स्वच्छता को लेकर पूरे देश में अभियान चल रहा है. बड़े पैमाने पर इसकी सफलता के लिए सरकारी स्तर पर कार्य किये जा रहे हैं. शौचालय के मसले पर फिल्म भी बनी, लेकिन खास बात यह है कि इस मुद्दे पर सबसे पहली फिल्म बनाने का श्रेय बिहार के कलाकार को जाता है. अस्मिता शर्मा ने इस विषय पर फिल्म गुटरुं गुटरगूं को बनाया. पटना की रहने वाली अस्मिता की सुजीत कुमार से हुई बातचीत के प्रमुख्य अंश….
बिहार की अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताये. नाटक से फिल्म तक आप कैसे पहुंची?
मेरा मूल निवास जहानाबाद के पंडुई में है. पटना में मैंने दसवीं तक की पढ़ाई की उसके बाद आगे की स्टडी के लिए वनस्थली विद्यापीठ चली गयी. वहां यूथ फेस्टिवल में हिस्सा लिया और नाटक करने लगी. उसके बाद जब भी गर्मी की छुट्टियों में पटना आती थी नाटक करती थी. इस दौरान कई ग्रुप से भी जुड़ी और बड़ी संख्या में नाटकों में अभिनय किया.
आपको फिल्म में पहला ब्रेक कैसे मिला?
जब मैं राजस्थान में थी तब एक ऑडिशन देने का मौका मिला. तब चंद्रप्रकाश द्विवेदी पिंजर फिल्म बना रहे थे. उसमें एक सीन के लिए मेरा चयन हुआ, तब चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने मेरे अभिनय की सराहना की और मुंबई आने को कहा. हालांकि इसी बीच मुझे फिल्म तुम मेरी चांद किरण के लिए भी साइन किया गया. जिसकी शूटिंग उदयपुर व कोलंबो में हुई. मुंबई आने के बाद कई जगह संपर्क किया. फिर मुझे 2003 में सागर टेलीफिल्म्स ने आंखे सीरियल के लिए चुना. इसके बाद छोटे पर्दे पर छोटे-छोटे रोल करने को मिलने लगे.
छोटे पर्दे ने ही तो आपको पहचान दिलायी. ऐसे में आपको कौन सा सीरियल मिला?
एनडीटीवी इमेजिन पर आने वाला सीरियल धरमवीर इसके अलावा कलर्स चैनल पर आने वाले सीरियल बालिका वधु में राधा तथा स्टार प्लस पर आने वाले सीरियल मन की आवाज प्रतिज्ञा में मैंने काम किया. इसमें मेरा ठकुराइन का रोल बहुत फेमस रहा. वह मेरे लिए बेंच मार्क रहा. इसके बाद मैंने पांच से छह साल तक केवल छोटे पर्दे को ही दिया. इस रोल के लिए मुझे आईफा अवार्ड भी मिला. फिल्मों में भी काम करने का मौका मिला, लेकिन वहां काम करने का मेरा मन ही नहीं किया.
गुटरू गुटरगूं का ख्याल कैसे आया? उसे कैसे बनाया? आगे की क्या प्लानिंग है?
मेरा मन कुछ अलग करने का था. इसे मैंने अपने पति से शेयर किया. हमने ऐसी कहानी सोची जो अलग हो. हमने स्वच्छता पर आधारित कहानी को चुना. फिल्म के लिए काफी लड़ाई लड़नी पड़ी. जब फिल्म आयी तो लोगों ने हमारी सराहना की. सेंसर बोर्ड ने भी सराहा. कई राज्यों से सराहना मिली. ऐसी विषयों पर फिल्म बनाने का गर्व है. अभी हम बिहार के ही विषय पर एक और फिल्म की प्लानिंग कर रहे हैं. जो वास्तविक कहानी पर आधारित है. इसमें मनोज वाजपेयी भी अहम रोल में हैं. समय आने पर इस बारे में भी जानकारी दूंगी.
पटना के थियेटर के बारे में क्या कहना चाहेंगी?
देश में कई जगह थियेटर हैं लेकिन जो बात पटना के थियेटर की है, वह कही नहीं है. यहां के थियेटर में एक अलग तरह की गर्मी है. मैं यहां जुड़ी हुई हूं. मेरी फिल्म आयी तो थियेटर के लोगों ने हाथों-हाथ लिया. आने वाली फिल्म में मैं पटना के थियेटर आर्टिस्टों को प्राथमिकता दूंगी.
