Urea Production: भारत में यूरिया बनाने वाले प्लांट इस वक्त एक अभूतपूर्व संकट से गुजर रहे हैं. पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण गैस (LNG) की कमी हो गई है, जिससे देश के प्रमुख फर्टिलाइजर प्लांटों ने अपना उत्पादन आधा कर दिया है. दुनिया के सबसे बड़े यूरिया उपभोक्ता देश के लिए यह स्थिति कृषि क्षेत्र (Agriculture Sector) में बड़ा जोखिम पैदा कर सकती है.
गैस सप्लाई में 65% की भारी गिरावट
हॉर्मुज जलडमरूमध्य से कार्गो की आवाजाही रुकने के बाद विदेशी सप्लायरों ने ‘फोर्स मेज्योर’ (अपरिहार्य परिस्थितियों में अनुबंध से छूट) लागू कर दिया है. इसका असर यह हुआ कि गेल (GAIL), IOC और BPCL ने फर्टिलाइजर यूनिटों को दी जाने वाली गैस सप्लाई में 60-65% की कटौती कर दी है. कुछ प्लांटों में तो प्रभावी सप्लाई 50% से भी नीचे गिर गई है.
उत्पादन आधा, पर खर्च दोगुना
गैस की कमी ने प्लांट ऑपरेशंस को बुरी तरह प्रभावित किया है.बड़े अमोनिया-यूरिया प्लांट अपनी पूरी क्षमता पर चलने के लिए डिजाइन किए जाते हैं. जब इन्हें कम क्षमता पर चलाया जाता है, तो ये ‘कम यूरिया’ बनाने के लिए ‘ज्यादा ऊर्जा’ खर्च करते हैं. गैस की मात्रा में अचानक बदलाव से उपकरणों के खराब होने और प्लांट के अचानक बंद (ट्रिपिंग) होने का डर बढ़ गया है. इससे वहां काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा पर भी जोखिम है.
कीमतों को लेकर बढ़ी अनिश्चितता
गैस सप्लाई में रुकावट के साथ-साथ अब बिलिंग को लेकर भी उलझन बढ़ गई है. गेल (GAIL) ने सूचित किया है कि 1 मार्च, 2026 से गैस की कीमतें अलग-अलग पैमानों (जैसे पूल्ड प्राइस) पर तय होंगी. चूंकि ये कीमतें अस्थायी हैं, इसलिए कंपनियों को भारी वित्तीय अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है.
क्या किसानों को होगी यूरिया की किल्लत ?
खरीफ बुवाई का मौसम नजदीक है, ऐसे में यूरिया उत्पादन में लंबी रुकावट चिंताजनक है. हालांकि, फिलहाल एक राहत की खबर भी है. 19 मार्च तक देश के पास 61.14 लाख टन यूरिया का स्टॉक था, जो पिछले साल (55.22 लाख टन) के मुकाबले बेहतर है. लेकिन अगर उत्पादन जल्द सामान्य नहीं हुआ, तो आने वाले महीनों में खाद की भारी कमी और कीमतें बढ़ने का खतरा है.
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