हैं . मेरे सेट पर एक ही कुक होता है जो सभी के लिए खाना बनाता है लेकिन चूंकि यह 1930 से 1940 के दशक की पीरियड फ़िल्म है इसलिए उस दौर की कार कौन सी होगी।शर्ट का कपड़ा क्या होगा,बटन क्या होगा. पेन क्या होगा. दीवार कैसी होगी. उसका रंग कैसा होगा इस पर काम किया गया. कोई गिरे तो 5 फुट उड़कर गिरे मैं इसमें पैसा खर्च करने में यकीन नहीं करता हूं. नॉर्मल गिरे मुझे वही चाहिए होता है.

आजकल की देशभक्ति की फिल्मों में जिनगोइसम हावी होने की है इस बात से आपकी इस फ़िल्म से दूर रखने की कितनी कोशिश रही है?

देशभक्ति और जिनगोइसम ज़्यादा हावी हो जाती है तो वो इंसान मुझे याद नहीं रह जाता है. उसका नार्मल होना मुझे ज़्यादा याद रह जाता है।किसी का आम होना ही मेरे लिए खास है. जब इस तरह की देशभक्ति फिल्में आप बनाते हैं तो आपको डर होता है कि कहीं आप भटक ना जाए. आपने मेरी पिछली फिल्मों को भी देखा होगा तो पाया होगा कि उसमें बेवजह का तामझाम नहीं होता है. जबरदस्ती का हीरोइज्म नहीं होता है. उधम सिंह जी एक आम आदमी की तरह ही थे।उनमें क्रांतिकारी की भावना थी।हर आदमी में क्रांति की भावना होती है. उनका आम होना और सादगीपूर्ण होना फ़िल्म की सबसे अहम ज़रूरत थी। डर था कि ये पहलू कहीं छूट ना जाए लेकिन हमने स्क्रिप्ट को पकड़े रखा है जिससे फ़िल्म में अति नाटकीय कुछ भी हावी नहीं हो पाया. मैं बताना चाहूंगा कि सरदार उधम सिंह ने अपने विचार किसी पर थोपे नहीं.

आपने कहा कि यह आपके कैरियर की सबसे महंगी फ़िल्म है चूंकि यह थिएटर में नहीं ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज हो रही है तो क्या प्रेशर कम है?

हां, बिल्कुल ऐसे कई लोग हैं जो मुझे पूछते हैं कि शुक्रवार का कलेक्शन क्या रहा. शनिवार का कलेक्शन क्या रहा।रविवार का क्या रहा. अब मुझे किसी को जवाब नहीं देना होगा कि बॉक्स ऑफिस कलेक्शन क्या होगा और पूरे देश दुनिया के दर्शक भी मेरी फिल्म को मिलेंगे. सबसे अच्छी बात है कि मेरी फिल्म अब उतरेगी नहीं. वह हमेशा रहेगी जब दर्शक चाहे उसे देख सकते हैं. एक फिल्मकार के तौर पर बुरा लगता है जब आपकी फ़िल्म थिएटर से उतर जाती है।क्योंकि आपको लगता है कि अभी और दर्शक देखते इसको. वैसे मैं इस बात को कहने के साथ ये भी कहूंगा कि मैं थिएटर के लिए फ़िल्म भी बनाना चाहूंगा. मुझे लगता है कि थिएटर और फिल्में साथ साथ चलने वाले हैं क्योंकि ओटीटी देखना दर्शकों की लाइफस्टाइल का हिस्सा बन गया है.

इस फ़िल्म के लिए आपकी पहली पसंद दिवंगत अभिनेता इरफान खान थे ,विक्की कौशल किस तरह से आपकी पसंद बनें क्या उरी की सफलता एक वजह थी?

मैंने उरी नहीं देखी है।किसी एक्टर की सफलता या असफलता मुझे प्रभावित नहीं करती है. उसकी विचारधारा,उसकी मेहनत मुझे अपील करती है कि वो किरदार के लिए क्या कर सकता है किस हद तक जा सकता. मैं एक्टर के साथ काम करना चाहता हूं क्या वो भी मेरे साथ काम करना चाहता है. ये सब बातें मेरे लिए मायने रखती है. विक्की की मैंने एकमात्र फ़िल्म मसान देखी है. उस फिल्म को देखकर मुझे लगा कि ये कर जाएंगे. फिर मेरी उनसे मुलाकात हुई बहुत सारी बातें हुईं समझ आया कि हमारी अच्छी ट्यूनिंग होगी।जो फ़िल्म बनाने के लिए ज़रूरी है. उधम सिंह जी के बारे में विक्की को बहुत कुछ पता था. उनमें मैंने इस फ़िल्म को करने की भूख देखी. जहां तक इरफान की बात है तो वो मेरी पहली पसंद थे।वो होते तो बात की कुछ और होती थी उनको बहुत मिस करता हूं.

उधम सिंह जी पर फ़िल्म बनाने का सपना आपने 21 साल पहले देखा था क्या आपको लगता है कि देर आपके लिए फायदेमंद रहा?

मैं आपकी बात से सहमत हूं. अक्सर कोई कहानी आपके पास इतने समय तक होती है तो आप उससे दूर हो जाते हैं या उसमें डूब जाते हैं. मेरे साथ दूसरा हुआ मेरे साथ यह फ़िल्म और मैच्योर हुई।मेरी ज़िंदगी ,मेरी कोशिश,रिसर्च सभी का पूरा निचोड़ यह फ़िल्म है. सरदार उधम सिंह जी एक महान क्रांतिकारी थे. उनके बारे में लोगों को ज़्यादा पता नहीं है. मुझे नहीं पता कि कितने लोगों को यह फ़िल्म छू पाएगी लेकिन अगर कुछ लोग भी सरदार उधम सिंह को ताउम्र याद रख जाते हैं तो मैं समझूंगा मेरी 21 साल की मेहनत सफल हुई.

फ़िल्म में एक संवाद सब में क्रांति है आपकी लाइफ का क्रांतिकारी पल कौन सा था?

बहुत सारे थे लेकिन सबसे अहम वो जब नौकरी छोड़ स्ट्रीट थिएटर से जुड़ा।हमारे वक़्त में परमानेंट नौकरी मिलनी मतलब भगवान मिलने जैसा था. मेरे घरवाले बहुत खुश थे लेकिन मेरा मन नहीं लगा और छह महीने बाद स्ट्रीट प्ले करने के लिए मैंने वो परमानेंट नौकरी छोड़ दी.

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