Share Market :एशिया में गहराते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान-अमेरिका संघर्ष की आहट ने वैश्विक वित्तीय बाजारों सहित भारतीय शेयर बाजार को भी हिला कर रख दिया है. बुधवार सुबह बाजार खुलते ही निवेशकों में अफरा-तफरी मच गई, जिससे सेंसेक्स और निफ्टी दोनों प्रमुख सूचकांकों में 2 प्रतिशत के करीब बड़ी गिरावट दर्ज की गई.
बाजार का ताजा हाल
बुधवार सुबह बेंचमार्क सेंसेक्स 2.1% की गिरावट के साथ 78,590 अंक पर खुला. वहीं, निफ्टी 1.9% टूटकर 24,390 अंक पर आ गया. मंगलवार को होली के अवसर पर बाजार बंद थे, लेकिन सोमवार की गिरावट के बाद बुधवार को बाजार संभलने में नाकाम रहे.
‘इंडिया विक्स’ (India VIX) में भारी उछाल
बाजार में डर और अनिश्चितता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंडिया विक्स (Volatility Index) में 25% का जोरदार उछाल देखा गया. वित्त की भाषा में इसे ‘जोखिम का पैमाना’ माना जाता है. विक्स का बढ़ना इस बात का संकेत है कि निवेशक आने वाले समय में बाजार में और भी बड़ी उथल-पुथल की आशंका जता रहे हैं.
गिरावट के 3 मुख्य कारण
बाजार विशेषज्ञ अजय बग्गा ने इस संकट के भारत पर तीन बड़े असर बताए हैं.
- कच्चे तेल की कीमतें: हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Straits of Hormuz) के बंद होने की आशंका से कच्चे तेल की कीमतों में आग लग गई है. कच्चा तेल करीब 5% महंगा हुआ है, जो भारत के आयात बिल को बढ़ा सकता है.
- व्यापारिक नुकसान: खाड़ी देशों के साथ भारत का बड़ा व्यापारिक रिश्ता है. सप्लाई चेन बाधित होने से भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान होने की आशंका है.
- प्रवासी भारतीयों पर संकट: मध्य पूर्व में लगभग 90 लाख भारतीय काम करते हैं. उनकी सुरक्षा, आजीविका और भारत भेजे जाने वाले धन (Remittances) पर इस युद्ध का क्या असर होगा, यह अभी अनिश्चित है.
विशेषज्ञों की राय
कोटक सिक्योरिटीज के इक्विटी रिसर्च हेड श्रीकांत चौहान के अनुसार, “बाजार वर्तमान में अपने अल्पकालिक और मध्यम अवधि के औसत से काफी नीचे कारोबार कर रहा है, जो एक कमजोर फॉर्मेशन और नकारात्मक दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है.” वहीं, एचडीएफसी सिक्योरिटीज के देवरर्श वकील का कहना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के चालू खाता घाटे (CAD) को बढ़ाएंगी, रुपये को कमजोर करेंगी और महंगाई को हवा देंगी. इससे विदेशी निवेशकों (FPI) द्वारा भारतीय बाजार से पैसा निकालने की रफ्तार तेज हो सकती है.
आगे क्या ?
फिलहाल निवेशकों की नजरें ईरान के अगले कदम और अमेरिका की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं. यदि तनाव कम होता है और तेल की सप्लाई सुचारू रहती है, तो ही बाजार में सुधार की उम्मीद की जा सकती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि निचले स्तरों पर कुछ खरीदारी (Buying on dips) देखी जा सकती है, लेकिन फिलहाल बाजार ‘रिस्क-ऑफ’ मोड में है.
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